CJP छात्र आंदोलन या आम परिवारों की आवाज

जब बन्दर राजा बन जाए: छात्र आंदोलन, राजनीति 

और जनता की असली लड़ाई




सड़क पर छात्र, दांव पर करोड़ों परिवारों का भविष्य: ( Student Protest India )


NB7 विशेष रिपोर्ट | व्यंग्यात्मक राजनीतिक विश्लेषण (Student Protest Strategy)

भारत में लाखों छात्र आज परीक्षा, भर्ती, पेपर लीक, बेरोजगारी और शिक्षा व्यवस्था की समस्याओं को 

लेकर आवाज उठा रहे हैं। दिल्ली से लेकर छोटे शहरों तक युवा सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर उनकी 

मेहनत का मूल्य कब मिलेगा? लेकिन इसी बीच एक और बड़ा सवाल उठता है—

क्या जिन लोगों के हाथ में शिक्षा नीति, भर्ती व्यवस्था और युवाओं का भविष्य है, वे वास्तव में इन 

समस्याओं को समझते भी हैं?


लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती की कोई भी (पढ़े लिखे या अनपढ़ ) 

चुनाव लड़ सकता है, अब बनी सबसे बड़ी कमजोरी?


भारतीय संविधान के अनुसार सांसद, विधायक या मंत्री बनने के लिए किसी न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता 

की आवश्यकता नहीं है।

संविधान निर्माताओं का तर्क था कि लोकतंत्र में जनता ही अंतिम निर्णायक होगी। यदि जनता चाहे तो 

एक प्रोफेसर को भी चुन सकती है और एक साधारण किसान को भी।


लेकिन 75 साल बाद नेताओं की शिक्षा पर सवाल उठ रहा है:

- क्या 21वीं सदी के तकनीकी और जटिल भारत में यह व्यवस्था पर्याप्त है?

जब शिक्षा नीति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), डिजिटल अर्थव्यवस्था, साइबर सुरक्षा और वैश्विक प्रतिस्पर्धा 

जैसे विषय सामने हों, तब क्या बिना विषय की गहरी समझ वाले लोग सही फैसले ले सकते हैं?


क्या नेताओं की शिक्षा में भी न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता लागू होनी 

चाहिए?

इस विषय पर देश में वर्षों से बहस चल रही है।

समर्थन में तर्क

-मंत्री और विधायक को नीतियों की बेहतर समझ होगी।

-मंत्री और विधायकों को अन्य विशेषज्ञों के सुझावों पर आश्रित नहीं रहना पड़ेगा 

-विशेषज्ञों पर खर्च काम होगा, और मंत्री स्वयं विशेषज्ञ होंगें, निर्णय तेज और आसानी से लिए जा 

सकेंगें (बहुत बार विशेषज्ञ भी नेताओं की समझ को भटका देते हैं, बेहतर नियंत्रण होगा ),

-प्रशासनिक निर्णय सीधे, सरल और अधिक प्रभावी हो सकते हैं।

-शासन में विशेषज्ञता बढ़ सकती है।


विरोध में तर्क

-लोकतंत्र सबको सामान अवसर देता है, लोकतंत्र के खिलाफ जाना पड़ेगा।  

-लोकतंत्र में जनता को किसी भी नागरिक को चुनने का अधिकार होना चाहिए।

औपचारिक शिक्षा और नेतृत्व क्षमता हमेशा एक जैसी नहीं होती।

-इससे गरीब और ग्रामीण वर्ग राजनीति से बाहर हो सकते हैं।

-आर्थिक और सामाजिक रूप से दबे-कुचले, शिक्षा में आर्थिक तंगी से पिछड़े लोग राजनीति से बाहर 

हो जाएंगे, जो लोकतंत्र की मूल भावना के प्रतिकूल (उलट ) होगा।  

- यह भी जरूरी नहीं की ज्यादा पढ़ा लिखा व्यक्ति ही अच्छा नेता बन सकता है, बहुत बार देखने में 

आया है कम शिक्षित राजनेता बहुत अच्छे जान - नायक होते हैं। 

-समाज में हर तरह की परेशानियां होती हैं, और  सभी परेशानियां शिक्षा से जुड़ी हो जरूरी नहीं, निम्न 

आय वर्गों की परेशानियों को निम्न आय वर्गों में से निकले नेता ही अच्छे से समझ पाते हैं। 

छात्रों की नाराजगी आखिर क्यों बढ़ रही है?

Why CJP Student Movement ?

