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गिरफ्तारी नहीं, अपहरण था ये! 


ध्रुव राठी और अभिजीत दीपके को आखिर किस बात का डर दिखाकर रोका गया?

NB7 - नई दिल्ली | विशेष रिपोर्ट

क्या सरकार से सवाल पूछना अब इतना बड़ा अपराध हो गया है कि प्रदर्शन से पहले ही आवाज उठाने वालों को रास्ते से हटा दिया जाए?

सीजेपी के प्रदर्शन को लेकर यूट्यूबर ध्रुव राठी और सीजेपी संस्थापक अभिजीत दीपके को हिरासत में लिए जाने की कार्रवाई ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। ध्रुव राठी ने इसे “गिरफ्तारी नहीं, अपहरण” करार दिया। सवाल यह है कि अगर कार्रवाई कानून के तहत हुई, तो उसका आधार और प्रक्रिया साफ-साफ सामने क्यों न रखी जाए?

प्रदर्शन से पहले हिरासत, सड़कों पर बैरिकेड और भारी पुलिस बंदोबस्त—आखिर किस बात का डर?

क्या कानून-व्यवस्था बनाए रखने का मतलब यह है कि विरोध की आवाज को प्रदर्शन शुरू होने से पहले ही रोक दिया जाए?

अगर पुलिस के पास किसी संभावित गड़बड़ी के ठोस सबूत थे, तो उन्हें सामने रखा जाना चाहिए। लेकिन अगर किसी को बिना स्पष्ट कारण बताए या निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना रोका गया, तो यह गंभीर जवाबदेही का मामला है।

सवाल सीधा है: कानून सबके लिए बराबर है या सिर्फ सरकार से सवाल पूछने वालों के लिए?

10 अक्टूबर के प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले दिल्ली में सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए। मेट्रो स्टेशनों 

पर पाबंदियां, रेल सेवाओं में रद्दीकरण और कुछ इलाकों में मोबाइल इंटरनेट पर अस्थायी रोक की 

खबरें सामने आईं। प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने की खबरों ने भी सवाल खड़े किए।

यह प्रदर्शन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग और मतदाता सूची के विशेष गहन 

पुनरीक्षण (SIR) को लेकर उठ रहे सवालों से जुड़ा था। प्रशासन ने कानून-व्यवस्था और सुरक्षा को इन 

कदमों का आधार बताया।

लेकिन सवाल है—जब नागरिक अपनी शिकायत लेकर सड़क पर उतरें, तो लोकतंत्र में सरकार 

की जिम्मेदारी उनकी आवाज सुनना है या राजधानी के रास्ते बंद करना?


दिल्ली बनी किला! यह इमरजेंसी नहीं तो क्या है? 

 SIR विवाद और Form 6 पर चुनाव आयोग से बड़े सवाल ?

1975 की याद: क्या आज अघोषित इमरजेंसी है?

25 जून 1975 को इंदिरा गांधी सरकार ने देश में औपचारिक आपातकाल घोषित किया था। विपक्षी 

नेताओं की गिरफ्तारियां हुईं, प्रेस पर सेंसरशिप लगी और नागरिक स्वतंत्रताओं पर व्यापक प्रतिबंध 

लगाए गए। मार्च 1977 के चुनाव में कांग्रेस हार गई और जनता पार्टी की सरकार बनी।

आज देश में वैसा औपचारिक आपातकाल घोषित नहीं है। इसलिए दोनों स्थितियों को कानूनी रूप से 

एक जैसा कहना सही नहीं होगा। लेकिन दिल्ली में प्रदर्शन से पहले व्यापक प्रतिबंधों ने यह सवाल 

जरूर खड़ा किया है कि क्या सुरक्षा के नाम पर नागरिकों के अधिकार जरूरत से ज्यादा सीमित किए 

जा रहे हैं?

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SIR विवाद: पुराने मतदाता का नाम गायब ! तो जिम्मेदार कौन?

