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चीफ जस्टिस सूर्यकान्त- सवाल पूछने वाले बेरोजगार "कॉकरोच"

CJI Surya Kant Controversy:  



न्यायपालिका का गिरता स्तर : देशभर में बवाल, क्या सवाल पूछना अब गुनाह है?

“जो सवाल पूछेगा वो कॉकरोच?” — CJI के बयान पर देशभर में गुस्सा

NB7-Delhi: देश की सबसे बड़ी अदालत के मुख्य न्यायाधीश के एक बयान ने इस समय पूरे देश 

में बहस छेड़ दी है। Supreme Court में सुनवाई के दौरान भारत के Chief Justice Justice Surya 

Kant द्वारा इस्तेमाल किए गए “cockroaches” यानी “कॉकरोच” शब्द को लेकर सोशल मीडिया पर 

जबरदस्त विवाद खड़ा हो गया है।

कई लोगों का आरोप है कि यह बयान बेरोजगार युवाओं, RTI एक्टिविस्टों और सरकार से सवाल 

पूछने वालों का अपमान है। वहीं कुछ लोग इसे न्यायपालिका की भाषा और मर्यादा के गिरते स्तर का 

उदाहरण बता रहे हैं।

दूसरी तरफ CJI समर्थकों का कहना है कि उनके बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया और 

उनका इशारा उन लोगों की तरफ था जो फर्जी डिग्री लेकर सिस्टम पर हमला करते हैं

किन्तु फर्जी डिग्री वाले तो देश चला रहे, फिर सवाल पूछना गुनाह कैसे ?

लेकिन सवाल अब सिर्फ एक बयान का नहीं रहा। सवाल यह उठ रहा है कि क्या देश की सबसे बड़ी 

अदालत की भाषा भी अब राजनीतिक बहस जैसी होती जा रही है?


आखिर CJI ने क्या कहा था?

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, Supreme Court में एक मामले की सुनवाई के दौरान CJI Surya 

Kant ने कहा:“There are youngsters like cockroaches…”

उन्होंने आगे कुछ ऐसे लोगों का जिक्र किया जो खुद को एक्टिविस्ट या मीडिया व्यक्ति बताकर 

संस्थाओं पर हमला करते हैं।

बस यही लाइन सोशल मीडिया पर वायरल हो गई।

देखते ही देखते X (पहले Twitter), Facebook और YouTube पर #CockroachRemark ट्रेंड 

करने लगा। हजारों लोगों ने सवाल उठाया कि क्या बेरोजगार युवा अब न्यायपालिका की नजर में 

“कॉकरोच” हैं?

बाद में CJI ने दी सफाई:

विवाद बढ़ने के बाद Chief Justice Surya Kant ने कहा कि मीडिया ने उनके बयान को “misquote” 

किया है। उन्होंने कहा कि उनका इरादा सभी युवाओं का अपमान करना नहीं था।

उन्होंने कहा:

“मैं भारत के युवाओं पर गर्व करता हूं।”

CJI का कहना था कि उनका निशाना वे लोग थे जो फर्जी डिग्री या झूठी पहचान के सहारे संस्थाओं को 

बदनाम करते हैं। लेकिन तब तक मामला काफी आगे बढ़ चुका था।


सोशल मीडिया पर लोगों ने क्या कहा?

सोशल मीडिया पर लोगों ने इस बयान की जमकर आलोचना की।

कई यूजर्स ने लिखा:

-“सरकार से सवाल पूछो तो देशद्रोही कह देते हैं, अब कॉकरोच भी कहने लगे?”

-“बेरोजगारी पर जवाब नहीं है इसलिए युवाओं को अपमानित किया जा रहा है।”

-“न्यायपालिका से ऐसी भाषा की उम्मीद नहीं थी।”

कुछ लोगों ने पुराने Chief Justice के बयान शेयर किए और कहा कि पहले अदालत की भाषा ज्यादा 

संतुलित और गरिमामयी हुआ करती थी।


पुराने CJI और उनकी तटस्थ छवि

भारत में कई Chief Justice ऐसे रहे जिन्हें उनकी निष्पक्षता और संतुलित भाषा के लिए याद किया जाता है।

1. Justice J. S. Verma

Justice Verma को संविधान और मानवाधिकारों के मजबूत समर्थक के रूप में देखा जाता था। 

2012 के निर्भया कांड के बाद बनी Verma Committee ने महिलाओं की सुरक्षा को लेकर बड़े 

सुझाव दिए थे।

उनकी छवि किसी सरकार को खुश करने वाले जज की नहीं बल्कि संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करने 

वाले न्यायाधीश की थी।

2. Justice R. M. Lodha

Justice Lodha ने अपने कार्यकाल में कई बार सरकारी एजेंसियों और भ्रष्टाचार के मामलों पर सख्त 

टिप्पणी की।

उन्होंने कहा था:

“कानून से ऊपर कोई नहीं।”

उनके समय में Supreme Court को सत्ता से स्वतंत्र संस्था के रूप में देखा जाता था।

3. Justice T. S. ठाकुर

2016 में एक कार्यक्रम के दौरान Justice T. S. ठाकुर प्रधानमंत्री Narendra Modi के सामने ही 

भावुक हो गए थे और जजों की कमी का मुद्दा उठाया था।

उन्होंने कहा था कि देश में लाखों केस लंबित हैं और न्यायपालिका को मजबूत करने की जरूरत है।

उस समय लोगों ने इसे न्यायपालिका की स्वतंत्र आवाज माना था।

4. Justice N. V. Ramana

Justice Ramana ने खुलकर कहा था:

“लोकतंत्र में असहमति एक safety valve है। अगर आप इसे बंद कर देंगे तो प्रेशर कुकर फट 

जाएगा।”

यह बयान उस समय काफी वायरल हुआ था और लोगों ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों के समर्थन के 

रूप में देखा था।

5. Justice D. Y. Chandrachud

Justice Chandrachud को आधुनिक और उदार सोच वाले Chief Justice के रूप में देखा गया। 

निजता का अधिकार, LGBTQ अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे मामलों में उनके फैसले चर्चा 

में रहे।

उन्होंने कई बार कहा कि अदालत का काम नागरिक अधिकारों की रक्षा करना है, चाहे सत्ता में 

कोई भी हो। 


अब न्यायपालिका को लेकर सवाल क्यों उठ रहे हैं?

