इजराइल में नेतन्याहू की सत्ता पर संकट: क्या बदलेगा ईरान-अमेरिका संघर्ष और भारत की विदेश नीति का समीकरण?
चुनाव में बहुमत से दूर हुआ नेतन्याहू का गठबंधन। अरब पार्टियों की बढ़ी ताकत और विपक्ष की चुनौती के बीच पूरी दुनिया की नजर इजराइल की अगली सरकार पर है। भारत के लिए यह बदलाव क्यों महत्वपूर्ण है?
1. चुनाव में नेतन्याहू को झटका, लेकिन सत्ता से विदाई तय नहीं
इजराइल के हालिया चुनाव में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाले गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। अंतिम चुनावी आंकड़ों के अनुसार, नेतन्याहू के समर्थन वाले खेमे को 53 सीटें मिलीं। मुख्य विपक्षी खेमे के खाते में 48 सीटें आईं, जबकि अरब पार्टियों ने मिलकर 19 सीटें हासिल कीं।
इजराइल की संसद यानी नेसेट में कुल 120 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है। इस लिहाज से कोई भी खेमा अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में नहीं है।
इन नतीजों का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश यह है कि नेतन्याहू का पुराना बहुमत टूट गया है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह तुरंत प्रधानमंत्री पद छोड़ देंगे। इजराइल में सरकार गठबंधन से बनती है। इसलिए अब असली लड़ाई चुनाव के बाद शुरू होगी—कौन किसके साथ समझौता करता है और किसे 61 सांसदों का समर्थन मिलता है।
2. अरब पार्टियों की 19 सीटें क्यों महत्वपूर्ण हैं?
इस चुनाव में अरब पार्टियों का प्रदर्शन खास चर्चा में है। उन्हें कुल 19 सीटें मिली हैं, जो इजराइल की राजनीति में उनकी अब तक की सबसे बड़ी संसदीय ताकत बताई जा रही है। इन सीटों के कारण सरकार गठन का गणित और जटिल हो गया है।
विपक्ष के सामने चुनौती यह है कि क्या वह अरब पार्टियों के समर्थन से सरकार बनाने की कोशिश करेगा? इजराइल की राजनीति में इस मुद्दे पर गहरा मतभेद है। कुछ विपक्षी नेता अरब पार्टियों के साथ औपचारिक गठबंधन को लेकर असहज हैं। दूसरी ओर, उनके समर्थन के बिना 61 सीटों तक पहुंचना कठिन हो सकता है।
नेतन्याहू के लिए भी यह स्थिति चुनौतीपूर्ण है। उन्हें अपने पुराने सहयोगियों को साथ रखने के अलावा ऐसे दलों या सांसदों का समर्थन जुटाना होगा जो अभी उनके गठबंधन का हिस्सा नहीं हैं। इसलिए फिलहाल दो संभावनाएं हैं—नेतन्याहू नए सहयोगियों के साथ सरकार बनाने में सफल हों या विपक्ष कोई वैकल्पिक गठबंधन तैयार करे।
3. क्या नई सरकार ईरान के साथ युद्ध की नीति बदल देगी?
यह इस चुनाव का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय सवाल है। फरवरी 2026 में इजराइल और अमेरिका ने ईरान पर सैन्य कार्रवाई की थी। इसके बाद संघर्ष में ईरान और खाड़ी क्षेत्र के कई ठिकाने भी प्रभावित हुए। बड़े पैमाने की लड़ाई को रोकने के लिए पाकिस्तान की मध्यस्थता से युद्धविराम की कोशिश हुई और जून में एक समझौता भी सामने आया। लेकिन तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।
अक्टूबर के अंतिम दिनों में भी समुद्री क्षेत्र में जहाजों पर हमले और होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास सुरक्षा संबंधी घटनाओं की खबरें आई हैं। इसका अर्थ है कि युद्धविराम या बातचीत के प्रयासों के बावजूद क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित नहीं हुई है।
ऐसी स्थिति में इजराइल की नई सरकार का रुख महत्वपूर्ण होगा। यदि नेतन्याहू सत्ता में बने रहते हैं, तो ईरान के प्रति उनकी कठोर नीति जारी रहने की संभावना है। यदि विपक्ष सरकार बनाता है, तो वह सैन्य कार्रवाई के तरीकों, युद्ध के खर्च और अमेरिका के साथ तालमेल की समीक्षा कर सकता है।
लेकिन यहां एक जरूरी बात समझनी होगी—सरकार बदलने से इजराइल की सुरक्षा चिंताएं अपने आप समाप्त नहीं होंगी। ईरान का परमाणु कार्यक्रम, मिसाइल क्षमता, क्षेत्रीय प्रभाव और इजराइल की सुरक्षा को लेकर चिंता वहां की राजनीति में व्यापक मुद्दे हैं। इसलिए नई सरकार भी ईरान के प्रति पूरी तरह नरम हो जाएगी, ऐसा मानना जल्दबाजी होगी।
4. अमेरिका की भूमिका: इजराइल की सरकार बदले, नीति कितनी बदलेगी?