आज का छात्र सिर्फ डिग्री नहीं चाहता।

नवजवान क्या चाहता है:

-सिर्फ ईमानदार निष्पक्ष परीक्षा,

-समय-समय पर भर्ती,

-पारदर्शी और ईमानदार चयन प्रक्रिया,

-रोजगार के भरपूर अवसर,

- बेहतर शिक्षा पद्यति और व्यवस्था में 
गुणवत्तापूर्ण,

-शिक्षा पर सरकार का ठीक ठाक बजट, 

-शिक्षा और अवसर पर सरकार द्वारा लिया जाने वाला भारी भरकम शुल्क कम हो।  

छात्र आखिर मांग रहे हैं?

अगर सरकार ध्यान से देखे तो छात्रों की मांगें कोई गैरकानूनी या क्रांति नहीं हैं।

वे पूछ रहे हैं:

-परीक्षा निष्पक्ष क्यों नहीं?

-भर्ती समय पर क्यों नहीं?

-पेपर लीक क्यों हो रहे हैं?

-पेपर लीक NTA के भीतर से हो रहा है और लीकेज बाहर ढूंढा जा रहा है ?

-किस को बचाया जा रहा है ?

-नौकरी के अवसर कहाँ हैं?

-शिक्षा इतनी महंगी क्यों हो रही है?

लेकिन जब बार-बार पेपर लीक, भर्ती विवाद और प्रशासनिक देरी की खबरें, बढ़ती परीक्षा फीस,  तो 

छात्रों और उनके माता पिता पर बोझ बढ़ता जाता है और यह भावना पैदा होती है कि उनकी 

समस्याओं को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा।

यह सवाल किसी पार्टी के नहीं हैं। यह सवाल भारत के हर घर के भविष्य का हैं।


क्या पढ़ा-लिखा नेता हमेशा बेहतर नेता होता है?

इस सवाल का उत्तर भी इतना सरल नहीं है।

समस्या केवल डिग्री की नहीं है। शिक्षा लेने में आनेवाली समस्याओं और बढ़ते खर्च की भी है, पढ़े 

लिखे नेताओं को शिक्षा की समस्याओं का पहले से पता होता है, और बच्चों की शिक्षा सम्बन्धी  

समस्याओं को आसानी से और बेहतर समझ सकते हैं।  

असल समस्या तब पैदा होती है जब:

-निर्णय तथ्यों के बजाय प्रचार पर आधारित हों,

-विशेषज्ञों की सलाह को नजरअंदाज किया जाए,

-जवाबदेही कमजोर हो जाए,

-और राजनीतिक लाभ नीति निर्माण से बड़ा हो जाए।

सामान्य छात्र आंदोलन और धनाढय सत्ता की असमान लड़ाई

यदि कोई छात्र आंदोलन सरकार के खिलाफ संघर्ष कर रहा है, तो यह केवल विचारों की लड़ाई नहीं 

होती।

यह संसाधनों की भी लड़ाई होती है।

एक तरफ:

-सरकारी तंत्र जो स्वयं सरकार के लिए काम करने लगता है, जबकि उन्ही के बच्चे भ्रष्ट शिक्षा तंत्र से 

परेशान हो कर ये आंदोलन कर रहे हैं।  

-राजनीतिक संगठन और उनकी भ्रष्ट राजनीति 

-सरकार के खर्चे पर मीडिया प्रभाव

-सरकारी आर्थिक संसाधन और पुलिस पावर का प्रभाव  होते हैं।

दूसरी तरफ:

-निम्न और मध्यम वर्ग से आने वाले विद्यार्थी 

-गरीब और आर्थिक बदहाल परिवार

-सीमित साधन

-सीमित समय

-सीमित आर्थिक क्षमता होती है।

-नगण्य गठबंधन या संगठन 

यही कारण है कि इतिहास में अधिकांश सफल आंदोलनों ने व्यापक सामाजिक गठबंधन बनाए हैं।

किसान आंदोलन से छात्रों को क्या सीखना चाहिए?

किसान आंदोलन की सफलता का सबसे बड़ा कारण केवल संख्या नहीं था।

उसकी असली ताकत थी:

-मजबूत संगठन

-अनुशासन और साथ खड़े रहने की जिद 

-आर्थिक संसाधन (देर तक टिकने के लिए जरूरी और मनोवैज्ञानिक मजबूती )

-स्पष्ट मांगें, कोई राजनीति नहीं सीधे सवाल और मांग 

-लंबी रणनीति, पहले से तय तुरंत सफलता नहीं, मांग अनसुनी तो अधिक दबाव की रणनीति।  

-किसानों के पीछे पूरा सामाजिक ढांचा मौजूद था।

-छात्रों के पास वैसी संरचना नहीं होती।

इसीलिए छात्र आंदोलनों को अपने संघर्ष को केवल विश्वविद्यालय परिसर तक सीमित नहीं रखना 

चाहिए।

तो क्या छात्रों को किसान, मजदूर, सेना-पुलिस के जवानों और 

सामान्य अभिभावकों को साथ लाना चाहिए?

