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असम चुनाव 2026: हेमंत का 55 हजार करोड़ का ‘स्कैंडल’, किन्तु 

पुलिस एक्शन कांग्रेस नेता की खिलाफ- 

– क्या लोकतंत्र पर उठ रहे सवाल?





क्या है पूरा मामला?

NB7-दिल्ली: असम में विधानसभा चुनाव 2026 से ठीक पहले राजनीतिक माहौल बेहद गरमा गया 

है। कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा और उनके परिवार पर गंभीर आरोप 

लगाए — जिनमें तीन विदेशी पासपोर्ट, दुबई में संपत्ति और अमेरिका में हजारों करोड़ की संपत्ति जैसी 

बातें शामिल थीं।

इन आरोपों को सरमा ने “फर्जी, AI-जनरेटेड और राजनीतिक साजिश” बताया और कानूनी कार्रवाई 

शुरू कर दी।

पुलिस एक्शन: कांग्रेस नेता के घर दिल्ली पहुंची असम पुलिस

ताजा घटनाक्रम में असम पुलिस ने दिल्ली में पवन खेड़ा के घर पर छापेमारी/जांच की।

पुलिस का दावा है कि उन्हें कुछ “आपत्तिजनक सामग्री (incriminating material)” मिली है।

यह कार्रवाई सरमा की पत्नी द्वारा दर्ज FIR के आधार पर की गई।

मुख्यमंत्री ने कहा कि “अगर कोई छिपेगा, तो उसे ढूंढकर लाया जाएगा।”

यहाँ बताते चलें कांग्रेस के प्रवक्ता ने खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस में सबूतों को देने तक का दावा किया था और 

कहा था आप लोग (पत्रकार) स्वयं इंटरनेट पर उपलब्ध सबूतों की छानबीन कर सकते हैं।  यानी 

पुलिस आरोपियों की छानबीन न कर के आरोप लगाने वालों को परेशान करने में जूट गयी है।  

👉 इससे साफ है कि मामला अब सिर्फ राजनीतिक नहीं, कानूनी और आपराधिक जांच का रूप ले 

चुका है।

आरोप vs जवाब: दोनों पक्षों की रणनीति


कांग्रेस का आरोप

-कई विदेशी पासपोर्ट (प्रेस कॉन्फ्रेंस में तीन विदेशी पासपोर्ट का जिक्र ) 

-दुबई में संपत्ति

-अमेरिका के व्योमिंग शहर में शेल कंपनियों में लगभग 55 हजारों करोड़

 (अमेरिका के व्योमिंग में इन्वेस्ट या बैंकों में पैसा जमा करने पर इनकम टैक्स नहीं लगता- इसलिए 

दुनिया भर के काले धन को जमा करने वालों की पसंदीदा जगह  )


हेमंता सरमा का पलटवार


-आरोप फर्जी और फोटोशॉप्ड

-“पाकिस्तान लिंक” का दावा

-चुनाव को प्रभावित करने की साजिश


👉 यह लड़ाई अब “भ्रष्टाचार बनाम साजिश” के नैरेटिव में बदल चुकी है।


चुनाव आयोग (ECI) की भूमिका पर सवाल


असम जैसे संवेदनशील चुनावी माहौल में यह विवाद कई बड़े सवाल खड़े करता है:

 

क्या ECI को दखल देना चाहिए ❓


-चुनाव के दौरान फर्जी जानकारी / दुष्प्रचार रोकना ECI की जिम्मेदारी होती है।  

-अगर आरोप सच हैं → मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट (MCC) का उल्लंघन। 

-अगर आरोप झूठे हैं → मतदाताओं को भ्रमित करने का मामला। 


👉 अभी तक ECI की ओर से कोई बड़ा सार्वजनिक एक्शन सामने नहीं आया है (ताजा रिपोर्ट्स के 

अनुसार), जिससे निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं।

पुलिस क्या जानना चाहती है?

असम पुलिस की जांच इन बिंदुओं पर केंद्रित है:

-क्या आरोपों के पीछे फर्जी दस्तावेज / AI कंटेंट है?

-क्या कोई विदेशी कनेक्शन (जैसे पाकिस्तान लिंक) है?

-क्या यह चुनाव को प्रभावित करने की संगठित साजिश है?

