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Mahavir Ji
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अमेरिका ईरान झगडे में पकिस्तान की मध्यस्थता , भारत की क्यों नहीं नहीं ?

पाकिस्तान-आतंक का अड्डा या शांति का दावेदार? 

-अमेरिकी संसद में उठे सवाल !

ईरान संकट के बीच ‘मध्यस्थ’ बनने की कोशिश पर दुनिया और अमेरिकी संसद की कड़ी नजर

NB7-NewDelhi:- दुनिया इस समय एक बड़े भू-राजनीतिक मोड़ पर खड़ी है। मध्य पूर्व में बढ़ते 

तनाव, खासकर ईरान और अमेरिका के बीच टकराव ने वैश्विक राजनीति को अस्थिर कर दिया है। 

इसी बीच पाकिस्तान ने खुद को एक “शांति दूत” और संभावित मध्यस्थ के रूप में पेश करना शुरू 

कर दिया है।

लेकिन सवाल यह है कि पाकिस्तान ही क्यों ? कोई मजबूरी या अमेरिका की कोई चाल ? क्या 

पकिस्तान का आतंकी अतीत और वर्तमान इसमें रोड़ा नहीं ?

आतंकवाद से जुड़ा अतीत: पाकिस्तान पर पुराने आरोप

पाकिस्तान का नाम लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद के साथ जोड़ा जाता रहा है। कई 

रिपोर्ट्स और खुफिया एजेंसियों ने यह दावा किया है कि पाकिस्तान की धरती पर कई आतंकी संगठनों 

ने पनाह पाई।

प्रमुख संगठनों में शामिल हैं:

-लश्कर-ए-तैयबा

-जैश-ए-मोहम्मद

-हक्कानी नेटवर्क

इसी वजह से फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स ने पाकिस्तान को कई वर्षों तक ग्रे लिस्ट में रखा। 

यह कदम इस बात का संकेत था कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय पाकिस्तान की नीतियों से पूरी तरह संतुष्ट 

नहीं है।

विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान ने वर्षों तक “डबल गेम” खेला — एक ओर आतंकवाद के 

खिलाफ लड़ाई का दावा, दूसरी ओर कुछ संगठनों को रणनीतिक समर्थन।


ईरान संकट और पाकिस्तान की नई रणनीति

ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान ने खुद को एक मध्यस्थ के रूप में प्रस्तुत 

करने की कोशिश की है।

पाकिस्तानी नेतृत्व के संकेतों के अनुसार: 

-वह दोनों देशों के बीच संवाद स्थापित करना चाहता है।  

-क्षेत्रीय स्थिरता में भूमिका निभाना चाहता है।  

-खुद को “जिम्मेदार वैश्विक खिलाड़ी” साबित करना चाहता है।  

यह रणनीति ऐसे समय में आई है जब पाकिस्तान आर्थिक और कूटनीतिक दबाव झेल रहा है।


अमेरिकी संसद में पाकिस्तान पर क्या कहा गया?

इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे महत्वपूर्ण पहलू है अमेरिकी कांग्रेस की प्रतिक्रिया।

 

अमेरिकी संसद की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा:


अमेरिकी संसद से जुड़ी रिसर्च रिपोर्ट्स में पाकिस्तान को लेकर गंभीर चिंताएं जताई गई हैं: 

-पाकिस्तान को “आतंकवादी संगठनों का सुरक्षित ठिकाना” बताया गया

-1980 के दशक से सक्रिय नेटवर्क्स के आज भी मौजूद होने की बात कही गई

-आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई को “अपर्याप्त” माना गया


यह रिपोर्ट पाकिस्तान की नई “मध्यस्थ” छवि पर बड़ा सवाल खड़ा करती है।


संसद में बंटी राय

अमेरिकी सांसदों के बीच पाकिस्तान को लेकर मतभेद साफ दिखाई देते हैं:

✔️ समर्थन करने वाला पक्ष

कुछ सांसदों का मानना है कि:

-पाकिस्तान का भौगोलिक महत्व बहुत बड़ा है।  

-वह ईरान और अमेरिका के बीच संवाद का माध्यम बन सकता है।  

-क्षेत्रीय शांति के लिए उसका उपयोग किया जा सकता है।  


 विरोध करने वाला पक्ष

दूसरा पक्ष ज्यादा सख्त है:

-पाकिस्तान पर “डबल गेम” का आरोप

-आतंकवाद पर भरोसे की कमी

-भारत और अफगानिस्तान से जुड़े मामलों में संदिग्ध भूमिका

इस गुट का कहना है कि जब तक पाकिस्तान अपनी विश्वसनीयता साबित नहीं करता, तब तक उसे 

बड़ी कूटनीतिक भूमिका नहीं दी जानी चाहिए।


 ईरान मुद्दे पर अमेरिकी संसद में बहस

ईरान को लेकर अमेरिकी कांग्रेस में भी तीखी बहस देखने को मिली। 

-कई सांसदों ने युद्ध जैसे कदमों पर सवाल उठाए।  

-War Powers Resolution के तहत संसद की मंजूरी की मांग की गई।  

-कुछ नेताओं ने बिना संसदीय सहमति सैन्य कार्रवाई का विरोध किया।  


👉 इसका मतलब साफ है:


अमेरिका खुद इस मुद्दे पर पूरी तरह एकजुट नहीं है — और ऐसे में पाकिस्तान की भूमिका और भी 

जटिल हो जाती है।


चीन - पकिस्तान फैक्टर: ताकत या कमजोरी?

चीन पाकिस्तान का सबसे करीबी सहयोगी है।

-CPEC परियोजना

-आर्थिक और सैन्य सहयोग

-वैश्विक मंचों पर समर्थन

लेकिन यही संबंध पाकिस्तान की “निष्पक्षता” पर सवाल खड़े करता है, खासकर जब अमेरिका और 

चीन के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है।


भारत का कड़ा रुख

भारत ने हमेशा पाकिस्तान पर आतंकवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाया है।

भारत का स्पष्ट रुख रहा है:


👉 “आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते”


भारत के लिए पाकिस्तान की “शांति दूत” वाली छवि स्वीकार करना मुश्किल है, क्योंकि:

-सीमा पार आतंकवाद

-बड़े आतंकी हमलों के आरोप

-लगातार कूटनीतिक टकराव


आर्थिक संकट: छवि सुधार की मजबूरी

पाकिस्तान इस समय गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है:

-विदेशी मुद्रा भंडार में कमी उसे विदेशी स्टेज पर अपनी ज्यादा खुली और शांति की चाह रखने वाला 

देश दिखने की कोशिस है, जिससे पकिस्तान को अमीर देशों से और अधिक फंड जुटाने में मदद मिल 

सके। 

-बढ़ती महंगाई से दबी सरकार और अधिक तेल की बढ़ती कीमतों से घबराई हुई है और उसके 

सामने इस युद्ध को किसी भी कीमत पर रुकवाना या रोकना मजबूरी हो गया है।   

-अंतरराष्ट्रीय कर्ज का दबाव- और  अधिक कच्चे तेल की कीमत अंतर्राष्ट्रीय माजूदा कर्ज को और 

अधिक बढ़ा देगा जिसे किसी भी कीमत पर रुकवाना जरूरी है।  

ऐसे में वैश्विक मंच पर सकारात्मक छवि बनाना उसकी प्राथमिकता नहीं बल्कि मजबूरी भी बन गई है।

विशेषज्ञों का मानना है:

👉 पाकिस्तान की मध्यस्थ बनने की कोशिश “डिप्लोमैटिक फाइनेंसियल सर्वाइवल स्ट्रैटेजी” है। 

जिससे उसे विदेशी कर्ज लेने में आसानी हो जाये।  


आखिर अमेरिका पाकिस्तान को गंभीरता से क्यों ले रहा है?