व्यावहारिक और अनुभवी विशेषज्ञों की राजनीति कहती है—निःसंदेह- हाँ।

क्यों?

क्योंकि:

-हर छात्र किसी न किसी परिवार का हिस्सा होता है। सब चाहते हैं सबको सामान अवसर मिले।  

-अधिकांश छात्र किसान, मजदूर,पुलिस या सेना के जवान, कर्मचारी या छोटे व्यापारियों के घरों से 

आते हैं।

-शिक्षा का संकट केवल छात्रों का संकट नहीं बल्कि पूरे परिवार और समाज का होता है।

-राजनैतिक दल इन परिवारों को वोट बैंक की तरह देखते हैं, इसलिए वे समय समय पर इन्हें अलग 

अलग समाजों, जातियों, धर्मों में बाँट कर अपना वोट बैंक बढ़ाना चाहते हैं।  

जब छात्र का भविष्य प्रभावित होता है, तो पूरा परिवार प्रभावित होता है।


विपक्ष की भूमिका: दोस्त या मुद्दा खोने का खतरा?

यहीं सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती सामने आती है। क्योंकि विपक्ष भी एक राजनैतिक पार्टी होती है, 

और यदि विपक्ष भी इस आंदोलन के साथ जुड़ने पर अपना राजनैतिक स्वार्थ सिद्ध करने लगे तो मुख्य 

मुद्दा राजनैतिक उठा पटक में खो सकता है।  साथ ही ये मुद्दा फिर सामाजिक न रह कर राजनैतिक 

बन जाएगा जिसे दबाना सरकार के लिए आसान होगा।  किन्तु पिछले दरवाजे से सपोर्ट लिया जा सकता है ताकि सरकार पर चरों और से दबाव बने।  

यदि विपक्ष साथ नहीं आता: किन्तु फायदा और नुक्सान साथ साथ आएंगे -

  • मुद्दा संसद तक नहीं पहुंचता।
  • राष्ट्रीय बहस नहीं बनती।
  • राजनीतिक दबाव कम रहता है।

यदि विपक्ष बहुत ज्यादा हावी हो जाए:

  • आंदोलन की स्वतंत्र पहचान कमजोर हो जाती है।
  • जनता का एक वर्ग उसे राजनीतिक कार्यक्रम मानने लगता है।

इसलिए राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार :

"विपक्ष का सहयोग लो, लेकिन आंदोलन का नियंत्रण अपने पास रखो।"


इसे व्यंग में समझो !

जब बन्दर राजा बन जाए...

एक पुरानी लोककथा है।

यदि किसी जंगल का राजा बन्दर बन जाए तो वह जंगल की समस्याएँ हल नहीं करेगा।

वह एक पेड़ से दुसरे पेड़ पर कूदेगा।

तालियाँ बजाएगा। नई-नई कलाबाज़ियाँ दिखाएगा।

जंगल में आग लगी हो, पानी सूख गया हो, भोजन खत्म हो रहा हो—फिर भी वह जनता का ध्यान उधर 

नहीं जाने देगा।


क्यों?  क्योंकि राजा चालक बन्दर है और वह जानता है, जनता कलाबाज़ी में फंसी रहेगी और 

तालियां बजती रहेगी।  


यह छात्र आंदोलन नहीं, मध्यम और गरीब परिवारों का आंदोलन है

भारत में कोई छात्र अकेला पैदा नहीं होता।

उसके पीछे होते हैं:

-किसान माता-पिता

-मजदूर परिवार

-छोटे दुकानदार

-निजी नौकरी करने वाले कर्मचारी

-रिक्शा चलाने वाले पिता

-सिलाई करने वाली माँ

जब एक छात्र का भविष्य रुकता है, तो पूरा परिवार रुकता है।

जब भर्ती रुकती है, तो सिर्फ एक अभ्यर्थी नहीं हारता।

एक पूरा घर हारता है।


किसान आंदोलन से क्या सीखना चाहिए?

किसान आंदोलन ने एक महत्वपूर्ण बात सिखाई।

सरकारें केवल नारों से नहीं झुकतीं।

सरकारें तब सुनती हैं जब:

  • संगठन मजबूत हो,
  • जनसमर्थन व्यापक हो,
  • मुद्दा स्पष्ट हो,
  • और आंदोलन टिकाऊ हो।

किसानों के पास:

  • संगठन था,
  • संसाधन थे,
  • सामुदायिक समर्थन था,
  • और धैर्य था।

छात्रों के पास ऊर्जा है।

लेकिन ऊर्जा अकेले काफी नहीं होती।

ऊर्जा को संगठन में बदलना पड़ता है।


छात्रों को किन्हें साथ लाना चाहिए?

