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कच्चाथिवू द्वीप: कहाँ है ?  


कच्चाथिवू आज के श्री लंका द्वारा 1921 से नियंत्रित एक निर्जन द्वीप है. ब्रिटिश भारत के पास इसको नियंत्रण के 1920 तक होने के साक्ष हैं, ब्रिटिश इंडिया के समय ब्रिटिश आर्मी इस द्वीप का प्रयोग शूटिंग रेंज की तरह करती थी किन्तु उन्होंने भी यहाँ पर अपना कोई बेस या नियंत्रण चौकी नहीं बनाई थी. 

यह द्वीप श्रीलंका के नेदुनथीवू और भारत के रामेश्वरम के बीच स्थित है. 1974 तक इस द्वीप को श्रीलंका के तथा भारत के मछुवारों द्वारा मछली पकड़ने के दौरान अपनी नौकाओं व जाल की मरम्मत, सूखने और आराम करने आदि में किया जाता था. फिर 1974 में श्रीलंका व भारत के तत्कालीन प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने  इसे श्री लंका द्वारा अधिकृत करने के श्रीलंका भारत सामुद्रिक सीमा के अंतर्गत स्वीकार कर लिया था.

1976 में एक बार फिर श्रीलंका भारत सामुद्रिक समझोते के अंतर्गत  दोनों देशों के मछुवारों को एक दूसरे के विशेष आर्थिक क्षेत्रों में मछली पकड़ने से प्रतिबंधित कर दिया था.

द्वीप का इतिहास: 

इस द्वीप का उल्लेख "निसानका मल्ला" (1187- 1196 AD) जो श्री लंका का राजा था, के शिलालेखों में किया है, 17 वीं शताब्दी के आसपास इसका कंट्रोल ब्रिटिश इंडिया की मद्रास प्रेसीडेंसी के पास रहा. 

1920 तक इस द्वीप के लिया ब्रिटिश कोलोनिअल गवर्नमेंट और श्रीलंकन कोलोनिअल गवर्नमेंट के बीच विवाद का कारण  रहा था।  भारतीय दृष्टिकोण यह था कि यह द्वीप भारत का हिस्सा था क्योंकि यह रामनाद के राजा के जमींदार का था, जबकि श्रीलंका के दृष्टिकोण से यह द्वीप जाफना (श्रीलंका) सूबे  का था। 1921 तक, दोनों पक्ष एक सीमा पर सहमत हुए जिसके बाद इस द्वीप को श्रीलंकाई क्षेत्र के भीतर डाल दिया गया था. 

1974 के भारत श्रीलंका समझौते के खिलाफ स्थानांतरण की वैधता को भारतीय सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई क्योंकि मान्यता को भारतीय संसद द्वारा अनुमोदित नहीं किया गया था। यह एक ऐसे द्वीप की पहचान है जो तमिलनाडु राज्य के मछुआरों के लिए सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण है. 

यह द्वीप दोनों देशों के मछुआरों द्वारा उपयोग किए जाने वाले मछली पकड़ने के मैदान के लिए भी महत्वपूर्ण है। भारत-श्रीलंका समझौता भारतीय मछुआरों को कच्चाथीवू के आसपास मछली पकड़ने और द्वीप पर अपने जाल सुखाने की अनुमति देता है, तथा इस द्वीप में एक कैथोलिक चर्च है जो दोनों देशों के भक्तों को आकर्षित करता है.

मुख्य समस्या लगातार बढ़ती जा रही है क्योंकि अधिक से अधिक मछुआरे अवैध शिकार के लिए श्रीलंकाई समुद्री क्षेत्र में चले जा रहे हैं। 2010 में श्रीलंका सरकार ने तमिलनाडु सरकार को एक नोटिस जारी कर कहा कि भारतीय अदालत 1974 के समझौते को रद्द नहीं कर सकती।

जून 2011 में तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे. जयललिता के नेतृत्व वाली नई तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की कि कच्चातिवु को श्रीलंका को सौंपने के लिए भारत और श्रीलंका के बीच 1974 और 1976 के समझौतों की घोषणा की गई थी। वह असंवैधानिक है, अदालत ने बेरुबारी मामले में फैसला सुनाया कि भारतीय क्षेत्र को दूसरे देश में सौंपने को संविधान में संशोधन के माध्यम से संसद द्वारा अनुमोदित किया जाना चाहिए।

फरवरी 2014 में भारत सरकार ने कहा, "भारत का कोई भी क्षेत्र नहीं छोड़ा गया और न ही संप्रभुता छोड़ी गई क्योंकि यह क्षेत्र विवाद में था और इसका कभी सीमांकन नहीं किया गया था।" सरकार ने कहा कि समझौतों के लिए संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता नहीं है क्योंकि कोई भी क्षेत्र नहीं दिया गया है।

अब सवाल यह आता है की प्रधान मंत्री मोदी इस मुद्दे को अब चुनाव के समय क्यों उछाल रहे हैं ? जबकि ऐतिहासिक साक्ष कुछ और कह रहे हैं, इस द्वीप को कभी भारतीय क्षेत्रों में नोटिफाई या मापा नहीं गया.
क्या प्रधान मंत्री मोदी इसको भी चुनाव में फायदा लेने के लिए जनता में गलत सन्देश देना चाहते हैं ?

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