पिछले कुछ सालों में Supreme Court और High Courts को लेकर आम जनता के बीच कई सवाल 

उठे हैं।

1. बड़े मामलों में देरी

लोग सवाल पूछते हैं कि:

-चुनावी बॉन्ड मामला,

-Pegasus जासूसी विवाद,

-बेरोजगारी,

-ED और CBI के इस्तेमाल,

पत्रकारों की गिरफ्तारी,

जैसे मामलों में अदालतें उतनी तेजी नहीं दिखातीं जितनी पहले दिखती थीं।

2. जजों की नियुक्ति पर विवाद


सरकार और Supreme Court के बीच Collegium System को लेकर लंबे समय से विवाद चलता 

रहा है।

कई बार विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि सरकार “अपने पसंद” के जज चाहती है जबकि सरकार 

कहती है कि न्यायपालिका में पारदर्शिता नहीं है।


3. अदालतों की भाषा पर सवाल


पहले अदालतों की भाषा बहुत संतुलित मानी जाती थी। लेकिन हाल के वर्षों में कुछ जजों की मौखिक 

टिप्पणियां सोशल मीडिया पर विवाद का कारण बनी हैं।


लोगों का कहना है कि:

-अदालत को राजनीतिक भाषा से ऊपर रहना चाहिए,

-जजों के शब्दों का असर बहुत बड़ा होता है,

-इसलिए उन्हें ज्यादा संयम रखना चाहिए।


क्या सरकार से सवाल पूछना गलत है?

सीधा जवाब है — नहीं।



भारतीय संविधान हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है।

इसका मतलब:

-आप सरकार से सवाल पूछ सकते हैं,

-बेरोजगारी पर सवाल उठा सकते हैं,

-महंगाई, भ्रष्टाचार, कानून व्यवस्था पर बोल सकते हैं,

-RTI डाल सकते हैं,

-अदालत के फैसलों की आलोचना भी कर सकते हैं।


-जब तक कोई हिंसा, झूठ या नफरत नहीं फैला रहा, तब तक सवाल पूछना लोकतंत्र का हिस्सा माना 

जाता है।

-दरअसल लोकतंत्र की असली ताकत ही सवाल पूछने में होती है।


बेरोजगारी क्यों बना बड़ा मुद्दा?


भारत में बेरोजगारी पिछले कई सालों से बड़ा मुद्दा बनी हुई है।

सरकारी नौकरियों की तैयारी करने वाले लाखों युवा:

-पेपर लीक,

-भर्ती में देरी,

-रिजल्ट अटकने,

-कम नौकरियों,

जैसी समस्याओं से परेशान हैं।

SSC, रेलवे, पुलिस भर्ती और राज्य स्तरीय परीक्षाओं में लगातार देरी को लेकर युवाओं ने कई बार 

प्रदर्शन भी किए हैं। 

ऐसे माहौल में “कॉकरोच” जैसे शब्द का इस्तेमाल लोगों को और ज्यादा चुभ गया।


विपक्ष ने क्या कहा?


कई विपक्षी नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस बयान की आलोचना की।

कुछ नेताओं ने कहा:


“जब युवा नौकरी मांगता है तो उसे देशद्रोही, अर्बन नक्सल या अब कॉकरोच कहा जाता है।”

हालांकि सरकार की तरफ से इस विवाद पर कोई बड़ी आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई।


क्या न्यायपालिका की छवि बदल रही है?


यही सबसे बड़ा सवाल है।

एक समय था जब Supreme Court को आम जनता अंतिम उम्मीद मानती थी। Emergency के बाद 

से लेकर कई बड़े मामलों तक अदालत ने सरकारों को चुनौती दी।

लेकिन अब सोशल Media पर एक बड़ा वर्ग मानता है कि:

-न्यायपालिका पहले जितनी आक्रामक नहीं रही,

-सत्ता के खिलाफ कम बोलती है,

-संवेदनशील मामलों में देरी करती है।

हालांकि दूसरी तरफ कई लोग अब भी मानते हैं कि भारतीय न्यायपालिका दुनिया की सबसे मजबूत 

संस्थाओं में से एक है और अदालतें लगातार लोकतंत्र को बचाने का काम कर रही हैं।

सच शायद इन दोनों के बीच कहीं है।

CJI Surya Kant का “कॉकरोच” बयान सिर्फ एक लाइन का विवाद नहीं रह गया है। इसने कई बड़े 

सवाल खड़े कर दिए हैं:

क्या संस्थाओं की भाषा बदल रही है?

क्या लोकतंत्र में सवाल पूछना अब लोगों को परेशान करता है?

क्या न्यायपालिका की तटस्थ छवि कमजोर हुई है?

और सबसे बड़ा सवाल — क्या आम नागरिक की आवाज को सम्मान मिल रहा है?

लोकतंत्र में सरकार, अदालत, मीडिया — सभी की आलोचना हो सकती है। लेकिन साथ ही 

सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों की जिम्मेदारी भी ज्यादा होती है।

क्योंकि उनके शब्द सिर्फ शब्द नहीं होते — वे करोड़ों लोगों के भरोसे को प्रभावित करते हैं।