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Baba Saheb Bhimrav Ambedkar

 बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर (14अप्रेल1881-06 दिसंबर 1956) 


बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर की सोच व विचार आज भी है प्रासंगिक।

आजादी के 75 साल बाद भी भारतियों को उन्हीं विचारों की जरूरत है, जिनके लिए आजादी के पहले देश के महन  नेताओं ने लम्बे समय तक संघर्ष किया था. 

भारत का संविधान लिखते समय बाबा साहेब के विचारों से बहुत से नेता सहमत नहीं थे, जिसमें सबको समानता का अधिकार (पुरुष प्रधान समाज में स्त्रियों को बराबरी) जैसे विषय भी थे. उस समय में भी कुछ नेता ऐसे भी थे जो दबे कुचले पिछड़ों को संसद में नहीं देखना चाहते थे. किन्तु समय की परख रखने के कारण, ये छोटे छोटे मुद्दे जो बाद में आधुनिक भारत के विकास में रोड़ा बन सकते थे, के लिए भी बाबा साहेब ने अपने  समकालीन नेताओं को मना लिया था. 

 शिक्षा से सम्मान : अत्यंत गरीब दलित परिवार से होते हुवे भी उन्होंने भारतियों को जातिगत भेदभाव से ग्रसित समाज में,जब जाति आधारित उच्च वर्ग निम्न वर्ग को जानवरों से भी बदतर समझाता था, दिखाया कि मन में इच्छा और दृढ़ संकल्प हो तो कुछ भी किया जा सकता है. 

1913 में बॉम्बे के एल्फिस्टन कॉलेज से स्नातक की डिग्री लेने के बाद, उच्च शिक्षा के लिए वे अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय चले गए थे. किन्तु अपने ज्ञान को बढ़ाने और अपनी पढाई का खर्च निकलने  के लिए, बाबा साहेब ने बड़ौदा के सयाजीराव गायकवाड़ महाराज से आर्थिक मदद ली थी, किन्तु इस आर्थिक मदद के बदले पढाई पूरी होने पर महाराज के लिए बतौर कानून सलाहकार की नौकरी करनी पड़ेगी का बॉन्ड भरना पड़ा था. 

उन्होंने अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, राजनीति विज्ञान, एथिक्स और मानवविज्ञान का अध्ययन किया. 1915 में 'भारत का प्राचीन व्यापार' विषय पर थीसिस प्रस्तुत करने के बाद उन्हें एमए की डिग्री हासिल की थी, 1916 में उन्होंने 'भारत का राष्ट्रीय लाभांश' थीसिस पुरी की थी. 

बड़ौदा के महाराज सायाजीराव गायकवाड़ से आगे की पढ़ाई करने की अनुमति मांग कर, वो अर्थशास्त्र और क़ानून की उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए लंदन चले गए. उन्होंने अर्थशास्त्र में शिक्षा के लिए लंदन स्कूल ऑफ़ इकॉनामिक्स में दाख़िला लिया, जबकि क़ानून की पढ़ाई के लिए ग्रेज़ इन में नामांकन लिया. किन्तु 1917 में  बड़ोदा के महाराज से मिलने वाली आर्थिक सहायता के बंद होने पर उन्हें वापस आकर महाराज के यहाँ नौकरी करनी पडी थी. किन्तु बड़ोदा में महाराज की नौकरी करते समय उन्हें अत्यधिक जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ रहा था. इससे परेशान होकर वे बम्बई आ गए. बम्बई में कुछ समय कॉलेज में पढ़ाने लगे, किन्तु  जल्द हीअपनी पढाई पूरी करने लन्दन पहुँच गए.

लन्दन से उन्होंने पैसा और समय बचाने के लिए, एक ही साल में 18-18 घंटे पढाई और लगन के कारण कानून और अर्थशास्त्र की दो डिग्री हासिल कर ली थी.  1923 में लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स ने उनकी थीसिस को मान्यता दी और उन्हें डॉक्टर ऑफ़ साइंस की उपाधि से सम्मानित किया. एक ही वर्ष में वे डॉक्टर (पीएचडी) और बैरिस्टर बन गए थे.

ब्रिटिश सरकार ने डॉ. आंबेडकर को ढाई हज़ार रुपये महीने की पगार  (जो लगभग आज के ढाई लाख से भी ज्यादा होगी ) पर ज़िला न्यायाधीश की नौकरी का प्रस्ताव दिया था. जो बेहद आकर्षक था लेकिन उन्होंने ब्रिटिश सरकार की नौकरी ठुकरा दी थी. उन्होंने अपने लेखों में इस बात का खुलासा भी किया "मैंने ज़िला न्यायाधीश सहित कोई सरकारी नौकरी स्वीकार नहीं की, क्योंकि स्वतंत्र रूप से वकालत करने में आज़ादी हासिल थी."

डॉ. आंबेडकर के मुवक्किलों की स्थिति बेहद फटेहाल होती थी. वे ग़रीब, खेतिहर या दिहाड़ी मज़दूर हुआ करते थे. आंबेडकर इन लोगों के मामले को गंभीरता से सुनते और उन्हें न्याय दिलाने की कोशिश करते थे.  वे ग़रीबों का केस मुफ़्त में लड़ते थे." समाज में दलित समुदाय की स्थिति कैसी है, इस बारे में ब्रिटिश सरकार के सामने पक्ष रखने के लिए 1928 में साइमन कमीशन के सामने गवाही देने के लिए डॉ. आंबेडकर को चुना गया था. 

1926 में जब उस समय ब्राह्मण समुदाय के लोग सामाजिक सुधारों का विरोध कर रहे थे. इस प्रबल विरोध के कारण रुढ़िवादियों ने महात्मा फुले की आलोचना भी की थी. महात्मा फुले को क्राइस्टसेवक भी कहा जाता था, इन बातों के विरोध में दिनकर राव जावलकर ने 'देश के दुश्मन' नामक पुस्तक लिखी और केशवराव जेधे ने इसका प्रकाशन किया. इस पुस्तक में लोकमान्य तिलक और विष्णु शास्त्री चिपलूनकर को देश का दुश्मन बताया गया.दोनों पर निचली कोर्ट में केस हुआ और सजा हो गयी. किन्तु आंबेडकर ने उन दोनों को ऊपरी अदालत से रिहा करवादिया था. ऐसे बहुत से केस हैं जिसमें डॉक्टर आंबेडकर ने अपनी बुद्धि का लोहा मनवाया।

इस कड़ी में उन्होंने महाड़ सत्याग्रह भी किया जो हिन्दुओं और अछूतों की महाड़ झील के पानी के लिए आंदोलन था, सदियों तक अछूतों को सार्वजनिक जलस्रोतों से पानी पीने का अधिकार नहीं था. वहां मवेशी पानी पी सकते थे लेकिन अछूतों को पानी लेने की मनाही थी. 

आंबेडकर ने कोर्ट में साबित किया की झील सार्वजानिक सरकारी जगह पर है और उसके पानी पर सिर्फ स्वर्णो का ही नहीं सबका अधिकार है.