पंजाब में NDA सरकार का दावा और AAP में सेंध: क्या सत्ता की राजनीति में अब जोड़तोड़ ही सबसे बड़ा हथियार है?
चंडीगढ़: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनाव के बाद NDA की सरकार बनने का दावा किया है। चंडीगढ़ में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर भी निशाना साधते हुए कहा कि अगर उन्हें प्रधानमंत्री बनना है तो पूरी जिंदगी मॉक पार्लियामेंट में ही बने रहना चाहिए, क्योंकि असली संसद में उनका नंबर नहीं आने वाला।
लेकिन शाह के इस बयान के साथ ही पंजाब की राजनीति में एक और घटनाक्रम सामने आया। आम आदमी पार्टी (AAP) के दो मौजूदा विधायकों ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। दोनों विधायकों के BJP में जाने की चर्चाएं भी तेज हो गई हैं।
यह घटनाक्रम ऐसे समय हुआ है जब पंजाब में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं और BJP राज्य में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या पंजाब में चुनावी मुकाबला अब केवल जनता के बीच अपनी नीतियां और कामकाज रखने तक सीमित रहेगा या दूसरी पार्टियों के नेताओं को अपने पाले में लाने की राजनीति भी तेज होगी?
अमित शाह का दावा और AAP के दो विधायकों का इस्तीफा
अमित शाह ने चंडीगढ़ में कहा कि 2027 के विधानसभा चुनाव के बाद पंजाब में NDA की सरकार बनेगी। उन्होंने राज्य को नशामुक्त बनाने का वादा भी किया और कहा कि 31 दिसंबर 2029 तक पंजाब सहित पूरे देश को नशामुक्त बनाने का लक्ष्य है।
इसी बीच AAP के समाना से विधायक चेतन सिंह जौड़ामाजरा और सनौर से विधायक हरमीत सिंह पठानमाजरा ने पार्टी छोड़ने का ऐलान कर दिया।
दोनों ने 1 नवंबर को चंडीगढ़ में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपने फैसले की जानकारी दी। दोनों विधायकों ने पार्टी नेतृत्व और भगवंत मान सरकार के कामकाज पर सवाल उठाए।
फिलहाल दोनों के BJP में शामिल होने की चर्चा है, लेकिन पार्टी में औपचारिक प्रवेश की पुष्टि और विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफे को अलग-अलग समझना जरूरी है।
टिकट की राजनीति से शुरू हुई बगावत?
AAP के इन दोनों विधायकों के इस्तीफे के पीछे तत्काल वजह पार्टी की 2027 विधानसभा चुनाव के लिए जारी पहली उम्मीदवार सूची और उनके विधानसभा क्षेत्रों में नए हलका प्रभारियों की नियुक्ति को माना जा रहा है।
AAP ने 31 अक्टूबर को 40 उम्मीदवारों की पहली सूची जारी की थी। इस सूची में दोनों विधायकों के नाम नहीं थे।
समाना में पूर्व अकाली नेता सुरजीत सिंह रखड़ा को हलका प्रभारी बनाया गया था, जबकि सनौर में रंजोध हडाना को यह जिम्मेदारी दी गई थी। इससे दोनों मौजूदा विधायकों के टिकट कटने की आशंका बढ़ गई थी।
चेतन सिंह जौड़ामाजरा पहले भगवंत मान सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं, लेकिन मंत्रिमंडल में फेरबदल के दौरान उन्हें हटा दिया गया था।
दूसरी ओर हरमीत सिंह पठानमाजरा पहले भी अपनी ही सरकार के कामकाज पर सवाल उठाते रहे हैं। उनके खिलाफ एक आपराधिक मामला भी दर्ज हुआ था, जिसमें उन्हें पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट से नियमित जमानत मिली थी।
इसलिए दोनों विधायकों के पार्टी छोड़ने को केवल BJP की राजनीतिक रणनीति का नतीजा बताना सही नहीं होगा। टिकट को लेकर नाराजगी और पार्टी नेतृत्व से मतभेद भी इसके महत्वपूर्ण कारण हैं।
क्या शुरू हो रहा है पंजाब में 'ऑपरेशन लोटस' जैसा खेल?
