क्या UPI पेमेंट अब नहीं रहेगा पूरी तरह मुफ्त?
जानिए क्या है पूरा मामला
NB7-Finance Desk:-भारत में करोड़ों लोग रोजाना UPI (Unified Payments Interface) के
जरिए बिना किसी शुल्क के भुगतान करते हैं। चाय की दुकान से लेकर बड़े मॉल तक, हर जगह QR
Code स्कैन करके भुगतान करना अब आम बात हो गई है।
लेकिन अब सवाल उठ रहा है कि क्या आने वाले महीनों में UPI पर भी चार्ज लग सकता है?
इस सवाल की वजह हाल ही में संसद में हुए कानूनी बदलाव और सरकार के स्तर पर चल रही चर्चाएं
हैं। हालांकि अभी तक आम ग्राहकों पर कोई शुल्क नहीं लगाया गया है और सरकार ने कोई अंतिम
फैसला भी नहीं लिया है।
अभी UPI पूरी तरह मुफ्त है
फिलहाल यदि आप किसी व्यक्ति या दुकान पर UPI से भुगतान करते हैं तो आपसे कोई ट्रांजैक्शन
फीस नहीं ली जाती।
2019 में सरकार ने UPI और RuPay डेबिट कार्ड पर Zero MDR (Merchant Discount Rate)
की नीति लागू की थी, ताकि देश में डिजिटल भुगतान को बढ़ावा मिले। इसी कारण भारत दुनिया का
सबसे बड़ा रियल-टाइम डिजिटल पेमेंट बाजार बन गया।
MDR क्या होता है?
MDR (Merchant Discount Rate) वह शुल्क होता है जो किसी डिजिटल भुगतान पर व्यापारी से
लिया जाता है।
(MDR में D मतलब डिस्काउंट, किन्तु ये डिस्काउंट नहीं शुल्क है जो ग्राहक से वसूला जाता है)
उदाहरण के लिए यदि किसी दुकान पर ग्राहक ₹10,000 का भुगतान करता है और MDR 0.5% है,
तो लगभग ₹50 भुगतान सेवा से जुड़ी कंपनियों और बैंकों के बीच शुल्क के रूप में जाता है।
क्रेडिट और डेबिट कार्ड पर यह व्यवस्था पहले से लागू है, लेकिन सामान्य UPI भुगतान पर अभी
Zero MDR लागू है।
कंपनियां क्यों चाहती हैं कि कुछ चार्ज लगाया जाए?
PhonePe, Google Pay, Paytm, बैंक और अन्य पेमेंट सेवा प्रदाताओं का कहना है कि UPI को
चलाने में भारी खर्च आता है।
इन खर्चों में शामिल हैं—
-सर्वर और क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर-साइबर सुरक्षा
-फ्रॉड रोकने की तकनीक
-ग्राहक सहायता
-बैंकिंग नेटवर्क
-नई तकनीक का विकास
जबकि सामान्य UPI ट्रांजैक्शन से उन्हें कोई MDR आय नहीं मिलती।
यही कारण है कि उद्योग लंबे समय से सरकार से कह रहा है कि कम से कम बड़े व्यापारियों या बड़ी
राशि वाले लेन-देन पर कुछ शुल्क लगाने की अनुमति दी जाए।
सरकार किन विकल्पों पर विचार कर रही है?
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार सरकार ऐसे मॉडल पर विचार कर रही है जिसमें—
-छोटे दुकानदारों पर कोई शुल्क न लगे।-आम ग्राहकों के लिए UPI पहले की तरह मुफ्त रहे।
-केवल बड़े व्यापारियों पर MDR लगाया जाए।
-₹2,000 से अधिक के कुछ व्यापारी भुगतान पर 0.3% से 0.5% तक MDR लगाया जा
हालांकि यह केवल प्रस्तावों का हिस्सा है और अभी अंतिम निर्णय नहीं हुआ है।
RBI ने क्या कहा?
RBI के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा है कि अभी किसी भी प्रकार के MDR पर अंतिम निर्णय नहीं
लिया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि UPI जैसी सार्वजनिक डिजिटल भुगतान व्यवस्था को चलाने के
लिए किसी न किसी स्रोत से लागत की भरपाई करनी पड़ती है।
क्या आम लोगों को भुगतान पर चार्ज देना पड़ेगा?
फिलहाल इसका जवाब है—नहीं। किन्तु इसमें भी पेंच है !
अभी सरकार ने ऐसा कोई नियम लागू नहीं किया है जिससे सामान्य UPI उपयोगकर्ताओं से ट्रांजैक्शन
फीस ली जाए।
यदि भविष्य में MDR लागू भी होता है, तो शुरुआती चर्चाओं के अनुसार उसका असर मुख्य रूप से
बड़े व्यापारियों पर हो सकता है। हालांकि व्यापारी यदि चाहें तो भविष्य में अपनी कीमतों में यह लागत
जोड़ सकते हैं, जिससे अप्रत्यक्ष प्रभाव ग्राहकों तक पहुंच सकता है। इस पर अभी कोई अंतिम नीति
नहीं बनी है।
सरकार की मंशा : "लच्छेदार"- बताओ कुछ -करो कुछ और
₹2,000 की UPI लिमिट और ‘आंटी’ का अर्थशास्त्र!
