अंकिता भंडारी हत्या केस: दुष्यंत कुमार गौतम का नाम क्यों आया?

अंकिता भंडारी हत्याकांड: दुष्यंत कुमार गौतम का नाम क्यों उछला? 


VIP विवाद, CBI जांच और राज्यपाल नियुक्ति पर पूरा मामला

NB7 – नई दिल्ली | विशेष रिपोर्ट | 16 अक्टूबर 2026

उत्तराखंड की 19 वर्षीय अंकिता भंडारी की हत्या का मामला करीब चार साल बाद एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति में चर्चा का विषय बन गया है। वजह है भाजपा के वरिष्ठ नेता दुष्यंत कुमार गौतम को सिक्किम का राज्यपाल नियुक्त किया जाना और अंकिता के माता-पिता की यह मांग कि कथित VIP की भूमिका की जांच पूरी होने तक उनकी नियुक्ति रोक दी जाए।

14 अक्टूबर को लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी अंकिता के माता-पिता से मिलने दिल्ली के इंडिया गेट पहुंचे। अगले दिन, 15 अक्टूबर की सुबह, दिल्ली पुलिस ने वहां प्रदर्शन कर रहे अंकिता के माता-पिता और कांग्रेस के कुछ नेताओं को हिरासत में लिया। बाद में उन्हें छोड़ दिया गया।

16 अक्टूबर को अंकिता के पिता वीरेंद्र सिंह भंडारी ने केंद्र सरकार को 24 घंटे का अल्टीमेटम देते हुए दुष्यंत कुमार गौतम की नियुक्ति वापस लेने की मांग की। उन्होंने मांग पूरी नहीं होने पर देशव्यापी आंदोलन की चेतावनी दी। राहुल गांधी ने भी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से नियुक्ति पर पुनर्विचार करने और CBI की जांच पूरी होने तक इसे रोकने की अपील की।

लेकिन इस विवाद के बीच सबसे बड़ा सवाल है—क्या दुष्यंत कुमार गौतम का अंकिता की हत्या में हाथ होने का कोई प्रमाण सामने आया है? कथित VIP कौन था? और हत्या के मुकदमे में सजा होने के बाद भी परिवार न्याय की मांग क्यों कर रहा है?

इन सवालों को समझने के लिए मामले की शुरुआत से लेकर अब तक सामने आए तथ्यों, आरोपों और कानूनी कार्रवाई को अलग-अलग देखना जरूरी है।

1. अंकिता भंडारी कौन थीं और उनकी हत्या कैसे हुई?

अंकिता भंडारी उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल क्षेत्र की रहने वाली 19 वर्षीय युवती थीं। वह ऋषिकेश के पास स्थित वनंतरा रिजॉर्ट में रिसेप्शनिस्ट के रूप में काम करती थीं।

सितंबर 2022 में अंकिता अचानक लापता हो गईं। 24 सितंबर 2022 को उनका शव चिल्ला नहर से बरामद हुआ। इस घटना ने उत्तराखंड सहित पूरे देश में आक्रोश पैदा किया।

पुलिस ने रिजॉर्ट के मालिक पुलकित आर्य और उसके दो कर्मचारियों सौरभ भास्कर तथा अंकित गुप्ता को गिरफ्तार किया। पुलकित आर्य तत्कालीन भाजपा नेता विनोद आर्य का बेटा है।

जांच और मुकदमे के दौरान यह मामला केवल हत्या तक सीमित नहीं रहा। अंकिता पर रिजॉर्ट में आने वाले एक प्रभावशाली VIP अतिथि को विशेष सेवाएं देने का दबाव बनाए जाने के आरोप सामने आए। आरोप था कि अंकिता ने ऐसा करने से इनकार किया था।

यहीं से उस कथित VIP की पहचान और उसकी भूमिका को लेकर सवाल उठने लगे। हालांकि, कथित VIP की पहचान को लेकर लगाए गए आरोपों और अदालत में साबित तथ्यों को अलग-अलग समझना जरूरी है।

2. हत्या के मामले में किसे सजा हुई?