मतदाता सूची को सही रखना चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है। मृत व्यक्तियों के नाम, दोहरी प्रविष्टियों 

और स्थान बदल चुके मतदाताओं की जांच जरूरी हो सकती है। लेकिन इस प्रक्रिया में किसी पात्र 

नागरिक का नाम गलत तरीके से हट जाए, तो उसके मतदान के अधिकार पर असर पड़ सकता है।

मान लीजिए, किसी व्यक्ति ने पहले कई चुनावों में मतदान किया है, उसके पास पुराना वोटर कार्ड भी 

है, लेकिन SIR के बाद उसका नाम सूची में नहीं मिलता। तब सबसे पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि 

नाम क्यों गायब है, पुराने रिकॉर्ड की जांच कैसे होगी और गलती होने पर उसे बहाल करने की प्रक्रिया 

क्या है।

नामों की जांच जरूरी है, लेकिन सही मतदाता का नाम गलत तरीके से हटने से बचाना भी 

उतना ही जरूरी है।

Form 6 पर बड़ा सवाल: पुराने वोटर को फिर नया मतदाता क्यों बनना पड़े?

चुनाव आयोग के अनुसार, Form 6 नए मतदाता के रूप में पंजीकरण के लिए है, जबकि Form 8 

का उपयोग निर्धारित परिस्थितियों में पता बदलने, विवरण सुधारने और EPIC से संबंधित सेवाओं के 

लिए होता है।

आधिकारिक फॉर्म: Election Commission — Form 6 PDF

Form 6 में यह घोषणा भी शामिल है कि आवेदक का नाम किसी दूसरी मतदाता सूची में पहले से दर्ज 

नहीं है। गलत घोषणा पर कानूनी कार्रवाई का प्रावधान भी है।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण सवाल है: यदि किसी व्यक्ति ने पहले मतदान किया है और उसके पास 

पुराना EPIC नंबर है, तो आवेदन प्रक्रिया में उसकी पुरानी मतदाता पहचान को स्पष्ट रूप से दर्ज 

करने और सत्यापित करने की व्यवस्था क्यों न हो?

फॉर्म या सत्यापन प्रक्रिया में ये सवाल उपयोगी हो सकते हैं:

-क्या आपने पहले कभी मतदान किया है?

-क्या आपके पास पहले से वोटर कार्ड या EPIC नंबर है?

-क्या आपका नाम पहले किसी दूसरे निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में दर्ज था?

-क्या आप पहली बार पंजीकरण करा रहे हैं, पता बदलकर आए हैं या आपका पुराना नाम वर्तमान सूची में नहीं मिल रहा?

-यदि पुराना नाम नहीं मिल रहा, तो क्या पुराने रिकॉर्ड के आधार पर जांच और सत्यापन का अनुरोध किया जा सकता है?

इन सवालों का उद्देश्य किसी पात्र नागरिक को आवेदन से रोकना नहीं, बल्कि पुराने रिकॉर्ड और नए 

आवेदन के बीच संबंध स्पष्ट करना है।

एक व्यक्ति के दो वोटर कार्ड गैरकानूनी हैं, तो रिकॉर्ड की जांच क्यों 

नहीं?

कानून एक व्यक्ति को एक से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाता के रूप में पंजीकृत होने से रोकता है। -

Representation of the People Act, 1950 की धाराएं 17 और 18 इस विषय से संबंधित हैं। धारा 

31 के तहत जानबूझकर गलत घोषणा करने पर दंड का प्रावधान भी है।

-लेकिन दो कार्ड होना और दो जगह सक्रिय मतदाता प्रविष्टियां होना हमेशा एक ही बात नहीं है। 

-पुराने और नए पते के रिकॉर्ड की जांच जरूरी है; हर पुराने कार्ड को धोखाधड़ी का प्रमाण नहीं माना 

जा सकता।

फिर भी, यदि किसी नागरिक का पुराना रिकॉर्ड उपलब्ध है, तो उसे बिना स्पष्ट कारण नए मतदाता की 

तरह आवेदन करने की स्थिति में क्यों छोड़ा जाए?

चुनाव आयोग से पांच सीधे सवाल

  1. पुराने EPIC नंबर के आधार पर गायब मतदाता रिकॉर्ड खोजने की प्रक्रिया क्या है?