-यहाँ एक बड़ा सवाल ये भी है असम में चुनाव हैं और पुलिस इस समय मुख्यमंत्री के आदेश नहीं 

बल्कि इलेक्शन कमीशन के आदेश के अनुसार चलनी चाहिए, अगर ऐसा है तो जाँच हेमंत बिस्व 

सरमा की भी होनी चाहीये, क्योंकि ये मामला अब नकली पासपोर्ट का भी बन जाता है।  

यहाँ ये बताते चलें, भारत में एक साथ दो देशों की नागरिकता गैरकानूनी है, जबकि यहाँ तो तीन देशों 

की नागरिकता के आरोप लग रहे हैं।   

👉 मामला अब सिर्फ बयानबाजी नहीं, बल्कि डिजिटल फॉरेंसिक + साइबर जांच तक पहुंच गया है

“नया भारत ” पर बड़ा सवाल?


इस पूरे विवाद ने एक बड़ा नैरेटिव खड़ा कर दिया है:

-क्या सत्ता में बैठे नेताओं को ज्यादा सुरक्षा और ताकत मिल रही है?

-क्या विपक्ष की आवाज पर पुलिस का दबाव बढ़ रहा है?

-या फिर यह फर्जी खबरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई है?


👉 सच्चाई क्या है, यह जांच और कोर्ट के फैसलों से ही स्पष्ट होगी। किन्तु सभी जानते हैं भारत में 

जाँच और केस अदालतों में बरसों फंसे रहते हैं और आपराधिक मामलों में अपराधी अक्सर पूरी 

जिंदगी सजा से बचते रहते हैं या जमानत पर बाहर रह कर सबूतों को मिटाने और गवाहों को डराने में 

सफल हो जातें हैं 


BJP शासित राज्यों की कार्यशैली पर बहस

विपक्ष का आरोप:

-एजेंसियों का राजनीतिक इस्तेमाल

-विपक्षी नेताओं पर तेज कार्रवाई

सरकार का जवाब:

-“कानून अपना काम कर रहा है”

-“फर्जी आरोपों पर सख्ती जरूरी”

👉 यह बहस सिर्फ असम तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे देश में चल रही है।


गैस की किल्लत या अफवाह से उमड़ी भीड़ 



क्या भारत में LPG गैस की किल्लत है या यह सिर्फ अफवाह है? जानिए गैस सप्लाई, जमाखोरी और 

राजनीतिक बयानबाजी के पीछे का पूरा विश्लेषण -

NB7-न्यूज डेस्क दिल्ली-देश के कई हिस्सों से इन दिनों घरेलू गैस सिलेंडर (LPG) की कमी की खबरें 

सामने आ रही हैं। सोशल मीडिया से लेकर स्थानीय बाजारों तक, “गैस खत्म हो रही है” जैसी चर्चाएं 

तेज हो गई हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या वाकई देश में गैस की किल्लत है, या यह सिर्फ अफवाह 

और राजनीतिक बयानबाजी का परिणाम है?


क्या वाकई है गैस की सप्लाई में कमी?

सरकारी तेल कंपनियों के आंकड़ों के अनुसार, भारत में LPG की सप्लाई सामान्य रूप से जारी है। 

इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी कंपनियां नियमित रूप से गैस 

वितरण कर रही हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि-

👉 देश में गैस का उत्पादन और आयात दोनों स्थिर हैं


👉 बड़े स्तर पर कोई आधिकारिक “शॉर्टेज” घोषित नहीं की गई है

हालांकि, कुछ क्षेत्रों में डिलीवरी में देरी और अस्थायी कमी जरूर देखने को मिल रही है, जिसका 

कारण लॉजिस्टिक्स और स्थानीय स्तर की समस्याएं हैं।


राजनीतिक बयानबाजी का भी असर?

