'दिमागी नक्सल' कौन हैं?
CJP आंदोलन के बाद PM मोदी के बयान से उठे सवाल
NB7 -न्यूज़ विश्लेषण डेस्क - **15 अगस्त 2026 को लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र
मोदी ने कहा कि हथियार उठाने वाले नक्सलवाद को काफी हद तक खत्म कर दिया गया है, लेकिन
“दिमागी नक्सल” अभी भी मौजूद हैं। उन्होंने ऐसे लोगों को पहचानने और अलग-थलग करने की बात
कही। प्रधानमंत्री के इस बयान पर विपक्ष और CJP से जुड़े लोगों ने सवाल उठाए हैं। **
लेकिन इस बयान का असली सवाल केवल नक्सलवाद नहीं है।
सवाल यह है कि “दिमागी नक्सल” की परिभाषा क्या है?
क्या इसका मतलब उन लोगों से है जो हिंसक माओवादी विचारधारा का समर्थन करते हैं? अगर ऐसा
है तो बात स्पष्ट है।
लेकिन अगर इस शब्द का इस्तेमाल सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने वाले
छात्रों, युवाओं, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों के लिए होने लगे, तो यह लोकतंत्र के लिए गंभीर सवाल बन
जाता है।
और यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कुछ ही सप्ताह पहले दिल्ली में CJP का छात्र
आंदोलन सरकार के लिए बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका था।
CJP आंदोलन ने क्या सवाल उठाए थे?
CJP के आंदोलन में युवाओं ने परीक्षा व्यवस्था, कथित पेपर लीक, शिक्षा व्यवस्था और सरकारी
जवाबदेही जैसे मुद्दे उठाए। 20 जुलाई को प्रदर्शनकारियों के संसद की ओर मार्च के दौरान दिल्ली
पुलिस ने आंसू गैस और लाठीचार्ज का इस्तेमाल किया। इस कार्रवाई पर विपक्ष ने सरकार से जवाब
और प्रधानमंत्री से माफी की मांग की।
बाद में संसद में इस मुद्दे पर गतिरोध भी बना रहा। सरकार की ओर से गृह मंत्री अमित शाह के बयान
और चर्चा का प्रस्ताव सामने आया, लेकिन विपक्ष ने इसे पर्याप्त नहीं माना और प्रधानमंत्री से सीधे
जवाब की मांग जारी रखी।
सुप्रीम कोर्ट ने भी हाल में प्रदर्शन के संदर्भ में कानून-व्यवस्था एजेंसियों को संयम बरतने और युवाओं
को शांत करने की जरूरत पर जोर दिया।
यानी CJP आंदोलन का सवाल केवल सड़क तक सीमित नहीं रहा।
वह संसद और अदालत तक पहुंच गया।
देशद्रोही, अर्बन नक्सल, पाकिस्तानी, आन्दोलनजीवी और अब
‘दिमागी नक्सल’! इन सज्जन को क्या कष्ट है भाई ?
इसी पृष्ठभूमि में 15 अगस्त को प्रधानमंत्री का यह कहना कि “दिमागी नक्सल” को पहचानना और अलग-थलग
करना होगा, राजनीतिक रूप से चर्चा का विषय बन गया।
ध्यान देने वाली बात यह है कि प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में CJP का नाम लेकर उसे ‘दिमागी नक्सल’ नहीं कहा।
इसलिए यह दावा करना कि उन्होंने CJP के बच्चों को सीधे “दिमागी नक्सल” कहा, सही नहीं होगा।
लेकिन सवाल फिर भी बनता है—
CJP जैसे आंदोलन में सरकार से सवाल पूछने वाले युवाओं और प्रधानमंत्री के भाषण में
“दिमागी नक्सल” जैसे शब्द के बीच राजनीतिक संबंध को लेकर आशंका क्यों पैदा हुई?
यही इस पूरे विवाद का विश्लेषण वाला हिस्सा है।
नक्सलवाद आखिर पैदा क्यों हुआ था?
नक्सलवाद को समझने के लिए उसके इतिहास को भी समझना जरूरी है।
1967 के नक्सलबाड़ी आंदोलन के पीछे भूमि असमानता, गरीब किसानों और आदिवासियों के
अधिकार, जमींदारी शोषण और ग्रामीण आर्थिक-सामाजिक असमानता जैसे सवाल थे।
बाद के वर्षों में मध्य और पूर्वी भारत के आदिवासी क्षेत्रों में जमीन, जंगल, खनिज संसाधन, विस्थापन
और विकास परियोजनाओं को लेकर भी संघर्ष बढ़े।
स्थानीय लोगों का एक बड़ा सवाल था—
अगर हमारी जमीन और संसाधनों से विकास हो रहा है, तो उसका फायदा स्थानीय लोगों को
कितना मिल रहा है?