  2. पहले से पंजीकृत लेकिन वर्तमान सूची में नाम न मिलने वाले व्यक्ति को कौन-सा फॉर्म भरना चाहिए?

  3. क्या पुराने मतदाता के लिए अलग सत्यापन प्रक्रिया की जरूरत है?

  4. गलत तरीके से नाम हटने पर उसे बहाल करने का समयबद्ध तरीका क्या है?

  5. SIR के दौरान Form 6 और Form 8 के सही इस्तेमाल के लिए BLO को क्या निर्देश दिए गए हैं?

इन सवालों का जवाब राजनीतिक आरोपों से नहीं, बल्कि चुनाव आयोग के नियमों, दस्तावेजों और 

आंकड़ों से आना चाहिए।

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शिवाजी पार्क के बाद अब 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर! ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे पर CJP का बड़ा ऐलान, दिल्ली में बढ़ा सियासी तनाव

NB7 - नई दिल्ली | विशेष रिपोर्ट | 8 अक्टूबर 2026

मुंबई के शिवाजी पार्क से शुरू हुआ विरोध अब दिल्ली पहुंच चुका है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP ने 10 अक्टूबर को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का ऐलान किया है। अब यह सिर्फ एक घोषणा नहीं है—CJP ने 7 अक्टूबर को दिल्ली पुलिस को प्रस्तावित प्रदर्शन की औपचारिक सूचना भी दे दी है।

CJP के साथ कई छात्र संगठन भी इस आंदोलन में लामबंदी कर रहे हैं। 7 अक्टूबर को CJP, AISA, AISF और SFI समेत छात्र संगठनों ने संयुक्त रूप से देशभर से लोगों को दिल्ली पहुंचने की अपील की और कहा कि आंदोलन को लंबे समय तक चलाया जा सकता है।

दूसरी ओर, दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की सुरक्षा भी बढ़ा दी गई है। अधिकारियों के मुताबिक उनके पहले से मौजूद Z+ सुरक्षा घेरे के बावजूद उनके घर और चुनाव आयोग के आसपास अतिरिक्त पुलिस तैनात की गई है। यह कदम ऐसे समय आया है जब SIR और मतदाता सूची को लेकर विरोध प्रदर्शन तेज हो रहे हैं।

CJP आखिर किस मुद्दे पर आंदोलन कर रही है?

CJP का मुख्य मुद्दा SIR यानी मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण को लेकर है। पार्टी का आरोप है कि SIR की प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में लोगों के नाम मतदाता सूची से हट गए हैं। अब जिन लोगों के नाम सूची में नहीं हैं, वे अपने नाम दोबारा जुड़वाने के लिए जरूरी कागज ढूंढ़ रहे हैं और सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा रहे हैं।

गलती व्यवस्था की, परेशानी मतदाता की क्यों?

SIR को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि अगर कोई मतदाता जीवित है, अपने पते पर मौजूद है और उसका पुराना मतदाता रिकॉर्ड भी मौजूद है, तो उसका नाम मतदाता सूची से क्यों हट गया?

नाम हटने के बाद अब परेशानी उस मतदाता को उठानी पड़ रही है। उसे अपने पुराने दस्तावेज खोजने पड़ रहे हैं, जरूरी कागज जुटाने पड़ रहे हैं और नाम दोबारा मतदाता सूची में जुड़वाने के लिए सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।

यहीं से एक गंभीर सवाल पैदा होता है—अगर मतदाता की तरफ से कोई गलती नहीं थी, तो गलती का बोझ भी उसी पर क्यों पड़े?

इसी वजह से SIR को लेकर यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या किसी पात्र नागरिक को अपनी मौजूदगी और पुराने रिकॉर्ड साबित करने के लिए बार-बार दस्तावेज लेकर सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ने चाहिए?

यही वह मुद्दा है जिस पर CJP और SIR के आलोचक सवाल उठा रहे हैं—व्यवस्था में गलती हो तो उसकी कीमत नागरिक क्यों चुकाए?

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