यदि छात्र वास्तव में बदलाव चाहते हैं, तो उन्हें समझना होगा कि यह केवल विश्वविद्यालय की लड़ाई नहीं है।

उन्हें साथ लाना होगा:

  • अभिभावकों को
  • शिक्षकों को
  • किसान संगठनों को
  • मजदूर संगठनों को
  • बेरोजगार युवाओं को
  • नागरिक समाज को

क्योंकि यह सब उसी समस्या से प्रभावित हैं।


विपक्ष की जरूरत है या नहीं?

यहाँ राजनीति शुरू होती है।

विपक्ष की जरूरत है क्योंकि:

  • संसद में वही आवाज उठा सकता है।
  • कानूनी लड़ाई में मदद कर सकता है।
  • राष्ट्रीय स्तर पर मुद्दा उठा सकता है।

लेकिन खतरा भी है।

यदि आंदोलन पूरी तरह विपक्ष के हाथ में चला गया तो छात्र पीछे और नेता आगे दिखाई देंगे।

इसलिए सबसे समझदारी वाली रणनीति वही है:

"सहयोग लो, नियंत्रण मत दो।"


सबसे बड़ी गलती क्या होगी?

-यदि छात्र सोचें कि केवल दिल्ली में बैठ जाने से सत्ता बदल जाएगी।

-केवल सोशल मीडिया पर एकजुटता दिखाने से परिवर्तन हो जाएगा।  

-केवल चार दिन के प्रदर्शन से सरकार मान जाएगी। 

-केवल नारेबाजी से फरक पड़ेगा।  


-इतिहास ऐसा नहीं कहता।

-जेपी आंदोलन सफल हुआ क्योंकि पूरा समाज जुड़ा।

-अन्ना आंदोलन सफल हुआ क्योंकि पूरे देश ने उसे अपना मुद्दा माना।

-किसान आंदोलन प्रभावी हुआ क्योंकि उसके पीछे लाखों परिवार खड़े थे।

-अभी का किसान आंदोलन इसी सरकार के खिलाफ हुवा था और साल भर से ज्यादा लम्बा खींचा था 

किन्तु किसान जगह बदल बदल कर सड़क पर संघर्ष करते रहे थे।  


छात्रों को क्या नहीं करना चाहिए?

1. केवल सोशल मीडिया पर निर्भर नहीं रहना चाहिए

ट्रेंड 24 घंटे चलता है।

आंदोलन वर्षों चलते हैं।

2. केवल गुस्से पर निर्भर नहीं रहना चाहिए

-गुस्सा शुरुआत कर सकता है।

-गुस्सा हिंसा भड़का सकता है।  

-गुस्सा गलतियां करवा सकता है।  

-गुस्सा मुद्दे से भटका सकता है।  

-हिंसा को दबाना सरकार के लिए आसान होगा, मुद्दा आंदोलन को रोड से हटा कर अदालत तक ले 

 जा सकता है।  

-लम्बी रणनीति और संगठन जीत दिलाती है।

3. हर बहस में नहीं उलझना चाहिए

सत्ता का सबसे पुराना हथियार है—

मुख्य मुद्दे से ध्यान भटका दो।


छात्रों को हर बार मूल प्रश्न पर लौटना होगा:और सरकार से बार बार पूछना होगा -

"परीक्षा, भर्ती, रोजगार और शिक्षा का क्या हुआ?"

अंत में:

बन्दर की कलाबाज़ी नहीं, जनता का भविष्य महत्वपूर्ण है

-राजनीति में शोर हमेशा रहेगा।

-नारे बदलते रहेंगे।

-विवाद बदलते रहेंगे।

-लेकिन करोड़ों परिवारों के बच्चों का भविष्य किसी राजनीतिक तमाशे से बड़ा मुद्दा है।

यदि छात्र संगठित हुए, समाज को साथ लाए, अपने मुद्दों को स्पष्ट रखा और हर बार चर्चा को शिक्षा, 

रोजगार और जवाबदेही पर वापस ले आए—

तो उनकी आवाज़ केवल धरने की आवाज़ नहीं रहेगी।

वह एक राष्ट्रीय प्रश्न बन जाएगी।

और इतिहास गवाह है—

सत्ता अक्सर शोर को नजरअंदाज कर देती है, लेकिन संगठित समाज को नहीं।