मँहगाई का सच सरकार नहीं, सड़क पर काम करने वालों से पूछो -सच पता चलेगा

Indian Inflation Reality Check



मँहगाई सरकार से नहीं, चाय-वाला, टैक्सीवाला,रेहड़ीवाला या 

छोटा-ढाबेवाले से पूछो-सब समझ आ जायेगा  


NB7-इकोनॉमी रिसर्च डेस्क दिल्ली  : गिरता रुपया, बढ़ते दाम -पेट्रोल, डीज़ल, गैस और बिकती 

सरकारी कंपनियां और बढ़ता विश्व बैंक का लोन और ब्याज चुकाने का खर्च — आखिर भारतीय 

अर्थव्यवस्था में चल क्या रहा है?

सरकारी आंकड़ों का भारत : टीवी स्क्रीन पर भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं 

में से एक दिखाई देता है। शेयर बाजार रिकॉर्ड स्तर छूता है, एक्सप्रेसवे बन रहे हैं, एयरपोर्ट बन रहे हैं, 

डिजिटल भुगतान के नए रिकॉर्ड बन रहे हैं।


आम आदमी का भारत :

यह भारत किसी आर्थिक सर्वे की रिपोर्ट में नहीं, बल्कि चाय की दुकान, ढाबे, सब्ज़ी मंडी, रेहड़ी-ठेले 

और छोटे रेस्टोरेंट में दिखाई देता है।

अब सवाल उठता है—

-अगर भारतीय इकोनॉमी बढ़ रही है तो आम आदमी लगातार महंगाई की शिकायत क्यों कर 

रहा है?

-अगर अर्थव्यवस्था मजबूत है तो सरकार सरकारी कंपनियां क्यों बेच रही है?

-अगर विकास तेज़ है तो विदेशी निवेशक पैसा क्यों निकाल रहे हैं?

-अगर तेल सस्ता होता है तो पेट्रोल-डीज़ल उतना सस्ता क्यों नहीं होता?

और अगर महंगाई नियंत्रित है तो चाय, समोसा, थाली और गैस के दाम लगातार क्यों बढ़ रहे हैं?


सरकारी कंपनियां क्यों बेची जा रही हैं?

पिछले कुछ वर्षों में केंद्र सरकार ने कई सरकारी कंपनियों में हिस्सेदारी बेची है और विनिवेश 

(Disinvestment) की नीति को आगे बढ़ाया है।

सरकार का तर्क है कि:

-घाटे वाली कंपनियों का बोझ कम होगा।

-सरकार को अतिरिक्त राजस्व मिलेगा।

-निजी क्षेत्र अधिक कुशलता से काम करेगा।

-इंफ्रास्ट्रक्चर पर ज्यादा खर्च किया जा सकेगा।

- विशेषज्ञों और आंकड़ों के अनुसार सरकार ने कुछ लाभ कमाने वाली कंपनियों को भी बेच 

  दिया है 

विशेषज्ञों और आलोचकों के अनुसार सरकार एक बार की आय के लिए स्थायी संपत्तियां बेच रही है।

सवाल यह है कि क्या यह आर्थिक सुधार है तो लाभ कमाने वाली कंपनियों को बेच कर सरकारी 

खजाने की जरूरत क्यों पड़ रही है  


सरकार का पैसा आखिर जा कहां रहा है?

सरकार का कुल खर्च लगातार बढ़ रहा है।

रक्षा, रेलवे, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, सब्सिडी और कल्याणकारी योजनाओं पर हजारों करोड़ रुपये 

खर्च होते हैं।

लेकिन एक बड़ा तथ्य यह भी है कि सरकार के बजट का बड़ा हिस्सा पुराने कर्ज के ब्याज भुगतान 

में चला जाता है।

यानी सरकार लिए गए कर्ज का ब्याज चुकाने के लिए भी भारी रकम खर्च कर रही है।

सरकार का कुल खर्च FY 2025-26 में लगभग 49 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया जबकि 

राजस्व बढ़ने के बावजूद राजकोषीय घाटा 15 लाख करोड़ रुपये से अधिक रहा।

यदि हम तुलना करें तो 2014  में  ₹58.6 लाख करोड़ था जो अब बढ़ कर 2023 में ₹155.6 लाख 

करोड़ हो चूका था 

1947 से 2014 तक 67 सालों में  केंद्र सरकार का कुल कर्ज लगभग ₹58.6 लाख करोड़ तक 

पहुंचा था, जबकि 2014 के बाद सिर्फ अगले 09 वर्षों में यह बढ़कर ₹155.6 लाख करोड़ से 

अधिक हो गया था।  



विदेशी निवेशक पैसा क्यों निकाल रहे हैं?

