सीजेपी के प्रदर्शन पर इतनी सख्ती क्यों?

NB7 - नई दिल्ली | विशेष रिपोर्ट
दिल्ली में सीजेपी (CJP) के प्रदर्शन को रोकने के लिए पुलिस की भारी तैनाती, नेताओं की हिरासत, सड़कों पर बैरिकेडिंग और मेट्रो सेवाओं पर पाबंदियों ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या राजधानी में विरोध-प्रदर्शन को संभालने के लिए इतनी सख्ती जरूरी थी? और अगर कानून-व्यवस्था के नाम पर प्रदर्शनकारियों को रोका गया, तो कथित तौर पर हिंसा और बदसलूकी करने वाले दूसरे पक्ष के लोगों पर भी वैसी ही कार्रवाई क्यों नहीं होनी चाहिए?
10 और 11 अक्टूबर को दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन हुए। सीजेपी और उससे जुड़े प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि मतदाता सूची में बदलाव से करोड़ों लोगों के मतदान के अधिकार पर असर पड़ा है। दूसरी ओर, चुनाव आयोग और बीजेपी ने मतदाता सूची में जानबूझकर हेरफेर के आरोपों को खारिज किया है। ऐसे में सवाल केवल राजनीतिक आरोपों का नहीं, बल्कि पुलिस की कार्रवाई, नागरिक अधिकारों और कानून के समान इस्तेमाल का भी है। Reuters की रिपोर्ट
दिल्ली में ऐसा क्या हुआ कि राजधानी को किले में बदलना पड़ा?
सीजेपी ने 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का आह्वान किया था। मुख्य मांग मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा थी। दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी और सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए।
इंडियन एक्सप्रेस की 11 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक, शनिवार को दिल्ली में 40,000 से अधिक पुलिसकर्मी तैनात किए गए और दिन के अंत तक 7,000 से अधिक लोगों को हिरासत में लिए जाने की खबर दी गई। जंतर-मंतर की ओर जाने वाली सड़कों पर बैरिकेड लगाए गए और कई जगह वाहनों की जांच हुई। रिपोर्ट में अगले दिन भी बड़ी संख्या में पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती का जिक्र है। स्रोत: The Indian Express
प्रदर्शन के दौरान सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके और अन्य नेताओं को भी हिरासत में लिया गया। बाद में अदालत के आदेश के बाद उन्हें रिहा किया गया। रविवार को भी अलग-अलग स्थानों पर प्रदर्शन हुए और लोगों को हिरासत में लिए जाने की खबरें सामने आईं। स्रोत: Reuters
यहां सबसे महत्वपूर्ण सवाल है: यदि पुलिस के पास हिंसा या बड़े पैमाने पर अव्यवस्था की आशंका के ठोस आधार थे, तो सरकार और पुलिस को उन आधारों को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करना चाहिए। लेकिन अगर शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को भी व्यापक रूप से रोक दिया गया, तो ऐसी कार्रवाई की जरूरत और उसकी सीमा की समीक्षा होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का रुख: प्रदर्शन का अधिकार भी, कानून-व्यवस्था भी