30 मई 2025 को उत्तराखंड के कोटद्वार की अदालत ने पुलकित आर्य, सौरभ भास्कर और अंकित गुप्ता को अंकिता भंडारी की हत्या का दोषी ठहराया। तीनों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।

यह मुकदमे का एक महत्वपूर्ण न्यायिक निष्कर्ष था। अदालत ने इन तीनों की हत्या के मामले में आपराधिक जिम्मेदारी तय की।

लेकिन इस फैसले के बाद भी अंकिता के परिवार और कई लोगों ने कथित VIP की पहचान तथा उसकी संभावित भूमिका की जांच की मांग जारी रखी।

परिवार का सवाल है कि यदि अंकिता पर किसी प्रभावशाली व्यक्ति को विशेष सेवाएं देने का दबाव डाले जाने की बात सामने आई थी, तो उस व्यक्ति की पहचान और मामले में उसकी भूमिका के बारे में पूरी जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं हुई?

यहां एक जरूरी अंतर है। तीन दोषियों को हत्या के मामले में सजा मिलना न्यायिक रूप से स्थापित तथ्य है। किसी चौथे व्यक्ति की भूमिका साबित होना एक अलग प्रश्न है, जिसके लिए अलग साक्ष्य और कानूनी निष्कर्ष जरूरी होंगे।

3. कथित VIP विवाद क्या है?

अंकिता हत्याकांड की शुरुआती रिपोर्टों में एक ऐसे VIP का उल्लेख आया था, जिसे रिजॉर्ट में विशेष सेवाएं देने की बात कही गई थी।

इस संदर्भ में रिजॉर्ट में VIP मेहमानों के लिए विशेष व्यवस्था होने और अंकिता पर दबाव डाले जाने के आरोपों की चर्चा हुई। लेकिन उस समय से ही कथित VIP की पहचान को लेकर स्पष्टता नहीं थी।

मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही बना रहा कि वह व्यक्ति कौन था, क्या उसे अंकिता पर डाले जा रहे दबाव की जानकारी थी और क्या हत्या से पहले या उसके बाद उसकी कोई भूमिका थी?

इन प्रश्नों के उत्तर केवल राजनीतिक बयानों से नहीं मिल सकते। इसके लिए गवाहों के बयान, रिकॉर्डिंग की प्रामाणिकता, डिजिटल साक्ष्य और जांच एजेंसी के निष्कर्ष जरूरी हैं।

कथित VIP की पहचान को लेकर अलग-अलग समय पर कई नामों की चर्चा हुई। लेकिन किसी नाम का सामने आना अपने आप उस व्यक्ति के अपराध में शामिल होने का प्रमाण नहीं है।

4. दुष्यंत कुमार गौतम का नाम कैसे सामने आया?

दुष्यंत कुमार गौतम भाजपा के वरिष्ठ नेता और पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय महामंत्री हैं। अक्टूबर 2026 में उन्हें सिक्किम का राज्यपाल नियुक्त किए जाने के बाद अंकिता हत्याकांड का कथित VIP विवाद फिर चर्चा में आ गया।

दिसंबर 2025 के आसपास सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो और कथित ऑडियो रिकॉर्डिंग के कारण विवाद तेज हुआ। इस मामले में उर्मिला सनावर और पूर्व भाजपा विधायक सुरेश राठौर के नाम भी सामने आए।

उर्मिला सनावर ने दावा किया कि अंकिता मामले में जिस VIP की चर्चा होती रही, उसका संबंध दुष्यंत कुमार गौतम से है। अंकिता के परिवार और कुछ राजनीतिक नेताओं ने भी गौतम का नाम लेकर कथित VIP की भूमिका की जांच की मांग की।

लेकिन गौतम ने इन आरोपों को खारिज किया है। उन्होंने आरोप लगाने वालों और राजनीतिक दलों के खिलाफ मानहानि की कानूनी कार्रवाई भी की।

इसलिए इस विवाद को समझते समय तीन बातें अलग रखना जरूरी है:

आरोप: कुछ लोगों ने दुष्यंत कुमार गौतम को कथित VIP से जोड़ा है।

गौतम का पक्ष: उन्होंने आरोपों को गलत बताया है और कानूनी कार्रवाई की है।

न्यायिक स्थिति: उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी में ऐसा कोई फैसला सामने नहीं आया है, जिसमें अदालत ने गौतम को अंकिता की हत्या में दोषी ठहराया हो

इस रिपोर्ट में उनके नाम को कथित VIP विवाद से जुड़े आरोपों के संदर्भ में ही प्रस्तुत किया जा रहा है, न कि हत्या में उनकी भूमिका साबित होने के दावे के रूप में।

5. CBI जांच क्यों महत्वपूर्ण हो गई है?

कथित VIP की भूमिका को लेकर विवाद दोबारा तेज होने के बाद जांच की मांग भी बढ़ी। जनवरी 2026 में एक अज्ञात VIP के संबंध में FIR दर्ज किए जाने की खबरें सामने आईं। बाद में कथित VIP एंगल की जांच CBI से जुड़े घटनाक्रम के कारण चर्चा में रहा।

