MSP गॉरन्टी क्यों नहीं दे पा रही सरकार ?
मिनिमम सेल प्राइस गॉरन्टी (MSP) क्यों नहीं
क्या है MSP ?
MSP ( न्यूनतम समर्थन मूल्य ) से मतलब किसान की उपज को जो भी खरीदे उसे सरकार द्वारा उसका एक निश्चित मूल्य मिले, इस पर किसान सरकार पर दबाव बना कर मनवाना चाहते हैं. किन्तु इस पर सहमती बनना उतना आसान नहीं है जितना लगता है, क्यों की किसी भी उत्पाद की वैल्यू या मूल्य निश्चित करना आसान नहीं होता।
MSP की जब जब बात आती है देश में या तो पॉलिटिक्स होती है या तोड़फोड़- रोड जाम -खाने पीने के सामानों की कमी के चलते महगाई, और साथ ही देश की इकॉनमी को भारीभरकम नुकसान।
क्यों है MSP की गॉरन्टी मुश्किल :
1- फसल पर आनेवाली इनपुट कोस्ट: लागत का सभी राज्यों में एक सामान न होना , किसी राज्य में किसानों को राज्य द्वारा प्रदान करने वाली सुविधाओं के चलते, किसानों की कुल लागत कम या ज्यादा हो सकती है. पजाब में धान की पैदावार की लागत कम आंकी गई है जबकि उसी धान को पैदा करने की कुल लागत महाराष्ट में पजाब से दुगनी से भी ज्यादा है.
3- बढ़ी MSP = बड़ी कीमतें या महगाई: MSP का खाने के सामान की बड़ी हुई कीमतों पर सीधा असर होना। यदि सरकार किसी भी फसल को बढ़ी हुई कीमत पर मंडी में खरीदेगी तो वह उस वास्तु को उसी अनुपात में बेचेगी भी. यदि मुफ्त भी देगी तब भी उस वास्तु को खरीदने में उसको अधिक पैसा खर्चना पड़ेगा, जिसकी वजह से सरकार को दूसरे सामानों में अपने खर्च को कम करना पड़ेगा, जो उसके बजट को बिगाड़ सकता है.
मंडी में भी यदि कोई पैदावार अधिक मूल्य पर किसी के भी द्वारा खरीदी जाएगी तो उसी अनुपात में आगे बेची जाएगी। जिससे खाने पीने की चीजें महंगी होने के कारण गरीब आदमी की पहुँच से बाहर हो जाएंगी।
4- WTO का दबाव: अब वर्ल्ड ट्रेड आर्गेनाइजेशन को क्या है परेशानी, यदि सरकार अपने किसानों को सुविधाएं देती है और अधिक पैदावार के लिए सहयता करती है और उसे ऊँचे मूल्य पर खरीदती है ?
क्योकी भारत WTO वर्ल्ड ट्रेड आर्गेनाइजेशन का सदस्य है इसलिए उसे WTO के रूल्स और रेगुलेशन्स को भी मानना पड़ता है. इसके अनुसार विकासशील देश अपनी जीडीपी का केवल 10% तक ही सब्सिडी दे सकता है. ताकि ये देश किसी भी प्रोडक्ट का इतना उत्पादन न कर सकें जिससे उस प्रोप्डक्ट के बहुतायत हो जाये, और जिससे दूसरे देशों से होने वाले एक्सपोर्ट पर बुरा असर पड़े.
WTO दुनिया में होने वाले हर तरह के ट्रैड पर नजर रखता है व ये भी देखता है कि कोई भी देश अपने देश में होने वाली पैदावार को तमाम तरह सुविधाएं दे कर यदि पैदावार बढ़ता है तो, इस बड़ी हुई पैदावार को दुनियाभर में में बेचेगा भी, यदि किसी उत्पाद की अधिक सप्लाई होगी तो उसका प्राइस ( डिमांड और सप्लाइ में संतुलन न होने के कारण ) गिर जायेंगे, जिससे उन सदस्य देशों को नुकसान होगा जहाँ उस उत्पाद की पैदावार कम है.
इसलिए WTO ये देखता है कि दुनिया में ट्रेड के लिए डिमांड और सप्लाई का बैलेंस बना रहे.