सरकार लगातार भारत को निवेश का सबसे बड़ा और आकर्षक बाजार बताती है।

फिर भी समय-समय पर विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) भारतीय बाजार से पैसा निकालते 

दिखाई देते हैं।

इसके कारण हैं:

-अमेरिका में ऊंची ब्याज दरें, इसलिए विदेशी निवेशक भारत से पैसा निकाल कर वापस अमेरिका में 
  
लगा रहे हैं।  

-भारत में व्यापार करना जितना बताया जाता है उससे कहीं ज्यादा मुश्किल है, क्योंकि भारत का 

अधिकतर व्यापार बड़ी कंपनियों के पास है, छोटे व्यापारियों को नया व्यापार खड़ा करने में इन्ही 

धनाढ़य अत्यंत विशाल कम्पनियाँ "जिन्हें सरकार की और से सभी तरह की सुविधाएं आरक्षित होती हैं" 

के साथ होता है, जिसमें  छोटी नई कम्पनियाँ कड़ी तक नहीं हो पाती हैं।  

-वैश्विक युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव, लगातार अस्थिरता व्यापार के लिए अत्यंत बुरी मानी जाती है 

और सभी वस्तुओं के मूल्य मुश्किल समय में बढ़ जाते हैं।  

-भारतीय बाजार का महंगा मूल्यांकन, विदेशी निवेशकों की माने तो भारतीय बाजार अपनी वास्तविक    
मूल्य से अधिक पर दिखाया जाता है जो की सही नहीं है।  

-डॉलर की मजबूती, दुनिया में अधिकतर लेनदेन डॉलर में होता है इसलिए लगातार डॉलर की डिमांड   
बनी रहती है जिसके कारण उसकी कीमत कम नहीं होती बल्कि युद्ध और भूराजनैतिक तनाव में 

डॉलर की डिमांड हथियार और तेल बारूद युद्ध की मशीनें दुसरे देशों से खरीदने के कारण और बढ़ 

जाती है, जिसका सीधा असर डॉलर की बढ़ी कीमत या मजबूती से होता है।  

-डॉलर महंगा होता है तो रुपया कमजोर पड़ता है या एक डॉलर खरीदने के लिए ज्यादा रूपए देने 

पड़ते हैं।  इसलिए रुपया गिरता है।


रुपया कमजोर क्यों होता जा रहा है?

-भारत आज भी अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है।

-कच्चा तेल, गैस, इलेक्ट्रॉनिक्स और सोने के आयात के लिए डॉलर चाहिए।

-जब डॉलर की मांग बढ़ती है तो रुपया दबाव में आता है।

-विदेशी निवेशकों की निकासी भी रुपये को कमजोर करती है।


पेट्रोल और डीज़ल का भाव सबसे बड़ा सवाल !

आम आदमी का सबसे बड़ा सवाल यही है।

जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल सस्ता होता है तो पेट्रोल-डीज़ल उतना सस्ता क्यों नहीं होता?

कई आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि इसका बड़ा कारण कर (Taxes) हैं।

-2014 में केंद्र सरकार का उत्पाद शुल्क 

पेट्रोल पर लगभग ₹9.48 प्रति लीटर और 

डीज़ल पर ₹3.56 प्रति लीटर था।


-2024 में केंद्र सरकार का उत्पाद शुल्क 

पेट्रोल पर लगभग ₹19.90 प्रति लीटर और 

डीज़ल पर ₹15 .80 प्रति लीटर था।


बाद के वर्षों में यह कई गुना बढ़ा और सरकार का पेट्रोलियम कर संग्रह रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया।

सरकार का तर्क है कि इसी राजस्व से सड़क, रेलवे, रक्षा और कल्याणकारी योजनाएं चलती हैं।

लेकिन आलोचक पूछते हैं:

-जब कच्चा तेल सस्ता था तब भी जनता को राहत क्यों नहीं दी ?


महंगाई की कहानी कमर्शियल गैस की कीमत बता रही है

अक्सर बहस घरेलू LPG सिलेंडर तक सीमित रहती है।

लेकिन सड़क किनारे बिकने वाली चाय, समोसा, छोले-भटूरे, इडली, डोसा और थाली घरेलू गैस पर 

नहीं बनती।

इसके लिए 19 किलो वाला कमर्शियल LPG सिलेंडर इस्तेमाल होता है।

1 जून 2026 से दिल्ली में कमर्शियल LPG सिलेंडर की कीमत ₹1580 से बढ़कर ₹3113.50 हो गई।

 यानी कीमत लगभग दोगुनी होने गयी।  


इसका असर आखिर पड़ता किस पर है?

