बंगाल में ऑपरेशन लोटस की अटकल, TMC में टूट फूट की खबर

बंगाल में ‘ऑपरेशन लोटस’ की चर्चा तेज, TMC में टूट-फूट की अटकलों पर 

सियासी घमासान

 

बीजेपी की पुरानी तरकीब-लोटस कार्यवाही, और ममता को बिखराव का डर 

NB7 - नई दिल्ली:- राजधानी में जब INDIA गठबंधन की बैठक खत्म हुई, तो मंच से विपक्षी 

एकता, लोकतंत्र और संविधान बचाने की बुलंद बातें सुनाई दीं। कैमरे चमके, नेताओं ने हाथ मिलाए 

और एक मजबूत फ्रंट का दावा किया गया। लेकिन लुटियंस दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में चर्चा 

इस बात की नहीं, बल्कि पर्दे के पीछे छिपी उस गहरी बेचैनी की है, जो विपक्ष को अंदर ही अंदर खाए 

जा रही है। सवाल बड़ा है—क्या विपक्ष भाजपा से लड़ने से पहले अपने ही कुनबे को बिखरने से बचा 

पाएगा?

बैठक में कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, सपा और राजद ने एकजुटता का गुलदस्ता तो दिखाया, लेकिन आम 

आदमी पार्टी और डीएमके की गैर-मौजूदगी ने यह साफ कर दिया कि इस गुलदस्ते में सब कुछ 

सामान्य नहीं है।


दीदी दिल्ली में, पर बंगाल में 'खेला' होने की तैयारी ?

बैठक में ममता बनर्जी की मौजूदगी ने भले ही विपक्षी खेमे को ऑक्सीजन दी हो, लेकिन इस वक्त 

सबसे बड़ी हेडलाइन पश्चिम बंगाल से आ रही है। राजनीतिक हलकों में सरगर्मी तेज है कि तृणमूल 

कांग्रेस (TMC) के कई सिटिंग सांसद और बड़े नेता एक-एक कर पाला बदलने और भाजपा का 

दामन थामने को तैयार बैठे हैं।


चर्चाएं गर्म हैं कि बंगाल में 'ऑपरेशन लोटस' का अगला चरण बेहद आक्रामक होने वाला है। खबर 

तो यहाँ तक है कि तृणमूल के 15 से 20 सिटिंग नेता जल्द ही कुछ बड़ा धमाका कर सकते हैं। 

रणनीति सिर्फ दलबदल तक सीमित नहीं है; असली खेल तो दलबदल कानून (Anti-Defection 

Law) का तोड़ निकालने का भी है। कानूनी पेचीदगियों से बचने के लिए एक बड़ा गुट तोड़ा जा सकता 

है और आगे चलकर शरद पवारउद्धव ठाकरे की तरह ममता बनर्जी से उनकी पार्टी का नाम 

और TMC का चुनाव चिन्ह' तक छीनने की कोशिस हो तो कोई नई बात नहीं होगी।


अमित शाह का 'गुजरात मॉडल' या पार्टी तोड़ने जोड़ने का ढंग !

राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो अमित शाह की पूरी स्क्रिप्ट पर युद्ध स्तर पर काम हो रहा है, जिसे 

अमित शाह गुजरात के दिनों से आजमाते आए हैं। यानी 'सारे गलत और अलोकतांत्रिक काम कानून 

के दायरे में रहकर करना'। इस रणनीति में 'साम, दाम, दंड, भेद' का खुलकर इस्तेमाल हो रहा है।

विपक्ष का सीधा आरोप है कि इस नए दौर की राजनीति में सिर्फ नेताओं को तोड़ना ही काफी नहीं है, 

बल्कि इसके बैकएंड में सरकारी तंत्र का पूरा पावरहाउस काम कर रहा है:


दंड और भेद: बिना वजह की एफआईआर (FIR), पुलिसिया तड़पाव और जेल की धमकियां।

केंद्रीय एजेंसियां: ED और CBI का ऐसा चक्रव्यूह, जिससे पार पाना किसी भी क्षत्रप के लिए टेढ़ी 

खीर साबित हो रहा है।

संवैधानिक संस्थाएं:
चुनाव आयोग (EC) के जरिए पार्टी और सिंबल पर कब्जे की कानूनी जंग।

विपक्ष का कहना है कि जो नेता जांच के रडार पर हैं, उनके लिए भाजपा की 'वाशिंग मशीन' ही 

एकमात्र सहारा बचती है।


बीजेपी का पुराना इतिहास और विपक्ष का डर:

भारतीय राजनीति में 'ऑपरेशन लोटस' कोई नया शब्द नहीं है। 

महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी का जो हश्र हुआ, मध्य प्रदेश और कर्नाटक में जिस तरह सरकारें 

बदलीं, उसने विपक्षी दलों के भीतर एक ऐसा खौफ पैदा कर दिया है कि वे अपने ही नेताओं को शक 

की निगाह से देखने लगे हैं। सरकार भले ही इन आरोपों को खारिज करे और कहे कि 'नेता अपनी 

मर्जी और मोदी जी के विकास कार्यों से प्रभावित होकर आते हैं', लेकिन क्रोनोलॉजी समझने वाले 

जानते हैं कि धुआं वहीं उठता है जहां आग लगी हो।


केजरीवाल की दूरी और विपक्षी गणित:

इस महा-मंथन के बीच आम आदमी पार्टी (AAP) की दूरी ने विपक्ष के गणित को और उलझा दिया है 

एक तरफ जहां भाजपा को रोकने के लिए 'मैक्सिमम विपक्षी एकता' की बात हो रही है, वहीं दूसरी 

तरफ क्षेत्रीय दल अपनी स्वतंत्र राजनीतिक जमीन और अस्तित्व को बचाने के लिए कशमकश में हैं। 

जेल, बेल और जांच के इस दौर में हर दल पहले अपना घर बचाना चाहता है।

असली लड़ाई 2029 से पहले "वजूद" की है 

अब यह साफ हो चुका है कि अगले कुछ वर्षों में विपक्ष की असली परीक्षा चुनावी मैदान से ज्यादा 

अपने ही किले को बचाने में होने वाली है। 

विपक्षी दल ED, CBI के चक्रव्यूह, आंतरिक दलबदल और 'ऑपरेशन लोटस' के इस नए बंगाली 

एडिशन से खुद को बचा पाए, तभी वे भाजपा के सामने कोई चुनौती पेश कर पाएंगे।

दिल्ली की बैठक ने विपक्ष को एक फ्रेम में जरूर ला दिया है, लेकिन राजनीति में तस्वीरें चुनाव नहीं 

जितातीं, मजबूत संगठन और एकजुट नीति से मुकाबला करने वाली रणनीति चुनाव जिताती है। 

आने वाले महीनों में बंगाल की खाड़ी से उठने वाला यह सियासी तूफान यह तय कर देगा कि INDIA 

गठबंधन एक वास्तविक ताकत बनकर उभरेगा या फिर 'साम-दाम-दंड-भेद' के आगे सिर्फ एक बेबस 

बैठकों का दौर बनकर रह जाएगा।