हर बार जब किसी जरूरी वस्तु की कमी की खबर आती है, तो राजनीति भी सक्रिय हो जाती है। विपक्ष 

सरकार पर सप्लाई फेलियर का आरोप लगाता है, जबकि सरकार इसे “अफवाह” बताती है।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार:

-चुनावी माहौल में ऐसी खबरें ज्यादा फैलती हैं

-बयानबाजी से आम जनता में डर का माहौल बनता है

-यही डर जमाखोरी को बढ़ावा देता है

इस तरह, असली संकट से ज्यादा “संकट की धारणा” बड़ा मुद्दा बन जाती है।

जमाखोरी: असली समस्या- अफवाहों से बढ़ी मांग 

जब लोगों को यह लगता है कि गैस खत्म हो सकती है, तो वे जरूरत से ज्यादा सिलेंडर बुक करने लगते हैं।

👉 एक परिवार 1 की जगह 2-3 सिलेंडर जमा कर लेता है

👉 छोटे दुकानदार भी स्टॉक बढ़ा लेते हैं

इससे बाजार में कृत्रिम कमी पैदा हो जाती है।

आर्थिक विशेषज्ञ इसे “Panic Buying” कहते हैं — यानी डर के कारण जरूरत से ज्यादा खरीदारी।

परिणाम:

-जिन लोगों को तुरंत गैस चाहिए, उन्हें नहीं मिल पाती

-डिलीवरी सिस्टम पर दबाव बढ़ जाता है

-ब्लैक मार्केटिंग शुरू हो जाती है

सोशल मीडिया: अफवाहों का सबसे बड़ा कारण


आज के समय में WhatsApp, Facebook और X (Twitter) जैसे प्लेटफॉर्म पर कोई भी खबर 

मिनटों में वायरल हो जाती है।

“सरकार गैस खत्म कर रही है” या “अगले महीने से गैस नहीं मिलेगी” जैसे मैसेज बिना किसी सत्यापन 

के फैल जाते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है:

👉 70% अफवाहें सोशल मीडिया से शुरू होती हैं

👉 लोग बिना जांचे-परखे उन्हें सच मान लेते हैं

सरकार और एजेंसियां लगातार इन अफवाहों को खारिज कर रही हैं, लेकिन तब तक नुकसान हो 

चुका होता है।


समय पर ढुलाई की समस्याएं भी हैं एक कारण

हालांकि पूरी तरह से किल्लत नहीं है, लेकिन कुछ असली समस्याएं भी हैं:

-ट्रांसपोर्ट में देरी

-गोदामों में अस्थायी स्टॉक की कमी

-त्योहारों या मौसम के कारण मांग में अचानक वृद्धि

इन वजहों से कुछ इलाकों में अस्थायी गैस संकट महसूस होता है, जिसे लोग “राष्ट्रीय संकट” समझ लेते हैं।


बढ़ी कीमतों का भी है इसमें रोल?


गैस सिलेंडर की कीमतों में हुवे बदलाव (चढ़ाव) भी लोगों के व्यवहार को प्रभावित करता है।

जब कीमत बढ़ने की खबर आती है, तो लोग पहले से ज्यादा सिलेंडर बुक करने लगते हैं ताकि भविष्य 

में महंगी गैस से बच सकें। इससे भी बाजार में अचानक मांग बढ़ जाती है


विशेषज्ञों की राय: “डर ही सबसे बड़ा संकट”


ऊर्जा क्षेत्र के जानकार मानते हैं कि:

👉 वास्तविक गैस संकट नहीं है

👉 “Perception Crisis” यानी धारणा का संकट ज्यादा बड़ा है


अगर लोग सामान्य रूप से गैस खरीदें और अफवाहों पर ध्यान न दें, तो सप्लाई सिस्टम आसानी से 

संतुलित रह सकता है।


सरकार और कंपनियों की अपील


सरकार और तेल कंपनियां लगातार यह अपील कर रही हैं:

-जरूरत से ज्यादा गैस न खरीदें

-अफवाहों पर विश्वास न करें

-आधिकारिक स्रोतों से ही जानकारी लें

कुछ राज्यों में प्रशासन ने जमाखोरी और ब्लैक मार्केटिंग पर सख्ती भी शुरू कर दी है।


हकीकत बनाम अफवाह:-


अगर पूरी स्थिति का विश्लेषण करें, तो यह साफ होता है कि:

✔️ देश में बड़े स्तर पर गैस की कोई गंभीर किल्लत नहीं है

✔️ स्थानीय समस्याएं और लॉजिस्टिक्स की वजह से अस्थायी कमी हो सकती है

✔️ असली समस्या अफवाह और जमाखोरी है

✔️ राजनीतिक बयानबाजी इस आग में घी डालने का काम करती है






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