गणपति विसर्जन और पर्यावरण जागरूकता 1890 से 2026 तक

गणेशोत्सव फिर बने बदलाव का उत्सव: 




लोकमान्य तिलक के सामाजिक एकता के बाद अब पर्यावरण संरक्षण 

की बारी?

कभी गणपति घर से निकलकर समाज को जोड़ने का माध्यम बने थे। 

क्या आज वही उत्सव पर्यावरण बचाने और सामाजिक जिम्मेदारी का बड़ा अभियान बन 

सकता है?

NB7-नई दिल्ली- गणेश चतुर्थी आते ही देशभर में भक्ति, उत्साह और उत्सव का माहौल बन जाता है।

घरों से लेकर बड़े-बड़े पंडालों तक गणपति की स्थापना होती है। आरती होती है, जुलूस निकलते हैं 

और हजारों लोग सामूहिक रूप से उत्सव मनाते हैं।

लेकिन गणेशोत्सव के इतिहास में एक ऐसा अध्याय भी है, जिसे आज फिर याद करने की जरूरत है।

19वीं सदी के अंत में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने सार्वजनिक गणेशोत्सव को सामाजिक 

एकजुटता और जन-जागरण के बड़े मंच के रूप में प्रोत्साहित किया। 1893 के आसपास इसका 

सार्वजनिक स्वरूप तेजी से विकसित हुआ।

यानी गणपति 1890 में केवल घर की पूजा तक सीमित नहीं रहे—वे समाज के बीच आए।

तब लोकमान्य तिलक का उद्देश्य था समाज को जोड़ना

उस दौर में सार्वजनिक गणेशोत्सव के माध्यम से लोगों को एक जगह आने, सांस्कृतिक कार्यक्रम 

करने, विचार सुनने और सामूहिक गतिविधियों में भाग लेने का अवसर मिला।

यह केवल पूजा का विस्तार नहीं था।

धर्म के साथ समाज और जन-जागरण का एक सार्वजनिक मंच तैयार हुआ।

आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं।

अब सवाल विदेशी शासन का नहीं, बल्कि हमारे सामने खड़ी अपनी सामाजिक और पर्यावरणीय 

चुनौतियों का है।

तो क्या आज गणेशोत्सव की नई भूमिका हो सकती है?

क्यों नहीं?

अगर एक समय गणेशोत्सव ने लोगों को सामाजिक रूप से जोड़ने में भूमिका निभाई थी, तो आज वही 

सामूहिक शक्ति पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छता और समाजसेवा के लिए इस्तेमाल की जा सकती है।

महाराष्ट्र सरकार की पर्यटन सामग्री भी आज के गणेशोत्सव को सामाजिक एकता और पर्यावरण 

जागरूकता से जोड़ती है।

गणेश मंडल तय करें कुछ नए संकल्प

हर मंडल अगर केवल सजावट और बड़े आयोजन की प्रतिस्पर्धा के बजाय कुछ सामाजिक लक्ष्य भी 

तय करे तो उत्सव का अर्थ और बड़ा हो सकता है।

मसलन—

-POP के बजाय मिट्टी की मूर्तियां

-प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल

-प्लास्टिक और थर्मोकोल से दूरी

-जलाशयों को प्रदूषण से बचाने के लिए जिम्मेदार विसर्जन

-एक गणपति मंडल—एक बड़ा वृक्षारोपण अभियान

-रक्तदान और स्वास्थ्य शिविर

-गरीब बच्चों के लिए शिक्षा सहायता

-रोजगार और करियर मार्गदर्शन

-स्वच्छता अभियान

-जल संरक्षण अभियान

CPCB ने भी मूर्ति विसर्जन से जुड़े पर्यावरणीय प्रभावों को देखते हुए प्राकृतिक सामग्री, प्लास्टिक पर नियंत्रण, 

मूर्तियों के आकार और पर्यावरण-अनुकूल विसर्जन जैसी बातों पर दिशानिर्देश जारी किए हैं।

भक्ति कम नहीं, पर जिम्मेदारी भी ज्यादा

पर्यावरण की बात करने का अर्थ धार्मिक आस्था का विरोध करना नहीं है।

बल्कि सवाल उलटा है—

अगर गणपति को बुद्धि और विवेक का प्रतीक माना जाता है, तो हमारी भक्ति में प्रकृति के 

प्रति जिम्मेदारी भी शामिल  होनी चाहिए?

नदी, तालाब और झील भी हमारे समाज की संपत्ति हैं। यदि उत्सव के बाद वही जलस्रोत प्रदूषित हो 

जाएं, तो हमें अपने उत्सव के तरीके पर विचार करना चाहिए।


बाल गंगा धर तिलक के समय एक चुनौती थी, आज चुनौती दूसरी है

तिलक के समय चुनौती थी—बिखरे हुए समाज को एक सार्वजनिक मंच पर लाना और जन-जागरण 

पैदा करना।

आज चुनौती अलग है।

आज हमारे पास विशाल जनसमूह हैं, संचार के साधन हैं और बड़े-बड़े सार्वजनिक आयोजन हैं।

जरूरत है इन साधनों को सामाजिक और पर्यावरणीय जिम्मेदारी से जोड़ने की।

गणेशोत्सव केवल यह दिखाने की प्रतियोगिता न बने कि किसका पंडाल बड़ा है, मूर्ति ऊंची है या 

सजावट महंगी है।

यह प्रतियोगिता भी हो सकती है—

-किस मंडल ने सबसे ज्यादा पेड़ लगाए?

-किसने सबसे ज्यादा बच्चों की पढ़ाई में मदद की?

-किसने सबसे ज्यादा रक्तदान कराया?

-किसने अपने क्षेत्र को सबसे साफ बनाया?

-किसने सबसे कम प्रदूषण के साथ गणेशोत्सव मनाया?

यही शायद सार्वजनिक गणेशोत्सव को उसके मूल सामाजिक चरित्र से जोड़ने का आधुनिक तरीका हो 

सकता है।

गणपति फिर समाज के बीच हैं—अब सवाल है, समाज के लिए क्या कर रहे हैं?

गणेशोत्सव की भव्यता कुछ दिनों की होती है, लेकिन उससे पैदा हुआ सामाजिक परिवर्तन वर्षों तक रह 

सकता है।

इसलिए आज जरूरत गणेशोत्सव को छोटा करने की नहीं, बल्कि उसके उद्देश्य को बड़ा करने की 

है।

घर से समाज तक गणपति अब समाज से प्रकृति तक पहुंचे—यही आज के गणेशोत्सव 

की नई दिशा हो सकती है।

भक्ति रहे। उत्सव रहे। पर उसके साथ समाज और प्रकृति की जिम्मेदारी भी रहे।

गणपति बप्पा मोरया।


डिस्क्लेमर: यह लेख किसी की धार्मिक आस्था या भावनाओं को ठेस पहुंचाने के उद्देश्य से नहीं लिखा गया है। इसका उद्देश्य धार्मिक परंपरा के साथ पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छता और सामाजिक जिम्मेदारी के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। पाठकों से अनुरोध है कि किसी भी पर्यावरणीय या सामाजिक गतिविधि में स्थानीय प्रशासन के दिशा-निर्देशों और सुरक्षा मानकों का पालन करें।