ईरान तनाव के बीच अमेरिका का मकसद सीधा है—बिना युद्ध लड़े स्थिति को कंट्रोल करना। 

और इसी में पाकिस्तान अचानक “काम का खिलाड़ी” बन जाता है।


1. भौगोलिक मजबूरी (Geostrategic Location)

पाकिस्तान की सबसे बड़ी ताकत उसका नक्शा है:

-ईरान के बिल्कुल पास

-अफगानिस्तान से जुड़ा

-मध्य एशिया और खाड़ी देशों के बीच


👉 अमेरिका के पास इस इलाके में सीधे भरोसेमंद चैनल बहुत कम हैं।


👉 ऐसे में पाकिस्तान “मैसेज पास करने वाला पुल” बन सकता है।


 2. डायरेक्ट बातचीत मुश्किल है

ईरान और अमेरिका के रिश्ते दशकों से खराब हैं:

-राजनयिक संबंध सीमित

-भरोसे की भारी कमी

-सीधे संवाद में राजनीतिक जोखिम

👉 इसलिए अमेरिका को “थर्ड पार्टी” चाहिए — और पाकिस्तान खुद को वहीं फिट कर रहा है।


3. अफगानिस्तान का अनुभव


अफगानिस्तान में अमेरिका ने एक बात सीखी:

👉 “Ground reality में पाकिस्तान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता”

-तालिबान से बातचीत में पाकिस्तान की भूमिका

-लॉजिस्टिक सपोर्ट

-क्षेत्रीय प्रभाव

👉 भले ही अमेरिका पाकिस्तान से नाराज रहा हो, लेकिन उसे पूरी तरह साइडलाइन करना कभी संभव नहीं 

हुआ।


4. “Use but don’t trust fully” नीति

अमेरिका की रणनीति बहुत क्लियर है:

👉 “काम के लिए इस्तेमाल करो, लेकिन आंख बंद करके भरोसा मत करो”

-अमेरिकी सिस्टम में अमेरिकी कांग्रेस और पेंटागन दोनों सतर्क हैं

-पाकिस्तान को सीमित भूमिका देने का विचार

-पूरी मध्यस्थता सौंपने का नहीं

5. चीन को बैलेंस करने की चाल

चीन और पाकिस्तान के गहरे रिश्ते अमेरिका के लिए चिंता का विषय हैं।

-CPEC

-सैन्य सहयोग

-कूटनीतिक समर्थन

👉 अगर अमेरिका पाकिस्तान को पूरी तरह छोड़ देता है, तो वह पूरी तरह चीन के खेमे में चला 

जाएगा

👉 इसलिए अमेरिका “पकिस्तान को engage” करके अपने influence बनाए रखना चाहता है


6. अमेरिका खुद भी फंसा हुआ है !

ईरान के मुद्दे पर अमेरिका की स्थिति भी आसान नहीं है: शायद अमेरिका ने ईरान को कुछ ज्यादा ही हलके में ले लिया था और सोचता था ईरान को चुटकियों में घुटनो पर ला देंगे, किन्तु हुवा इसका उल्टा।  

-अंदरूनी राजनीति (कांग्रेस vs सरकार)

-सीधे युद्ध का खतरा

-तेल सप्लाई और वैश्विक बाजार का दबाव

👉 ऐसे में अमेरिका को “low-cost diplomacy” चाहिए


👉 यानी बिना युद्ध के समाधान — और यहां पाकिस्तान एक सस्ता विकल्प लगता है


7. मुस्लिम दुनिया तक पहुंच

पाकिस्तान का इस्लामिक देशों में कुछ प्रभाव है:

-OIC का सदस्य

-खाड़ी देशों से संबंध

-धार्मिक कूटनीति

👉 अमेरिका सीधे मुस्लिम दुनिया में हर जगह स्वीकार्य नहीं है

👉 पाकिस्तान इस गैप को भर सकता है


लेकिन भरोसा क्यों नहीं है?


यही सबसे अहम हिस्सा है 👇

अमेरिका पाकिस्तान को गंभीरता से ले रहा है, लेकिन भरोसा नहीं कर रहा

कारण:

-आतंकवाद से जुड़ा अतीत

-“डबल गेम” की छवि

-लश्कर-ए-तैयबा जैसे संगठनों पर कार्रवाई पर सवाल

-फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स की निगरानी


भारत की साख बेहतर किन्तु पकिस्तान क्यों ?


