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Bangladesh PM Tarique Rahman Pakistan Media Dreaming Win over India

तारिक रहमान का उदय और पाकिस्तानी मीडिया का 'मुंगेरीलाल के हसीन सपने'

क्या वाकई भारत की चिंता !




नई दिल्ली/ढाका: 2024 के छात्र आंदोलन के बाद शेख हसीना का तख्तापलट और अब 2026 में 

तारिक रहमान का बांग्लादेश के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेना, एक नए युग की शुरुआत है। 

लेकिन इस बदलाव पर सबसे ज्यादा 'शोर' पाकिस्तानी मीडिया में मच रहा है। पाकिस्तान के प्रमुख 

अखबार 'द एक्सप्रेस ट्रिब्यून' ने अपने एक विश्लेषण में लिखा कि यह "दिल्ली की दुविधा और 

इस्लामाबाद का क्षण" है।

पकिस्तानी मीडिया में क्या छप रहा ?

पाकिस्तानी मीडिया, विशेष रूप से 'द एक्सप्रेस ट्रिब्यून' (The Express Tribune), तारिक रहमान 

के प्रधानमंत्री बनने और बांग्लादेश में बीएनपी (BNP) की वापसी को एक बड़े रणनीतिक बदलाव के 

रूप में देख रहा है।

पाकिस्तानी मीडिया की रिपोर्टों और विश्लेषणों के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

"इस्लामाबाद का क्षण" (Islamabad's Moment): 'द एक्सप्रेस ट्रिब्यून' के एक प्रमुख लेख 

(शीर्षक: "Delhi's dilemma, Islamabad's moment") में कहा गया है कि शेख हसीना के 

जाने और तारिक रहमान के आने से पाकिस्तान के लिए बांग्लादेश के साथ संबंधों को फिर से पटरी 

पर लाने का एक बड़ा अवसर पैदा हुआ है। लेख के अनुसार, बीएनपी का झुकाव ऐतिहासिक रूप से 

पाकिस्तान के प्रति तुलनात्मक रूप से नरम रहा है।


भारत की दुविधा (India's Dilemma): पाकिस्तानी अखबारों का मानना है कि भारत अब एक 

कूटनीतिक संकट में है। लेख में जिक्र है कि भारत ने शेख हसीना में बहुत अधिक निवेश किया था, 

लेकिन अब तारिक रहमान की सरकार हसीना के प्रत्यर्पण (extradition) की मांग कर सकती है, जो 

भारत के लिए एक बड़ी चुनौती होगी।

क्षेत्रीय संतुलन में बदलाव: पाकिस्तानी मीडिया का विश्लेषण है कि बांग्लादेश अब भारत पर अपनी 

अत्यधिक निर्भरता को कम करने की कोशिश करेगा। तारिक रहमान के "बांग्लादेश फर्स्ट" और "नॉट 

दिल्ली, नॉट पिंडी" (न दिल्ली, न रावलपिंडी) वाले रुख को पाकिस्तान में एक संतुलित विदेश नीति की 

शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है, जो पाकिस्तान और चीन के लिए फायदेमंद हो सकता है।


ऐतिहासिक संबंधों की बहाली की उम्मीद: पाकिस्तानी मीडिया इस बात को रेखांकित कर रहा है कि 

2001-2006 के बीएनपी शासन के दौरान दोनों देशों के बीच घनिष्ठता थी। उन्हें उम्मीद है कि तारिक 

रहमान के नेतृत्व में द्विपक्षीय व्यापार और सुरक्षा सहयोग फिर से बढ़ेगा।


कुल मिलाकर, पाकिस्तानी मीडिया इसे दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में भारत के दबदबे के कम 

होने और पाकिस्तान के लिए बांग्लादेश में अपना प्रभाव फिर से स्थापित करने के एक सुनहरे मौके के 

रूप में देख रहा है।


लेकिन क्या यह सच है? 

क्या एक आर्थिक रूप से कंगाल पाकिस्तान वाकई बांग्लादेश के लिए भारत का विकल्प बन सकता है? 

या फिर पाकिस्तानी मीडिया सिर्फ अपनी कल्पनाओं के घोड़े दौड़ा रहा है? आइए इसका गहराई से 

विश्लेषण करते हैं।


1. पाकिस्तानी मीडिया का 'ओवरथिंकिंग' मोड: क्यों है इतनी खुशी?

पाकिस्तानी मीडिया और वहां के बुद्धिजीवी (मुंगेरीलाल के हसीं सपने ) तारिक रहमान की जीत को 

अपनी कूटनीतिक जीत मान रहे हैं। उनके इस उत्साह के पीछे तीन मुख्य कारण हैं:


हसीना युग का अंत: शेख हसीना के कार्यकाल में पाकिस्तान और बांग्लादेश के रिश्ते सबसे निचले 

स्तर पर थे। हसीना ने 1971 के युद्ध अपराधियों को फांसी दी, जिससे पाकिस्तान चिढ़ा हुआ था।

बीएनपी का इतिहास: तारिक रहमान की पार्टी (BNP) का झुकाव ऐतिहासिक रूप से पाकिस्तान के 