5-MSP जैसी सुविधा पहले से ही: क्योकी सरकार पहले से ही बिना WTO के नियमों का उंल्लघन किये बिना नयूनतम समर्थन मूल्य पर देश में पैदा होने वाली कुछ फसलों का एक निश्चित प्राइस पर जरुरत के अनुसार खरीद कर रही है, इसलिए भी सरकार नहीं चाहती की वह भारत का विश्व में होने वाले व्यापार को नुक्सान हो.
6- सामान की कीमतें बाजार (डिमांड और सप्लाई ) तय करता है सरकारें नहीं:
क्योकी किसी भी उत्पाद की कीमत उस उत्पाद की पैदावार में लगी लागत और उपलब्धता पर निर्भर करती है, इसलिए यदि किसान किसी भी पैदावार की गारंटेड कीमत मिलने पर यदि अधिक पैदावार करने लगे तो उस उत्पाद की उपलब्धता तो बढ़ जाएगी पर दुसरी पैदावार पर इसका प्रतिकूल असर पड़ेगा व उसकी भरी कमी हो जाएगी।
यदि कोई उत्पाद अधिक मात्रा में उगाया गया तो बाजार में उसकी अधिक उपलब्धता के कारण कीमतें गिर जाएंगी, जिससे उस उत्पाद को ऊंची कीमत पर खरीदना कोई नहीं चाहेगा।
क्या है सबसे बड़ी दिक्क्त : जिम्मेदार कौन ?
मोदी सरकार को क्यों हो रही परेशानी:
मोदी सरकार का अड़ियल रुख: मोदी सरकार की सबसे बड़ी कमजोरी या अड़ियलपन है की वह किसी भी फैसले पर बिना किसी से बात करे, बिना विपक्ष के साथ संसद में सवालजवाब के, अपना फैसला सुना देती है. यदि ये सारी बातें पहले सदन में और फिर किसानों से बात करके लागू की जाती तो शायद देश को इतनी परेशानी का सामना न करना पड़ता न ही इतने किसानों की आंदोलन में शहादत होती। क्या बिना विचारे, अपने मन की
मोदी सरकार के सभी फैसले एक तरफ़ा होना: पिछले 10 सालों में सरकार ने जब भी कोई फैसला लिया, बिना सोचे बिना समझे लिया ,बिना किसी से सलाह के, बिना मीडिया के माध्यम से पब्लिक को बताये -: नोटेबंदी,लोकडाउन, GST, कृषि कानून , डीज़ल पैट्रॉल की कीमतें, मीडिया पर दबाव, ED सीबीआई EC का खुला प्रयोग आदि
नोटबंदी :- अचानक लागु की, एटीएम मशीने भी तैयार नहीं थी नए नोटों को रखने के लिए, 140 से अधिक गरीब लोगों की लाइनों में जान गयी, कुछ हासिल नहीं हुआ
GST : अचानक लागु करने की वजह से लाखों घरेलू उद्योग बंद हो गए, इन उद्योगों से जुड़े लाखों लोग बेरोजगार हो गए, अच्छा होता थोड़ा समय दिया जाता जिससे लोगों को नए प्लेटफार्म पर काम करने में थोड़ा संमझने का मौका मिल जाता जिससे अधिकतर लोग अपने रोजगार को बचाने में सफल होते या उन्हें थोड़ी सहायता मिलती।लोकडाउन: अचानक लागु किया, बिना किसी तैयारी के, लोगों के आने जाने का कोई इंतजाम नहीं था, लाखों गरीब लोग रास्ते में ही फंस गए, कोरोना के फैलने से पहले लोग रास्तों पर एक्सीडेंट की वजह से मरे, सरक़ार की कोई जवाबदेही नहीं।
3 कृषि कानून: अचानक लागु कृषि कानून जो बाद में वापस लेने पड़े, १३ महीनों तक राजधानी में जाम लगा रहा, 700 से ज्यादा किसानों की आंदोलन के दौरान मृत्यु हुई, हजारों घंटे लोग जाम में रहे, देश को हजारों करोड़ का नुकसान हुआ, सरकार की कोई जवाबदेही नहीं।