इन वास्तविक सामाजिक और आर्थिक असंतोषों ने कई इलाकों में माओवादी आंदोलन के लिए जमीन
तैयार की।लेकिन यहां फर्क समझना बेहद जरूरी है।
सरकार से असंतोष और नक्सली हिंसा एक चीज नहीं है।
माओवादी आंदोलन के एक हिस्से ने बाद में सशस्त्र संघर्ष का रास्ता अपनाया। नागरिकों और सुरक्षा
बलों पर हिंसा हुई और यह एक गंभीर सुरक्षा समस्या बन गई।
इसलिए नक्सली हिंसा का विरोध बिल्कुल जरूरी है।
लेकिन सरकार की किसी नीति से असहमति को नक्सलवाद मान लेना भी उतना ही गलत होगा।
आज के युवाओं का सवाल क्या है?
आज का छात्र बंदूक नहीं मांग रहा।
वह पूछ रहा है—
मेरी परीक्षा में गड़बड़ी क्यों हुई?
पेपर लीक कैसे हुआ?
मेरे भविष्य की जिम्मेदारी किसकी है?
सरकार जवाब क्यों नहीं दे रही?
और CJP आंदोलन के संदर्भ में एक और सवाल उठा—
शांतिपूर्ण तरीके से सवाल पूछ रहे युवाओं पर पुलिस कार्रवाई क्यों हुई?
इन सवालों का जवाब देना लोकतांत्रिक सरकार की जिम्मेदारी है।
अगर किसी प्रदर्शनकारी ने कानून तोड़ा है तो कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
लेकिन अगर कोई छात्र केवल सवाल पूछ रहा है, तो उसके सवाल का उत्तर दिया जाना चाहिए।
लेबल नहीं।
क्या हर असंतुष्ट नागरिक ‘दिमागी नक्सल’ है?
नहीं।
और प्रधानमंत्री के बयान से ऐसा निष्कर्ष सीधे नहीं निकाला जा सकता।
लेकिन यह स्पष्टता जरूरी है कि “दिमागी नक्सल” से सरकार का मतलब क्या है।
अगर इसका अर्थ है—
हिंसक माओवादी विचारधारा का समर्थन करने वाले लोग, किन्तु आज कोई हिंसा नहीं कर रहा
सिवाय पुलिस के, सबने देखा, सब रिकॉर्ड में है ! आंदोलन कर रहे छात्र सामान्य विद्यार्थी थे !
तो सरकार को इसे स्पष्ट करे की दिमागी नक्सल कौन ?
लेकिन अगर इसका अर्थ धीरे-धीरे उन लोगों के लिए इस्तेमाल होने लगे जो—
-सरकार की आलोचना करते हैं,-शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाते हैं,
-बेरोजगारी पर सवाल करते हैं,
-पुलिस कार्रवाई की जांच मांगते हैं,
-सरकारी नीतियों से असहमत हैं,
-संविधान और नागरिक अधिकारों की बात करते हैं,
तो यह एक अलग और गंभीर राजनीतिक समस्या होगी।
सवाल पूछने वाला देशद्रोही कैसे हो गया?
भारतीय राजनीति में समय-समय पर सरकारों के आलोचकों के लिए अलग-अलग राजनीतिक labels
इस्तेमाल होते रहे हैं।
कभी “देशद्रोही”,
कभी “अर्बन नक्सल”,
कभी “टुकड़े-टुकड़े गैंग”,
कभी “पाकिस्तानी”,
कभी “आंदोलनजीवी”,
और अब—
“दिमागी नक्सल।”
यहां सवाल किसी एक शब्द का नहीं है।
सवाल यह है कि क्या राजनीतिक असहमति को जवाब देने के बजाय उसे किसी लेबल में बंद
किया जा रहा है?
अगर किसी व्यक्ति का तर्क गलत है तो उसे तथ्यों से गलत साबित किया जा सकता है।
अगर किसी ने अपराध किया है तो कानून कार्रवाई कर सकता है।
लेकिन केवल इसलिए कि कोई सरकार से सवाल करता है, उसे संदिग्ध विचारधारा से जोड़ देना
लोकतांत्रिक संवाद को कमजोर कर सकता है।
क्या पढ़े-लिखे युवाओं से सरकार को परेशानी है?
