हिन्दु धर्म में बलि
क्या हिन्दू धर्म में मांस खाना वर्जित है ?
आधुनिक समाज में हिन्दू धर्म को सनातन के नाम से अधिक प्रचारित किया जा रहा है तथा उत्तर भारत में विशेष रूप से मांस या जानवर की हत्या को हिन्दू धर्म में वर्जित है, जैसा प्रचार किया जा रहा है,किन्तु यदि हम धार्मिक ग्रंथों में थोड़ा सा पीछे देखते हैं तो हमें जानवरों की मंदिरों में बली की हजारों व्याख्याएं मिल जाती हैं. समय के साथ इन ग्रंथों में भी बदलाव किये जा रहे हैं.
पशु बलि के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक संस्कृत शब्द बाली है, जिसका मूल अर्थ सामान्य रूप से "श्रद्धांजलि, भेंट या बलिदान" है, अन्य चीजों के अलावा बली "एक जानवर की ह्त्या को संदर्भित करता है" और कभी-कभी इसे हिंदुओं के बीच झटका बली के रूप में भी जाना जाता है।
कालिका पुराण क्रमशः बकरियों, हाथी की धार्मिक अनुष्ठान के लिए हत्या के लिए बलि (बलिदान), महाबली (महान बलिदान) को अलग करता है, हालांकि शक्ति धर्मशास्त्र में मनुष्यों का संदर्भ प्रतीकात्मक है और आधुनिक समय में पुतले में किया जाता है। उदाहरण के लिए, कर्पुरादिस्तोत्रम में श्लोक 19 में सूचीबद्ध बलि के जानवर छह दुश्मनों के प्रतीक हैं, जिसमें "मनुष्य" गर्व या अहंकार का प्रतिनिधित्व करता है।
आज के समय में हिंदू समाज में पशु बलि:
आज के समाज में जबकि कुछ आधुनिक हिंदू पशु बलि से बचते हैं, किन्तु पूरे भारत में कई अपवाद हैं। सामान्य तौर पर, जहां पशु बलि का प्रचलन है, इसे कुछ देवताओं द्वारा बलि की मनाही है किन्तु अन्य देवी देवताओं द्वारा नहीं।
हालाँकि हिंदू भोजन प्रसाद आम तौर पर शाकाहारी होते हैं, किन्तु कहीं कहीं पर बलि चढ़ाए गए जानवरों की पेशकश प्रचलित है और "लोकप्रिय हिंदू धर्म में महत्वपूर्ण धार्मिकअनुष्ठान" बनी हुई है। पशु बलि पूर्वी भारत के असम , ओडिशा , झारखंड , पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा राज्यों के साथ-साथ नेपाल देश में भी प्रचलित है । बलिदान में बकरियों, मुर्गियों, कबूतरों और नर भैंसों को मारना शामिल है ।
पुणे जिले में कार्ला गुफाओं से सटे एकवीरा मंदिर में बकरियों और मुर्गे की बलि दी जाती है। महाराष्ट्र में, तुलजापुर में देवी भवानी को प्रसाद में बकरे के मांस की बलि दी जाती है।
भगवान विष्णु को समर्पित वैष्णव संप्रदाय, जिसका अधिकांश हिंदू पालन करते हैं, पशु बलि पर प्रतिबंध लगाता है।
भारत में यदि हम विस्तृत रूप से देखें तो भारत के अधिकतर राज्यों में सभी हिन्दू शाकाहारी नहीं हैं तथा साल के कुछ दिनों को छोड़ कर लगभग पुरे साल या खास खास मौकों पर व कुछ राज्यों में तो लगभग रोज चिकन,मटन या मछली खाना पसंद करते हैं.