अंकिता के माता-पिता की वर्तमान मांग है कि CBI की जांच पूरी हो और कथित VIP की पहचान तथा भूमिका के बारे में स्पष्ट निष्कर्ष सामने आएं।

परिवार का कहना है कि उनकी बेटी की हत्या के मामले में तीन लोगों को सजा मिल चुकी है, लेकिन वे यह भी जानना चाहते हैं कि क्या इस मामले में किसी अन्य प्रभावशाली व्यक्ति की भूमिका थी।

हालांकि, जांच शुरू होने या FIR दर्ज होने का अर्थ यह नहीं है कि किसी खास व्यक्ति के खिलाफ आरोप साबित हो गए हैं। FIR जांच की शुरुआत या उसके औपचारिक विस्तार का हिस्सा हो सकती है; दोष का निर्धारण अदालत में साक्ष्यों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर होता है।

महत्वपूर्ण तथ्य: 16 अक्टूबर 2026 तक उपलब्ध समाचार रिपोर्टों से CBI की जांच के हर पहलू, नवीनतम आधिकारिक निष्कर्ष और किसी अंतिम रिपोर्ट की स्थिति की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। इसलिए यह दावा करना सही नहीं होगा कि कथित VIP की पहचान अंतिम रूप से साबित हो गई है या जांच पूरी हो चुकी है।

6. दुष्यंत कुमार गौतम ने क्या कानूनी कदम उठाए?

गौतम ने अपने नाम को अंकिता हत्याकांड के कथित VIP से जोड़ने वाले आरोपों को चुनौती देते हुए दिल्ली हाईकोर्ट में मानहानि का मुकदमा दायर किया।

जनवरी 2026 में दिल्ली हाईकोर्ट ने उनके मुकदमे पर अंतरिम आदेश देते हुए कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और संबंधित पक्षों को कुछ सोशल मीडिया पोस्ट हटाने तथा गौतम को कथित VIP बताने वाली निर्दिष्ट सामग्री प्रसारित करने से रोकने का निर्देश दिया।

रिपोर्टों के अनुसार, गौतम ने दो करोड़ रुपये के हर्जाने की मांग भी की थी।

इस आदेश को सही संदर्भ में समझना जरूरी है। यह मानहानि के मुकदमे में दिया गया अंतरिम आदेश था। इसे अंकिता हत्याकांड में गौतम की भूमिका पर अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता। इसी तरह, किसी व्यक्ति के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर होने से आरोप लगाने वाले व्यक्ति की हर बात अपने आप झूठी साबित नहीं हो जाती।

अदालत के आदेश का दायरा और बाद की कार्यवाही जानने के लिए नवीनतम न्यायिक रिकॉर्ड देखना आवश्यक है। उपलब्ध सामग्री से मई 2026 के बाद की सभी सुनवाइयों और आदेशों की पूरी स्थिति स्पष्ट नहीं होती।

7. दुष्यंत कुमार गौतम को सिक्किम का राज्यपाल बनाए जाने पर विवाद क्यों?

12 अक्टूबर 2026 को दुष्यंत कुमार गौतम को सिक्किम का राज्यपाल नियुक्त किए जाने की खबर सामने आई। इसके बाद अंकिता के माता-पिता ने राष्ट्रपति से अपील की कि कथित VIP एंगल की जांच पूरी होने तक नियुक्ति पर रोक लगाई जाए।

परिवार का तर्क है कि जब तक उनकी बेटी के मामले में उठे सवालों की जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक गौतम को राज्यपाल नियुक्त नहीं किया जाना चाहिए।

14 अक्टूबर को राहुल गांधी इंडिया गेट पर परिवार के विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए। उन्होंने राष्ट्रपति से नियुक्ति पर पुनर्विचार करने और CBI जांच पूरी होने तक इसे रोकने की मांग की।

15 अक्टूबर की सुबह दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन के दौरान अंकिता के माता-पिता और कांग्रेस नेताओं को हिरासत में लिया। बाद में उन्हें रिहा कर दिया गया।

16 अक्टूबर को अंकिता के पिता ने 24 घंटे के भीतर नियुक्ति वापस लेने की मांग करते हुए देशव्यापी आंदोलन की चेतावनी दी।

यहां भी दो बातें अलग हैं। परिवार और विपक्षी नेताओं की नियुक्ति रोकने की मांग एक राजनीतिक तथा सार्वजनिक मांग है। नियुक्ति की आधिकारिक स्थिति और उसे बदलने का निर्णय संबंधित संवैधानिक प्रक्रिया के तहत ही होगा।

8. क्या राज्यपाल बनने के बाद किसी व्यक्ति को जांच से छूट मिल जाती है?