भारत की राजनीति में पिछले कुछ वर्षों में कई राज्यों में सरकारों और राजनीतिक दलों के भीतर विधायकों के टूटने, इस्तीफे देने और दूसरी पार्टियों में शामिल होने की घटनाएं सामने आई हैं।
मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और अन्य राज्यों में भी दल-बदल को लेकर बड़े राजनीतिक विवाद हुए हैं। कई मामलों में विपक्षी दलों ने BJP पर सरकारें गिराने और दूसरी पार्टियों के विधायकों को अपने साथ लाने के आरोप लगाए। BJP ने कई मौकों पर इन आरोपों को खारिज किया और विधायकों के फैसले को उनकी व्यक्तिगत या राजनीतिक पसंद बताया।
'ऑपरेशन लोटस' नाम का इस्तेमाल विपक्षी दल अक्सर ऐसी राजनीतिक घटनाओं के लिए करते रहे हैं, जिनमें दूसरी पार्टियों के विधायकों को अपने पाले में लाकर सरकार का बहुमत बदलने की कोशिश का आरोप लगाया जाता है।
पंजाब में अभी दो विधायकों के इस्तीफे को किसी संगठित ऑपरेशन का हिस्सा साबित करने वाला सार्वजनिक प्रमाण सामने नहीं आया है। लेकिन अमित शाह के सरकार बनाने के दावे और AAP विधायकों के पार्टी छोड़ने की घटनाओं ने इस बहस को फिर हवा दे दी है।
सत्ता हासिल करने के लिए दबाव, लालच और जांच एजेंसियों के इस्तेमाल के आरोप
राजनीतिक दलों के बीच नेताओं को अपने साथ लाने की कोशिश कोई नई बात नहीं है। लेकिन सवाल तब गंभीर हो जाता है जब किसी दल-बदल के पीछे पद, राजनीतिक लाभ, सरकारी दबाव या जांच एजेंसियों के इस्तेमाल की आशंका उठती है।
विपक्षी दल कई बार आरोप लगाते रहे हैं कि उनके नेताओं पर केंद्रीय जांच एजेंसियों की कार्रवाई और राजनीतिक दबाव के जरिए पार्टी बदलने का माहौल बनाया जाता है। दूसरी तरफ सरकार और BJP इन आरोपों को राजनीतिक बचाव बताते हुए खारिज करती रही हैं।
यहां एक बुनियादी सवाल है: अगर कोई विधायक अपनी पार्टी से असंतुष्ट है और दूसरी पार्टी में जाना चाहता है तो यह उसका राजनीतिक फैसला हो सकता है। लेकिन यदि किसी नेता को जांच, दबाव या किसी अनुचित लाभ के जरिए पार्टी बदलने के लिए मजबूर किया जाता है, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था और निष्पक्ष राजनीति के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
ऐसे आरोपों की जांच सबूतों के आधार पर होनी चाहिए, केवल राजनीतिक बयानबाजी के आधार पर नहीं।
संविधान में दल-बदल रोकने का कानून, फिर भी कैसे बदलते हैं सरकारों के समीकरण?
भारत के संविधान की दसवीं अनुसूची में दल-बदल विरोधी कानून शामिल है। इसे 1985 में 52वें संविधान संशोधन के जरिए लागू किया गया था।
इस कानून के तहत किसी राजनीतिक दल से चुना गया विधायक अगर स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ता है या सदन में पार्टी के निर्देश के खिलाफ मतदान करता है, तो उसकी विधानसभा सदस्यता जा सकती है।
हालांकि, कानून में विलय का एक अपवाद भी है। किसी दल के कम से कम दो-तिहाई विधायक उसके दूसरे दल में विलय के पक्ष में हों तो निर्धारित शर्तों के तहत उन्हें अयोग्यता से छूट मिल सकती है।
यही वजह है कि दल-बदल की राजनीति में केवल विधायकों की संख्या ही नहीं, बल्कि कानूनी प्रक्रिया, विधानसभा अध्यक्ष का फैसला और अदालतों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
सवाल यह भी है कि क्या दल-बदल विरोधी कानून वास्तव में जनता के जनादेश की रक्षा कर पा रहा है या राजनीतिक दल उसकी कानूनी सीमाओं के भीतर रहकर सत्ता के समीकरण बदलने के रास्ते खोज लेते हैं?
पंजाब की जनता के सामने असली सवाल
पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक गतिविधियां तेज हो रही हैं। AAP अपनी उम्मीदवार सूची जारी कर रही है, BJP राज्य में सरकार बनाने का दावा कर रही है और कांग्रेस भी अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश में है।
ऐसे में दो विधायकों का AAP छोड़ना केवल पार्टी के अंदरूनी विवाद का मामला नहीं रह जाता। यह पंजाब में बदलते राजनीतिक समीकरणों की एक महत्वपूर्ण घटना है।
लेकिन लोकतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि किस पार्टी के कितने विधायक दूसरी पार्टी में चले गए। असली सवाल यह है कि जनता ने जिस उम्मीदवार और पार्टी को चुनकर विधानसभा भेजा था, क्या उसके फैसले और भरोसे का सम्मान किया जा रहा है?
अगर कोई विधायक अपनी पार्टी छोड़ता है तो उसे अपने फैसले की राजनीतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी भी समझनी चाहिए। वहीं राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी है कि वे जनता के जनादेश को केवल सत्ता हासिल करने का रास्ता न समझें।
2027 में पंजाब की जनता के सामने केवल सरकार चुनने का सवाल नहीं होगा, बल्कि यह भी देखने का मौका होगा कि राजनीतिक दल जनता के मुद्दों, अपने वादों और लोकतांत्रिक मर्यादाओं को कितनी प्राथमिकता देते हैं।