सीजेपी के प्रदर्शन के बीच सुप्रीम कोर्ट ने 11 अक्टूबर को विशेष सुनवाई की। अदालत के सामने बैरिकेडिंग, मेट्रो सेवाओं पर पाबंदियों, हिरासत और पुलिस कार्रवाई से जुड़े सवाल उठे।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा कि जरूरत न होने पर बैरिकेड हटाए जाने चाहिए और आम लोगों की आवाजाही सामान्य रखी जानी चाहिए। अदालत ने संबंधित अधिकारियों से पुलिस कार्रवाई और पहले दिए गए निर्देशों के पालन पर जवाब भी मांगा। स्रोत: The Indian Express
सुप्रीम कोर्ट के सामने मूल सवाल यह था कि विरोध रोकने के लिए उठाए गए कदम कानून के अनुरूप और जरूरत के मुताबिक हैं या नहीं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि विरोध का अधिकार होने का मतलब यह नहीं है कि प्रदर्शनकारी कानून से ऊपर हैं।
इसका अर्थ दोनों पक्षों के लिए साफ है। प्रदर्शनकारियों को कानून का पालन करना होगा, लेकिन प्रशासन भी कानून-व्यवस्था के नाम पर मनमानी नहीं कर सकता। शांति बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी है; शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार और आम नागरिकों की आवाजाही को अनावश्यक रूप से बाधित करना उसका उद्देश्य नहीं हो सकता।
ध्यान देने वाली बात: अदालत की सुनवाई को सरकार या पुलिस के खिलाफ अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता। संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगना और प्रतिबंधों की समीक्षा करना अलग बात है; किसी कार्रवाई को गैरकानूनी घोषित करने के लिए अदालत का वास्तविक आदेश और मामले का पूरा रिकॉर्ड देखना जरूरी है।
बीजेपी समर्थकों पर पुलिस का एक्शन क्यों नहीं? उठ रहा है समान कार्रवाई का सवाल
इस पूरे विवाद का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि किसी प्रदर्शन के दौरान बीजेपी समर्थक या किसी अन्य राजनीतिक समूह से जुड़े लोग प्रदर्शनकारियों के साथ मारपीट करते हैं, धमकी देते हैं या बदसलूकी करते हैं, तो क्या पुलिस उनके खिलाफ भी उसी तत्परता से कार्रवाई करती है?
यह सवाल किसी एक पार्टी के पक्ष या विरोध का नहीं, बल्कि कानून के समान इस्तेमाल का है।
यदि किसी व्यक्ति के पास ऐसा वीडियो है जिसमें प्रदर्शनकारियों के साथ मारपीट, धमकी या हिंसा दिखाई देती है, तो पुलिस को उसकी निष्पक्ष जांच करनी चाहिए। वीडियो की तारीख, स्थान, पूरी घटना और संबंधित लोगों की पहचान की पुष्टि भी जरूरी है। केवल राजनीतिक पहचान के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन किसी को राजनीतिक समर्थन के कारण कार्रवाई से छूट भी नहीं मिलनी चाहिए।
इस मामले में तीन सवालों के जवाब जरूरी हैं:
क्या प्रदर्शनकारियों के साथ कथित बदसलूकी करने वालों के खिलाफ शिकायतें दर्ज हुई हैं?
यदि शिकायतें दर्ज हुई हैं, तो उन पर क्या कार्रवाई की गई और क्या उसकी जानकारी सार्वजनिक की गई?
क्या पुलिस ने सभी पक्षों के लोगों के खिलाफ समान कानूनी मानदंड अपनाए?
उपलब्ध रिपोर्टों से यह निष्कर्ष निकालना अभी उचित नहीं होगा कि बीजेपी समर्थकों को जानबूझकर कार्रवाई से बचाया गया। लेकिन यदि एक पक्ष के लोगों को बड़ी संख्या में हिरासत में लिया गया और दूसरे पक्ष की कथित हिंसा पर कार्रवाई नहीं हुई, तो पुलिस को इस अंतर का स्पष्ट जवाब देना चाहिए।
क्या सरकार सीजेपी से डर गई है?