यह प्रश्न इस विवाद में संवैधानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 156 के अनुसार, राज्यपाल राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद पर रहता है। अनुच्छेद 361 राष्ट्रपति और राज्यपाल को कुछ संवैधानिक संरक्षण प्रदान करता है।

अनुच्छेद 361(2) के तहत राज्यपाल के पद पर रहते हुए उसके विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही शुरू या जारी नहीं रखी जा सकती। अनुच्छेद 361(3) गिरफ्तारी और कारावास की प्रक्रिया से संबंधित संरक्षण देता है।

लेकिन इन प्रावधानों का अर्थ यह नहीं है कि राज्यपाल बनते ही किसी व्यक्ति के खिलाफ लगाए गए आरोप स्थायी रूप से समाप्त हो जाते हैं या सभी प्रकार की जांच पर हमेशा के लिए रोक लग जाती है। जांच, आपराधिक कार्यवाही और पदावधि के दौरान मिलने वाले संवैधानिक संरक्षण अलग-अलग कानूनी प्रश्न हैं।

इसलिए यह कहना कि राज्यपाल नियुक्ति अपने आप किसी व्यक्ति को निर्दोष साबित कर देती है, गलत होगा। उसी तरह, किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोप लगने मात्र से उसकी नियुक्ति अपने आप अवैध नहीं हो जाती।

इस मामले में नियुक्ति पर रोक या उसे वापस लेने की मांग का अंतिम निर्णय संबंधित संवैधानिक और कानूनी प्रक्रियाओं के अनुसार ही होगा।

9. अंकिता के परिवार की मुख्य मांगें क्या हैं?

अंकिता के माता-पिता का कहना है कि वे अपनी बेटी के मामले में पूरी सच्चाई सामने आने तक लड़ाई जारी रखेंगे। उनकी वर्तमान मांगों को इस तरह समझा जा सकता है:

  1. कथित VIP की पहचान और उसकी संभावित भूमिका की निष्पक्ष जांच हो।

  2. CBI जांच की वास्तविक स्थिति और निष्कर्षों के बारे में स्पष्ट जानकारी सामने आए।

  3. जांच पूरी होने तक दुष्यंत कुमार गौतम की राज्यपाल नियुक्ति पर रोक लगाने की उनकी मांग पर विचार किया जाए।

  4. यदि जांच में किसी अन्य व्यक्ति के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं, तो कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए।

  5. परिवार को यह बताया जाए कि मामले में कौन-से प्रश्न जांच के दायरे में हैं और किन प्रश्नों पर जांच एजेंसी का निष्कर्ष सामने आ चुका है।

परिवार की इन मांगों का महत्व इस बात में है कि वे मामले के शेष प्रश्नों का जवाब चाहते हैं। लेकिन किसी भी व्यक्ति की आपराधिक जिम्मेदारी तय करने के लिए प्रमाण और कानूनी प्रक्रिया जरूरी हैं।

10. अब आगे क्या हो सकता है?

इस मामले की आगे की दिशा कुछ प्रमुख घटनाक्रमों पर निर्भर करेगी।

पहला—CBI की जांच: यदि जांच एजेंसी के पास कथित VIP की पहचान या भूमिका से जुड़े नए साक्ष्य हैं, तो उनके आधार पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है। जांच की वास्तविक स्थिति जानने के लिए आधिकारिक बयान और संबंधित रिकॉर्ड जरूरी होंगे।

दूसरा—अदालत की कार्यवाही: गौतम के मानहानि मुकदमे में आगे क्या आदेश आते हैं, यह देखना महत्वपूर्ण होगा। साथ ही, अंकिता हत्याकांड में दोषी ठहराए गए लोगों से संबंधित अपील या अन्य न्यायिक कार्यवाही की स्थिति भी अलग से जांची जानी चाहिए।

तीसरा—राज्यपाल नियुक्ति: अंकिता के परिवार ने नियुक्ति पर रोक लगाने और उसे वापस लेने की मांग की है। राष्ट्रपति या संबंधित संवैधानिक प्राधिकारी की ओर से कोई आधिकारिक निर्णय आता है या नहीं, यह इस विवाद का अगला महत्वपूर्ण घटनाक्रम होगा।