सरकार के अनुसार —आम आदमी से कोई UPI चार्ज नहीं लिया जाएगा,
चार्ज व्यापारी पर लगेगा। क्या सरकार मजाक कर रही है ?
व्यापारी ये टैक्स या चार्ज ग्राहक से लेगा ! फिर आम आदमी पर असर नहीं, कैसे ?
ये कौन सा अर्थशास्त्र है ?
वाह! यानी सरकार को लगता है कि व्यापारी अपनी जेब खोलकर बोलेगा—“आइए सरकार, मेरा
मुनाफा ले जाइए, ग्राहक से एक पैसा नहीं लूंगा!”
शायद वित्त मंत्रालय में किसी ने यह बुनियादी बात बताना भूल गया कि व्यापारी टैक्स या सरचार्ज
अपनी जेब से नहीं भरता। वह उसकी कीमत सामान में जोड़ता है और आखिरकार बिल आम
आदमी ही चुकाता है।
और ₹2,000 की सीमा तय करने वालों से एक मासूम-सा सवाल है—पोटैशियम की कमी से जूझती
हमारी ‘आंटी’ कभी बाजार जाकर देख लेतीं कि ₹2,000 में आज घर का कितना राशन आता
है!
आटा, चावल, दाल, तेल, सब्जी और दूध लेते-लेते ही जेब जवाब दे देती है। बच्चों की फीस, किताबें,
ड्रेस, बस का किराया और ₹3–4 हजार का बिजली बिल तो अभी बाकी है।
फिर ₹2,000 की डिजिटल सीमा किसके लिए है?
ये सरकार किस जमाने की बात कर रही है ?
आम आदमी के लिए या उस जमाने के लिए जब ₹2,000 में महीने का राशन आ जाता था?
और अगर व्यापारी पर MDR/सरचार्ज लगाया गया, तो अगला सवाल और भी सीधा है—
क्या व्यापारी ग्राहक से वह पैसा वापस नहीं वसूलेगा?
अगर वसूलेगा, तो फिर “आम आदमी पर कोई बोझ नहीं” वाला दावा आखिर किसे सुनाया जा रहा है?
सबसे मजेदार बात यह है कि जब आर्थिक फैसले जनता की जेब से जुड़े हों, तब लगता है जैसे बाजार
जाकर कीमतें देखने की जरूरत ही नहीं। शायद फाइल में ₹2,000 देखकर लगता है—“बहुत है,
आम आदमी आराम से चला लेगा!”
कुछ आलोचक तो वित्त मंत्री के फैसलों पर तंज कसते हुए उन्हें ‘मानसिक रोगी’ तक कह देते हैं।
लेकिन असली सवाल व्यक्ति की मानसिक स्थिति का नहीं, नीति बनाने की समझ और उसके
जमीन पर पड़ने वाले असर का है।
और रही बात Visa-Mastercard जैसे विदेशी कार्ड नेटवर्क के दबाव की—तो यह भी सवाल उठना
स्वाभाविक है कि क्या भारत की डिजिटल भुगतान नीति पर किसी विदेशी कारोबारी हित का असर
पड़ रहा है? इसका ठोस प्रमाण सामने आए बिना इसे सच कहना ठीक नहीं होगा, लेकिन
सरकार को इस सवाल का साफ जवाब जरूर देना चाहिए।
क्योंकि UPI को दुनिया के सामने भारत की डिजिटल ताकत बताया गया था।
अब अगर उसी UPI की सीमा और लागत का हिसाब आम आदमी की जेब से होने लगे, तो सवाल तो
उठेगा ही—
डिजिटल इंडिया किसके लिए?
सुविधा जनता की, फायदा किसका और बिल आखिर किसकी जेब से?
क्या यह डिजिटल इंडिया के लिए चुनौती होगी?
भारत की डिजिटल भुगतान व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत यह रही है कि UPI आम लोगों के लिए
लगभग मुफ्त रहा है।
यदि भविष्य में किसी प्रकार का शुल्क लागू होता है, तो सरकार के सामने दो बड़ी चुनौतियां होंगी—
-डिजिटल भुगतान की रफ्तार बनी रहे।-पेमेंट कंपनियों और बैंकों के लिए यह मॉडल आर्थिक रूप से टिकाऊ भी बने।
इसी संतुलन को लेकर सरकार, RBI और डिजिटल पेमेंट उद्योग के बीच चर्चा जारी है।
NewsBell7
फिलहाल UPI भुगतान पहले की तरह मुफ्त है। लेकिन संसद में हुए हालिया कानूनी बदलावों के
बाद भविष्य में चुनिंदा UPI लेन-देन पर Merchant Discount Rate (MDR) लागू करने का रास्ता
खुल सकता है।
हालांकि आम ग्राहकों पर कोई शुल्क लगाने का अभी निर्णय नहीं हुआ है। सरकार का कहना है
कि कोई भी अंतिम फैसला व्यापक विचार-विमर्श के बाद ही लिया जाएगा। इसलिए फिलहाल UPI
उपयोगकर्ताओं को घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन आने वाले महीनों में इस विषय पर होने वाले
सरकारी फैसलों पर नजर रखना जरूरी होगा।