1 - पकिस्तान की ईरान के साथ “सीधी पहुँच” (Access)

भारत-ईरान रिश्ते अच्छे हैं (चाबहार, ऊर्जा सहयोग), पर भारत खुलकर अमेरिकी लाइन से अलग 

जाकर मध्यस्थता करे—यह आसान नहीं।

पाकिस्तान के पास बैक-चैनल्स और सुरक्षा/इंटेलिजेंस नेटवर्क के जरिए तेज़ संपर्क की क्षमता मानी 

जाती है, खासकर सीमा और क्षेत्रीय नेटवर्क के कारण। 

👉 अमेरिका को कई बार “quiet, deniable channels” चाहिए होते हैं—यह पाकिस्तान से 

अपेक्षाकृत आसानी और जल्दी मिल जाते हैं।

2 - “न्यूट्रल दिखना” (Perception of Neutrality)

भारत आज अमेरिका का खुला रणनीतिक साझेदार है—क्वाड, इंडो-पैसिफिक, डिफेंस डील्स।

ऐसे में तेहरान की नज़र में भारत पूरी तरह “न्यूट्रल” नहीं दिख सकता।

👉 पाकिस्तान, विरोधाभासों के बावजूद, खुद को “न तो पूरी तरह अमेरिकी, न पूरी तरह ईरानी” 

बताकर एक perceived neutral स्पेस बनाने की कोशिश करता है।


3 - भारत की अपनी प्राथमिकताएँ (Strategic Priorities)

भारत का फोकस अभी: अपनी समस्याओं और अर्थव्यवस्था को पटरी पर रखने से है।  साथ ही भारत 

अपने निजी सम्बन्धो को भी ताक पर नहीं रखना चाहता है, ईरान से अभी ज्यादा नजदीकियां अमेरिका 

की आँख की किरकिरी बन सकता है।  क्योकि भारत के लिए अमेरिका आज भी बड़ा बाज़ार है।  

--चीन से संतुलन

--इंडो-पैसिफिक

--आर्थिक/टेक्नोलॉजी पार्टनरशिप

ईरान-अमेरिका के बीच हाई-रिस्क मध्यस्थता में कूदना भारत के लिए फायदे से ज्यादा जोखिम

 ला सकता है (तेल, प्रतिबंध, पश्चिमी साझेदारी पर असर)।

👉 इसलिए भारत अक्सर “लो-प्रोफाइल, इश्यू-बेस्ड एंगेजमेंट” चुनता है, 

न कि हाई-विज़िबिलिटी मध्यस्थता।


4 - पाकिस्तान का “ग्राउंड नेटवर्क” फैक्टर

अफगानिस्तान के अनुभव में अमेरिका ने सीखा कि मैदान पर असर रखने वाले नेटवर्क

 (लॉजिस्टिक्स, इंटेलिजेंस, स्थानीय संपर्क) कितने काम आते हैं—जहाँ पाकिस्तान की भूमिका रही है।

भारत के पास इस विशेष थिएटर (ईरान-अफगान बेल्ट) में ऐसा ऑन-ग्राउंड नेटवर्क सीमित है।


5 - चीन को भी बैलेंस करने की मजबूरी

-पाकिस्तान, चीन के बहुत करीब है।

-अमेरिका पूरी तरह दूरी बनाता है तो, पाकिस्तान और अधिक चीन के पाले में जा सकता है।

👉 इसलिए अमेरिका engage करके leverage बनाए रखना चाहता है—मध्यस्थता जैसे रोल 

उसी “engagement toolkit” का हिस्सा बनते हैं।


6 - मुस्लिम दुनिया में संदेश (Signaling to Islamic World)

पाकिस्तान OIC का सक्रिय सदस्य है।

अमेरिका के लिए यह दिखाना कि एक मुस्लिम-बहुल देश भी बातचीत में पुल बन रहा है, कूटनीतिक 

रूप से उपयोगी संदेश देता है।


7 - अमेरिका की असली नीति: “Utility over purity”

-अमेरिका कई बार “सबसे भरोसेमंद” नहीं, बल्कि “उस वक्त सबसे उपयोगी” विकल्प चुनता है।

-इसलिए पाकिस्तान को सीमित, टास्क-स्पेसिफिक रोल देना—जबकि बड़े फ्रेम में भारत के साथ 

साझेदारी बढ़ाना—दोनों साथ-साथ चलते हैं।


👉 “भारत की वैश्विक साख मजबूत होने के बावजूद, अमेरिका ने इस संकट में पाकिस्तान को 

इसलिए तरजीह दी क्योंकि कूटनीति में भरोसे से ज्यादा ‘तुरंत उपयोगिता’ और ‘ग्राउंड एक्सेस’ मायने 

रखते हैं।”


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