यह कहना कि “प्रधानमंत्री को शिक्षित लोगों से परेशानी है” एक राजनीतिक आरोप होगा, स्थापित
तथ्य नहीं।
लेकिन सवाल पूछना पूरी तरह जायज है।
क्योंकि पढ़ा-लिखा नागरिक सवाल करता है।
वह सरकारी आंकड़े पढ़ता है।
वह बजट देखता है।
वह संविधान पढ़ता है।
वह परीक्षा व्यवस्था पर सवाल करता है।
वह पूछता है कि पुलिस ने बल प्रयोग क्यों किया।
वह पूछता है कि अधिकारी की जवाबदेही क्यों तय नहीं हुई।
और सबसे महत्वपूर्ण—
वह हर सरकारी दावे को बिना जांचे स्वीकार नहीं करता।
लोकतंत्र में यही तो नागरिक चेतना है।
सरकार को ऐसे नागरिकों से डरने के बजाय उनके सवालों का जवाब देना चाहिए।
‘आइसोलेट’ करने की बात क्यों महत्वपूर्ण है?
प्रधानमंत्री ने ऐसे “दिमागी नक्सल” लोगों को पहचानने और अलग-थलग करने की बात कही।
यही शब्द सबसे ज्यादा सवाल खड़े करता है।
किसे अलग किया जाएगा?
किस आधार पर?
किस कानून के तहत?
अगर कोई हिंसक संगठन का सदस्य है तो कानून अपना काम करे।
लेकिन अगर कोई छात्र सरकार की आलोचना करता है?
अगर कोई प्रोफेसर सरकारी नीति पर सवाल उठाता है?
अगर कोई पत्रकार सरकारी आंकड़ों की जांच करता है?
अगर कोई नागरिक पुलिस की कार्रवाई की जवाबदेही मांगता है?
तो क्या वह भी इसी श्रेणी में आएगा?
अगर नहीं, तो यह स्पष्ट रूप से कहा जाना चाहिए।
असली परीक्षा सरकार की है
CJP आंदोलन ने सरकार के सामने असहज सवाल रखे।
पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठे।
संसद में जवाबदेही की मांग हुई।
और आंदोलन की राष्ट्रीय चर्चा ने शिक्षा व्यवस्था और युवाओं के मुद्दों को केंद्र में ला दिया। बाद में
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और परीक्षा सुधारों से जुड़े घटनाक्रम ने इस पूरे विवाद को और
राजनीतिक महत्व दिया।
अब आंदोलन शांत हो सकता है।
लेकिन सवाल खत्म नहीं होते।
किसी आंदोलन का शांत हो जाना यह साबित नहीं करता कि उसके सवाल भी खत्म हो गए।
निष्कर्ष: सरकार से सवाल करना नक्सलवाद नहीं
हिंसक नक्सलवाद के खिलाफ सरकार की कार्रवाई जरूरी है।
लेकिन हर असंतोष को नक्सलवाद के चश्मे से देखना लोकतंत्र के लिए सही नहीं होगा।
नक्सली हिंसा और छात्र आंदोलन के बीच स्पष्ट अंतर होना चाहिए।
-एक व्यक्ति संविधान के खिलाफ बंदूक उठाता है। नक्सल है !
-दूसरा संविधान और कानून के दायरे में सवाल उठाता है। नक्सल नहीं है, संविधान में मिली
जिम्मेदारी भी है और अधिकार भी।
दोनों को एक ही श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
आज CJP के युवाओं का सवाल हो, किसी बेरोजगार का सवाल हो या किसी पत्रकार का—
सवाल पूछना आजाद भारत में अपराध नहीं है।
सरकार मजबूत है तो उसे सवालों से डरने की जरूरत नहीं।
और अगर सरकार सही है तो सबसे आसान रास्ता यही है—
सवाल पूछने वाले को ‘दिमागी नक्सल’ कहने के बजाय उसके सवाल का जवाब दिया जाए।
क्योंकि लोकतंत्र में असली खतरा सवाल पूछने वाले नागरिक से नहीं होता।
असली खतरा तब पैदा होता है जब लोकतंत्र में नागरिक सवाल पूछना ही छोड़ दे।