इजराइल की सुरक्षा नीति में अमेरिका की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। हथियार, सैन्य तकनीक, खुफिया सहयोग और कूटनीतिक समर्थन—इन सभी क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच गहरा संबंध है। लेकिन अमेरिका की अपनी रणनीतिक प्राथमिकताएं भी हैं।
अमेरिका के लिए ईरान का परमाणु कार्यक्रम, खाड़ी क्षेत्र में तेल और गैस की आपूर्ति, समुद्री मार्गों की सुरक्षा तथा क्षेत्रीय सैन्य संतुलन महत्वपूर्ण हैं। इसलिए इजराइल में सरकार बदलने के बाद भी अमेरिका की सभी नीतियां अचानक बदल जाएंगी, यह जरूरी नहीं है।
यदि नई इजराइली सरकार युद्ध को सीमित रखने और बातचीत का रास्ता अपनाने की कोशिश करती है, तो अमेरिका को कूटनीतिक अवसर मिल सकता है। लेकिन यदि ईरान और इजराइल के बीच कोई नया सैन्य टकराव होता है, तो अमेरिका पर फिर से हस्तक्षेप का दबाव बन सकता है।
इसलिए इजराइल का चुनाव अमेरिका के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन ईरान के साथ उसका पूरा संबंध केवल इजराइल की सरकार के फैसले से तय नहीं होगा।
5. भारत के लिए इजराइल का चुनाव इतना महत्वपूर्ण क्यों?
भारत के लिए इजराइल केवल पश्चिम एशिया का एक देश नहीं है। दोनों देशों के बीच रक्षा, कृषि, जल प्रबंधन, साइबर सुरक्षा, तकनीक और नवाचार के क्षेत्रों में सहयोग है। फरवरी 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजराइल यात्रा के दौरान दोनों देशों ने अपने संबंधों को 'विशेष रणनीतिक साझेदारी' के स्तर तक बढ़ाने की घोषणा की थी।
इसका मतलब है कि भारत और इजराइल के संबंध किसी एक नेता या एक चुनाव तक सीमित नहीं हैं। इन संबंधों के पीछे दीर्घकालिक राष्ट्रीय हित हैं। फिर भी इजराइल में राजनीतिक बदलाव से इन सहयोगों की गति और प्राथमिकताओं पर असर पड़ सकता है।
रक्षा सहयोग
सैन्य तकनीक, सुरक्षा उपकरण, रक्षा अनुसंधान और भविष्य की परियोजनाएं भारत के लिए महत्वपूर्ण हैं।
तकनीक और कृषि
पानी बचाने की तकनीक, कृषि अनुसंधान, साइबर सुरक्षा और नई तकनीक में सहयोग उपयोगी है।
व्यापार और ऊर्जा
पश्चिम एशिया में अस्थिरता भारत की ऊर्जा आपूर्ति, व्यापार और समुद्री परिवहन को प्रभावित कर सकती है।
भारत की चुनौती यह है कि उसे इजराइल के साथ अपने मजबूत संबंध बनाए रखने हैं, लेकिन ईरान और अरब देशों के साथ अपने हितों की भी रक्षा करनी है। भारत के लिए पश्चिम एशिया में केवल एक देश के साथ संबंध मजबूत करना पर्याप्त नहीं है। पूरे क्षेत्र में स्थिरता जरूरी है।
6. भारत की विदेश नीति: इजराइल के साथ दोस्ती, ईरान से संवाद
भारत की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण आधार यह है कि वह अलग-अलग देशों के साथ अपने संबंधों को अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार आगे बढ़ाता है। इजराइल के साथ रक्षा और तकनीकी सहयोग है, तो ईरान के साथ भी भारत के रणनीतिक और आर्थिक हित जुड़े हैं।
ईरान भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक पहुंच के रास्तों में एक भूमिका निभाता है। इसके अलावा, खाड़ी क्षेत्र में किसी बड़े संघर्ष का असर भारत के तेल आयात, समुद्री व्यापार और वहां काम करने वाले भारतीय नागरिकों पर पड़ सकता है।
भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने मार्च 2026 में संसद में पश्चिम एशिया की स्थिति पर सरकार का पक्ष रखते हुए कहा था कि भारत सभी पक्षों से संयम बरतने, तनाव बढ़ने से रोकने और बातचीत तथा कूटनीति को प्राथमिकता देने का आग्रह करता है।
यह रुख भारत की व्यावहारिक जरूरतों से जुड़ा है। भारत न तो इजराइल से अपने संबंध कमजोर करना चाहता है और न ही ईरान तथा अरब देशों के साथ अपने हितों को नुकसान पहुंचाना चाहता है।
| भारत का हित | संभावित चुनौती |
|---|---|
| इजराइल के साथ रक्षा सहयोग | युद्ध और राजनीतिक बदलाव से परियोजनाओं की प्राथमिकताएं प्रभावित हो सकती हैं। |
| ईरान के साथ संपर्क और क्षेत्रीय सहयोग | अमेरिका-ईरान तनाव से आर्थिक और कूटनीतिक दबाव बढ़ सकता है। |
| खाड़ी क्षेत्र से ऊर्जा और व्यापार | समुद्री मार्गों में असुरक्षा से तेल की कीमत और आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। |
7. भारत के सामने तीन बड़ी चुनौतियां
इजराइल में सरकार गठन और ईरान के साथ संघर्ष की दिशा स्पष्ट होने तक भारत को तीन मोर्चों पर सतर्क रहना होगा।
पहली चुनौती: रक्षा संबंधों को स्थिर रखना
भारत को इजराइल के साथ चल रहे रक्षा और तकनीकी सहयोग को राजनीतिक बदलाव से अलग रखते हुए आगे बढ़ाने की कोशिश करनी होगी। किसी भी नई सरकार के साथ काम करने के लिए कूटनीतिक संपर्क बनाए रखना जरूरी होगा।
दूसरी चुनौती: ईरान और अमेरिका के बीच संतुलन
भारत के अमेरिका के साथ भी व्यापक संबंध हैं और ईरान के साथ भी उसके अपने हित हैं। यदि दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ता है, तो भारत को अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों की रक्षा करते हुए संवाद का रास्ता बनाए रखना होगा।
तीसरी चुनौती: ऊर्जा और समुद्री सुरक्षा
होर्मुज जलडमरूमध्य और आसपास के समुद्री मार्गों में अस्थिरता भारत के लिए सीधा आर्थिक जोखिम बन सकती है। तेल की कीमतों में बढ़ोतरी, जहाजों की सुरक्षा और व्यापारिक लागत में वृद्धि का असर भारतीय अर्थव्यवस्था तक पहुंच सकता है।
निष्कर्ष: इजराइल का चुनाव भारत के लिए चेतावनी भी, अवसर भी
इजराइल के चुनाव ने नेतन्याहू की राजनीतिक स्थिति कमजोर की है, लेकिन उनकी सत्ता समाप्त होना अभी तय नहीं है। सरकार गठन की प्रक्रिया और नए गठबंधन का स्वरूप ही आगे की दिशा तय करेगा।
यदि इजराइल में नई सरकार बनती है और वह ईरान के साथ टकराव कम करने की कोशिश करती है, तो पश्चिम एशिया में कूटनीति के लिए कुछ जगह बन सकती है। लेकिन क्षेत्रीय सुरक्षा के पुराने विवाद बने रहने पर तनाव फिर बढ़ सकता है।
भारत के लिए सबसे समझदारी भरा रास्ता यही है कि वह इजराइल के साथ अपने रणनीतिक संबंध मजबूत रखे, ईरान और अरब देशों के साथ संवाद जारी रखे और अमेरिका के साथ अपने हितों पर स्पष्ट बातचीत करे।
भारत की विदेश नीति की असली परीक्षा किसी एक पक्ष का समर्थन करने में नहीं, बल्कि बदलते हालात में अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने में है।