पशु बलि के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक संस्कृत शब्द बाली है, जिसका मूल अर्थ सामान्य रूप से "श्रद्धांजलि, भेंट या बलिदान" है, अन्य चीजों के अलावा बली "एक जानवर की ह्त्या को संदर्भित करता है" और कभी-कभी इसे हिंदुओं के बीच झटका बली के रूप में भी जाना जाता है।
कालिका पुराण क्रमशः बकरियों, हाथी की धार्मिक अनुष्ठान के लिए हत्या के लिए बलि (बलिदान), महाबली (महान बलिदान) को अलग करता है, हालांकि शक्ति धर्मशास्त्र में मनुष्यों का संदर्भ प्रतीकात्मक है और आधुनिक समय में पुतले में किया जाता है। उदाहरण के लिए, कर्पुरादिस्तोत्रम में श्लोक 19 में सूचीबद्ध बलि के जानवर छह दुश्मनों के प्रतीक हैं, जिसमें "मनुष्य" गर्व या अहंकार का प्रतिनिधित्व करता है।
ब्राह्मण ग्रंथों (तैत्रीय ब्राह्मण) में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि वैदिक भारत में पांच प्राणी अवरोही क्रम में बलि के लिए उपयुक्त थे: मनुष्य, घोड़ा, मवेशी, भेड़ और बकरी। ऋग्वेद और अन्य वेदों के पाठ में पशु बलि सहित बलिदानों का विस्तृत विवरण मिलता है। "तैत्रीय ब्राह्मण में बताई गई कामयेष्टियों में न सिर्फ़ बैल और गाय की बलि का उल्लेख है बल्कि यह भी बताया गया है कि किस देवता को किस तरह के बैल या गाय की बलि दी जानी चाहिए."
"विष्णु को बलि चढ़ाने के लिए बौना बैल, वृत्रासुर के संहारक के रूप में इंद्र को लटकते सींग वाले और माथे पर चमक वाले सांड, पुशन के लिए काली गाय, रुद्र के लिए लाल गाय आदि.
"विष्णु को बलि चढ़ाने के लिए बौना बैल, वृत्रासुर के संहारक के रूप में इंद्र को लटकते सींग वाले और माथे पर चमक वाले सांड, पुशन के लिए काली गाय, रुद्र के लिए लाल गाय आदि.
प्राचीन बौद्ध ग्रंथों में भी ये स्पष्ट उल्लेख मिलते हैं कि "कुतादंत सुत्त" से एक रेखाचित्र तैयार किया जा सकता है जिसमें गौतम बुद्ध एक ब्राह्मण कुतादंत से जानवरों की बलि न देने की प्रार्थना करते हैं.
एक और प्राचीन बौद्ध ग्रन्थ बौद्ध ग्रंथ संयुक्त निकाय(111. .1-9) के उस अंश का हवाला भी दिया है जिसमें कौशल के राजा पसेंडी के यज्ञ का ब्यौरा मिलता है.
संयुक्त निकाय में लिखा है, "पांच सौ सांड, पांच सौ बछड़े और कई बछियों, बकरियों और भेड़ों को बलि के लिए खंभे की ओर ले जाया गया." ये वह समय था जब हर प्रकार की विपदा-विपत्ति चाहे प्राकर्तिक हो या मनुष्यों द्वारा जनित (एक समुदाय या कबीले के आक्रमण ) के लिए बड़े बड़े धार्मिक अनुष्ठान किये जाते थे जिसमें पशु बलि प्रमुख होती थी, कुछ समुदायों में तो तेरहवीं सदी तक मानव बलि का भी प्रचलन था.