तेल कंपनी पर - नहीं

सरकार पर - नहीं

बल्कि:

-चाय वाले पर

-ढाबे वाले पर

-हलवाई पर

-छोटे होटल मालिक पर

-रेहड़ी वाले पर

और अंत में  ग्राहक या आम आदमी पर।


कई छोटे कारोबारी बताते हैं कि बढ़ती गैस, डीज़ल और किराये की लागत के कारण उन्हें खाने-पीने 

की वस्तुओं के दाम बढ़ाने पड़े हैं। सोशल मीडिया और सामुदायिक चर्चाओं में भी छोटे व्यवसायियों 

द्वारा इसी चिंता को दोहराया जा रहा है।


फिर सरकारी महंगाई दर कम क्यों दिखाई देती है?


-क्योंकि महंगाई का सरकारी आंकड़ा एक औसत होता है।

-लेकिन आम आदमी का बजट औसत नहीं होता।


उसे जब अधिक कीमत चुकानी पड़ती है और उसकी आमदनी नहीं बढ़ती तब :

-दूध

-दाल

-सब्ज़ी

-गैस

-स्कूल फीस

-दवाइयां

-किराया

और अन्य खर्च तथा इनकी कीमतें तेजी से बढ़ें तो लोगों को महंगाई कहीं ज्यादा महसूस होती है।


सरकारी आंकड़ों में बेरोजगारी कम दिखाई देती है, 

किन्तु नौकरी का भारी संकट क्यों महसूस होता है?

यह भी बड़ा सवाल है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति किसी भी प्रकार का काम कर रहा है, या मजबूरी में 

मजदूरी भी कर रहा है तो वह बेरोजगार नहीं माना जाता।

जैसे :

-इंजीनियर डिलीवरी बॉय हो

-साइंस ग्रेजुएट सिक्योरिटी गार्ड की अस्थायी नौकरी कर रहा हो

-लाखों युवा सरकारी नौकरी के लिए लाइन में लगे हों

तो यह रोजगार की गुणवत्ता पर सवाल उठाता है।

भारत में बड़ी चुनौती केवल बेरोजगारी नहीं बल्कि पूर्ण रोजगार की उपलब्धता भी है।


क्या अर्थव्यवस्था संकट में है?

अभी ऐसा कहना 50 % गलत होगा। क्योंकि 

भारत के पास:

-विशाल घरेलू बाजार

-मजबूत बैंकिंग व्यवस्था

-बड़ा सेवा क्षेत्र

-बढ़ता इंफ्रास्ट्रक्चर

-बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार 
मौजूद है।

लेकिन चुनौतियां भी उतनी ही बड़ी और वास्तविक हैं।

-जनसख्या का दबाव 

-महंगाई का दबाव

-रोजगार की गुणवत्ता

-बढ़ता कर्ज

-गिरता रुपया

-निवेश की अनिश्चितता

-तेज़ी से वापस भागता विदेशी निवेश 


अंत में: अर्थव्यवस्था को समझना हो तो मंत्रालय नहीं, 

भारतीय आम बाजार जाइए


-सरकारी रिपोर्ट आपको GDP बताएगी। 

-प्रति व्यक्ति बढ़ी हुई आय दिखाएंगें, लेकिन ये प्रति व्यक्ति आय एवरेज होती है सभी की नहीं।  

उदाहरण से समझते हैं - यदि किसी बस में बीस यात्री हैं और उनमें से एक यात्री के पास एक लाख 

रूपये हैं जबकि 19 यात्रियों की जेब खाली है तो सरकारी व्याख्या के अनुसार इस बस के यात्रियों के 

पास एक लाख रूपये हैं या प्रति व्यक्ति उनके पास 5000 रूपये हैं, जबकि सारा पैसा एक ही आदमी 

(यात्री ) का है।  सरकार इसे ही प्रति व्यक्ति आय कहती है।  

-शेयर बाजार आपको निवेशकों का मूड बताएगा।

-लेकिन आम आदमी की आर्थिक स्थिति जाननी हो तो किसी पांच सितारा होटल में नहीं, बल्कि 

मोहल्ले की चाय की दुकान पर जाइए।

-ढाबे वाले से पूछिए कि गैस कितनी महंगी हुई।

-सब्जी वाले से पूछिए कि डीज़ल का असर क्या है।

-रेहड़ी वाले से पूछिए कि ग्राहक कम क्यों हो रहे हैं।

-और ग्राहक से पूछिए कि महीने के अंत में जेब में कितना पैसा बचता है।

क्योंकि अर्थव्यवस्था की असली परीक्षा आंकड़ों में नहीं, लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में होती है।