यह राजनीतिक सवाल है, जिसका जवाब केवल पुलिस की तैनाती देखकर नहीं दिया जा सकता। सरकार और पुलिस का पक्ष है कि प्रतिबंधों और सुरक्षा व्यवस्था का उद्देश्य कानून-व्यवस्था बनाए रखना था। गृह मंत्रालय ने प्रदर्शन से पहले संभावित कानून-व्यवस्था संबंधी जोखिमों का हवाला दिया था। स्रोत: The Indian Express
लेकिन दूसरी ओर, हजारों लोगों को हिरासत में लेने, नेताओं को प्रदर्शन स्थल तक पहुंचने से रोकने और सार्वजनिक परिवहन पर असर पड़ने से यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या कार्रवाई जरूरत से ज्यादा व्यापक थी।
सरकार के डरने का दावा साबित करने के लिए ठोस प्रमाण चाहिए। फिर भी, लोकतंत्र में यह सवाल पूछना पूरी तरह जायज है कि यदि प्रदर्शन के पीछे उठाए गए मुद्दे निराधार हैं, तो सरकार और संबंधित संस्थाएं तथ्य सार्वजनिक करके उनका जवाब क्यों न दें?
विरोध को केवल सुरक्षा की समस्या मान लेने से मतदाता सूची से जुड़े सवाल खत्म नहीं हो जाते। दूसरी ओर, विरोध करने वालों के आरोपों को भी बिना जांच सच नहीं माना जा सकता।
असली विवाद मतदाता सूची और मतदान के अधिकार का है
सीजेपी का विरोध मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और मतदाता सूची में बदलाव को लेकर है। प्रदर्शनकारियों का दावा है कि बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जाने से उनके मतदान के अधिकार पर असर पड़ा है।
रॉयटर्स के अनुसार, चुनाव आयोग के आंकड़ों में सत्यापन प्रक्रिया के दौरान लगभग 13 करोड़ नाम हटाए जाने का उल्लेख है। आयोग ने इनमें मृत मतदाताओं, दूसरी जगह चले गए लोगों और जिनका पता नहीं लगाया जा सका, ऐसे मतदाताओं की श्रेणियां बताई हैं। आयोग ने जानबूझकर किसी राजनीतिक दल को फायदा पहुंचाने के आरोपों को खारिज किया है। स्रोत: Reuters
इसलिए दो अलग-अलग सवालों की जांच जरूरी है। पहला, हटाए गए नामों में कितने नाम नियमानुसार हटाए गए और कितने पात्र मतदाताओं के नाम गलती से हटे? दूसरा, यदि किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हटा, तो उसे समय पर सुधार और मतदान का अवसर देने के लिए क्या व्यवस्था की गई?
इन सवालों का जवाब आंकड़ों, दस्तावेजों और स्वतंत्र जांच से मिलना चाहिए, न कि केवल राजनीतिक बयानों से।
लोकतंत्र में पुलिस की निष्पक्षता ही असली कसौटी
दिल्ली में सीजेपी के प्रदर्शन पर हुई कार्रवाई ने पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। लेकिन इस विवाद का निष्पक्ष आकलन करने के लिए दोनों पक्षों के आचरण, पुलिस के आदेशों, हिरासत के आधार और कथित हिंसा की जांच को सामने रखना होगा।
अगर प्रदर्शनकारी कानून तोड़ते हैं, तो उनके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। अगर किसी सत्तारूढ़ दल के समर्थक या किसी दूसरे समूह के लोग हिंसा करते हैं, तो उनके खिलाफ भी वही कानून लागू होना चाहिए। और अगर पुलिस किसी शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी को गैरकानूनी तरीके से रोकती या उसके साथ दुर्व्यवहार करती है, तो उसकी भी जवाबदेही तय होनी चाहिए।
आखिर सवाल सीजेपी का नहीं, लोकतंत्र के नियमों का है। क्या राजधानी में विरोध करने का अधिकार सभी नागरिकों को समान रूप से हासिल है? क्या पुलिस राजनीतिक पहचान से ऊपर उठकर कार्रवाई करती है? और क्या मतदाता सूची से जुड़े गंभीर सवालों का जवाब पारदर्शी जांच से दिया जाएगा?
इन सवालों का जवाब नारों से नहीं, बल्कि निष्पक्ष कार्रवाई, सार्वजनिक रिकॉर्ड और कानून के समान इस्तेमाल से मिलना चाहिए।