अश्वमेध, (अश्वमेघ में घोड़े की पूर्ण भेंट मतलब घोड़े की बलि ) एक अनुष्ठान जिसमें एक घोड़े को एक वर्ष तक स्वतंत्र रूप से घूमने की अनुमति दी जाती थी,एक वर्ष के पश्चात् यदि घोडा वापस आ जाता था,तथा घोडा जहाँ जहां गया वह सारा भूभाग राजा के अधिकार क्षेत्र में मान लिया जाता था, फिर अंत में घोड़े की बलि दी जाती थी, इसका उल्लेख यजुर्वेद जैसे वैदिक ग्रंथों में किया गया है ।
महाकाव्य महाभारत में, कुरुक्षेत्र युद्ध जीतने के बाद चक्रवर्ती सम्राट बनने के लिए युधिष्टर अश्वमेध करते हैं । हालाँकि, महाभारत में चेदि राजा उपरीचर वसु द्वारा किए गए अश्वमेध का वर्णन भी है ।
गुप्त साम्राज्य,चालुक्य वंश और चोल वंश के सभी शासकों ने अश्वमेध किया।
आज के समाज में जबकि कुछ आधुनिक हिंदू पशु बलि से बचते हैं, किन्तु पूरे भारत में कई अपवाद हैं। सामान्य तौर पर, जहां पशु बलि का प्रचलन है, इसे कुछ देवताओं द्वारा बलि की मनाही है किन्तु अन्य देवी देवताओं द्वारा नहीं।
हालाँकि हिंदू भोजन प्रसाद आम तौर पर शाकाहारी होते हैं, किन्तु कहीं कहीं पर बलि चढ़ाए गए जानवरों की पेशकश प्रचलित है और "लोकप्रिय हिंदू धर्म में महत्वपूर्ण धार्मिकअनुष्ठान" बनी हुई है। पशु बलि पूर्वी भारत के असम , ओडिशा , झारखंड , पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा राज्यों के साथ-साथ नेपाल देश में भी प्रचलित है । बलिदान में बकरियों, मुर्गियों, कबूतरों और नर भैंसों को मारना शामिल है ।
उदाहरण के लिए, नेपाल में सबसे बड़े पशु बलि में से एक, तीन दिवसीय गढ़ीमाई उत्सव के दौरान 2009 में यह अनुमान लगाया गया था कि 2,50,000 से अधिक जानवर मारे गए थे जबकि उत्सव में 50 लाख श्रद्धालु शामिल हुए थे। नेपाल सरकार द्वारा 2015 में गढ़ीमाई उत्सव पर प्रतिबंध लगा दिया गया था।
पुणे जिले में कार्ला गुफाओं से सटे एकवीरा मंदिर में बकरियों और मुर्गे की बलि दी जाती है। महाराष्ट्र में, तुलजापुर में देवी भवानी को प्रसाद में बकरे के मांस की बलि दी जाती है।
भगवान विष्णु को समर्पित वैष्णव संप्रदाय, जिसका अधिकांश हिंदू पालन करते हैं, पशु बलि पर प्रतिबंध लगाता है।
किन्तु देवताओं को प्रसन्न करने के लिए बलि का प्रयोग आजकल भी चुपचाप किया जाता है। बलि प्रथा के अंतर्गत बकरा, मुर्गा या भैंसे की बलि दिए जाने का प्रचलन है। हिन्दू धर्म में खासकर मां काली और काल भैरव को बलि चढ़ाई जाती है।
क्या हिन्दू धर्म में गाय की भी बलि दी जाती थी ?
ऋग्वेद की माने तो "हाँ" प्राचीन काल में (ईसा पूर्व छटवीं शताब्दी- लगभग 2600 साल) बौद्ध धर्म के उत्थान से पहले हिन्दू धर्म के कुछ खास अनुष्ठानों में ऐसा उल्लेख देखने-पढ़ने को मिलता है, भारत में बौद्ध धर्म के भारत में प्रसार के बाद, जब हिन्दू धर्म फिर से अपनाया जाने लगा तब उसमें बौद्ध धर्म की कुछ विषेशताएं समाहित कर ली गयी जिसमें खासतौर पर शाकाहार और अहिंसा था, वैष्णव धर्म में आस्था रखने वाले मांसाहार व पशु हत्या को अधार्मिक या प्रतिबंधित मानते हैं.
उत्तर भारत के अधिकांश हिन्दू इसी (वैष्णव मत) धर्म को हिन्दू धर्म समझते हैं, किन्तु हिन्दू धर्म की दुसरी शाखाएं भी हैं,जैसे शैव मत (शिव को मानने वाले), जैन मत,बौद्ध मत आदि.
जैन मत वैसे तो हिन्दू धर्म की ही शाखा माना जाता है, किन्तु इसकी मान्यताएं हिन्दू धर्म से थोड़ी अलग हैं, तथा इसमें पूर्ण रूप से अहिंसा को सर्वोपरि मन जाता है.
हिंदू धर्म में गाय को पवित्र दर्जा प्राप्त है. किन्तु प्राचीन काल में, हिंदू धर्म में गाय की बलि देकर देवताओं को चढ़ाया जाता था और इसका मांस खाया जाता था या नहीं इस पर स्पष्ट नहीं है. ऋग्वेद (10. 91.14) में लिखा है कि अग्निदेव के लिए घोड़े, बैल, सांड, बांझ गाय और भेड़ों की बलि दी गई.
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