प्रति नरम रहा है। 2001-2006 के बीएनपी शासन के दौरान भारत-विरोधी तत्वों को बांग्लादेश में 

पनाह मिली थी।

भारत को झटका देने की चाहत: कश्मीर और अन्य मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय मंच पर अलग-थलग पड़ा 

पाकिस्तान चाहता है कि भारत के पड़ोस में कोई ऐसा देश हो जो भारत के खिलाफ सुर मिलाए।


2. हकीकत का आईना: पाकिस्तान बनाम भारत (आर्थिक और सामरिक तुलना)

पाकिस्तानी मीडिया यह भूल रहा है कि 2026 का बांग्लादेश वह 1971 वाला पूर्वी पाकिस्तान नहीं है। 

आज बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था पाकिस्तान से कहीं बेहतर है।


तुलनात्मक बिंदुभारतपाकिस्तानबांग्लादेश के लिए महत्व
अर्थव्यवस्था (GDP)$4 ट्रिलियन+लगभग $340 बिलियन (संकट में)भारत एक विशाल बाजार और निवेशक है।
मुद्रा भंडार$700 बिलियन+$10 बिलियन से कम (उधार पर निर्भर)पाकिस्तान खुद दिवालिया होने की कगार पर है।
कनेक्टिविटीतीन तरफ से सीमा और समुद्री मार्गकोई सीधी भौगोलिक सीमा नहींव्यापार के लिए भारत अनिवार्य है।
निर्यातवैश्विक हबबेहद कमबांग्लादेश को कच्चा माल भारत से मिलता है।

प्रश्न यह है: क्या तारिक रहमान एक ऐसे देश (पाकिस्तान) की ओर झुकेंगे जो खुद चीन और IMF की 

बैसाखियों पर टिका है?


3. तारिक रहमान की दुविधा: 'न दिल्ली, न पिंडी'

तारिक रहमान ने अपने शुरुआती बयानों में "बांग्लादेश फर्स्ट" की नीति की बात की है। वह जानते हैं कि:- 
अगर तारीख रहमान वास्तव में समझदार हुवे तो वे अपने देश की अर्थव्यवस्था को पहले सँभालने की 

कोशिस करेंगें बजाय पकिस्तान की और झुकने के, जहाँ से उसे कुछ मिलने वाला नहीं ।  

अर्थव्यवस्था सर्वोपरि है: बांग्लादेश का गारमेंट उद्योग और सप्लाई चेन भारत पर निर्भर है। भारत 

से दुश्मनी का मतलब है आर्थिक आत्महत्या।

भारत एक मजबूत पड़ोसी है: भारत के साथ 4000 किमी से लंबी सीमा साझा करने वाला देश 

भारत को नजरअंदाज नहीं कर सकता। 

चीन का प्रभाव: अगर रहमान भारत से दूर जाते हैं, तो वह पाकिस्तान के पास नहीं बल्कि चीन के 

पास जाएंगे। पाकिस्तान के पास बांग्लादेश को देने के लिए न तो पैसा है और न ही तकनीक। हाँ 

पकिस्तान उनसे भी लोन जरूर मांग लेगा।  

क्या पाकिस्तानी मीडिया 'ओवरसेलिब्रेट' कर रहा है? जैसे वे अक्सर क्रिकेट मैच में भी भारत को 

हराने के सपने देखने लगता है और मैच हार कर सिर्फ रोना और टीवी तोड़ने जैसी हरकतें करता नजर 

आता हैं।  

बिलकुल वैसे ही, पाकिस्तानी मीडिया का यह सोचना कि तारिक रहमान आते ही भारत से रिश्ते तोड़ लेंगे, 

पूरी तरह से वास्तविकता से परे है। 

वैसे भी अभी ऊंट को बैठने तो दो, कल्पना के घोड़े दौड़ाना थोड़ी ज्यादा जल्दी होगी।  


सुरक्षा चिंताएं: यदि रहमान ने 2001 वाली गलती दोहराई और उत्तर-पूर्व भारत के उग्रवादियों को 

पनाह दी, तो भारत के पास 'सर्जिकल स्ट्राइक' और 'आर्थिक नाकेबंदी' जैसे कड़े विकल्प मौजूद हैं।


शेख हसीना का प्रत्यर्पण: रहमान के लिए सबसे बड़ी चुनौती हसीना को वापस लाना है, जो 

फिलहाल भारत में हैं। यह मुद्दा रिश्तों में खटास ला सकता है, लेकिन यह रणनीतिक अलगाव का 

कारण नहीं बनेगा।


निष्कर्ष: भविष्य क्या कहता है?

यदि तारिक रहमान एक चतुर राजनेता हैं?  तो वह पाकिस्तान के साथ अपने रिश्तों को केवल एक 

"बार्गेनिंग चिप" (मोलभाव के हथियार) के रूप में इस्तेमाल करेंगे ताकि भारत से बेहतर डील 

हासिल कर सकें। पाकिस्तान के पास फिलहाल वह 'वजन' नहीं है कि वह भारत की जगह ले सके।

पकिस्तान खामख्वाह अपने आप को भारत से तुलना करने लगता है, जो है नहीं ।