चौथा—परिवार का आंदोलन: 24 घंटे के अल्टीमेटम के बाद परिवार ने देशव्यापी आंदोलन की चेतावनी दी है। मांग पूरी नहीं होने पर आंदोलन किस रूप में आगे बढ़ेगा, यह परिवार के अगले सार्वजनिक बयान से स्पष्ट होगा।

इनमें से किसी भी घटनाक्रम को पहले से तय मानकर नहीं लिखा जाना चाहिए। पाठकों को केवल पुष्टि किए गए फैसलों, आदेशों और बयानों के आधार पर जानकारी दी जानी चाहिए।

निष्कर्ष: सवालों के जवाब जांच से मिलेंगे, आरोपों से नहीं

अंकिता भंडारी हत्याकांड में तीन लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई जा चुकी है। इसके बावजूद कथित VIP की पहचान और उसकी भूमिका को लेकर परिवार के सवाल बने हुए हैं।

दुष्यंत कुमार गौतम का नाम इस विवाद में आरोपों के कारण सामने आया है। उन्होंने इन आरोपों को खारिज किया है और मानहानि की कानूनी कार्रवाई भी की है। उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी में उन्हें अंकिता की हत्या के लिए दोषी ठहराने वाला कोई न्यायिक फैसला सामने नहीं आया है।

इसलिए न तो उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों को बिना प्रमाण अंतिम सच माना जा सकता है और न ही परिवार की जांच की मांग को बिना जांच निराधार घोषित किया जा सकता है।

अंकिता के परिवार को यह जानने का अधिकार है कि उनकी बेटी के मामले में जांच कहां तक पहुंची और कथित VIP से संबंधित सवालों पर क्या निष्कर्ष निकले। दूसरी ओर, किसी व्यक्ति की आपराधिक जिम्मेदारी का फैसला कानून और साक्ष्यों के आधार पर ही होना चाहिए।

इस मामले का असली सवाल केवल यह नहीं है कि दुष्यंत कुमार गौतम को राज्यपाल बनाया जाना चाहिए या नहीं। असली सवाल यह भी है कि अंकिता भंडारी की हत्या से जुड़े सभी प्रासंगिक सवालों की जांच कितनी पूरी हुई है और जांच एजेंसी किन निष्कर्षों तक पहुंची है। इसका स्पष्ट उत्तर आधिकारिक रिकॉर्ड और न्यायिक प्रक्रिया से ही सामने आ सकता है।


संपादकीय टिप्पणी: NewsBell7 की तथ्य-जांच

यह रिपोर्ट 16 अक्टूबर 2026 तक उपलब्ध समाचार रिपोर्टों और सार्वजनिक जानकारी के आधार पर तैयार की गई है। 

CBI जांच: जांच शुरू करने का आदेश, जांच का वर्तमान दायरा, नवीनतम आधिकारिक बयान और क्या कोई अंतिम रिपोर्ट या नया आरोपपत्र दाखिल हुआ है।

हत्या का मुकदमा: 30 मई 2025 के फैसले के बाद दोषियों की अपील तथा संबंधित न्यायिक कार्यवाही की वर्तमान स्थिति।

मानहानि का मुकदमा:
दिल्ली हाईकोर्ट के जनवरी 2026 के अंतरिम आदेश और उसके बाद की सुनवाइयों में पारित आदेश।

राज्यपाल नियुक्ति:
राष्ट्रपति सचिवालय की आधिकारिक अधिसूचना, नियुक्ति की वर्तमान स्थिति और पदभार ग्रहण करने से संबंधित जानकारी।

परिवार की मांग: 14–16 अक्टूबर 2026 के प्रदर्शन, पुलिस कार्रवाई, राष्ट्रपति से अपील और 24 घंटे के अल्टीमेटम की प्रत्यक्ष पुष्टि।

NewsBell7 में प्रकाशित इस समाचार का उद्देश्य किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना या किसी को दोषी अथवा निर्दोष घोषित करना नहीं है। यह समाचार संबंधित मामले में सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी, समाचार रिपोर्टों, संबंधित पक्षों के बयानों, परिवार की मांगों, राजनीतिक प्रतिक्रियाओं तथा उपलब्ध न्यायिक कार्यवाही पर आधारित है।

इस खबर में किसी को दोषी या निर्दोष नहीं बताया गया है। यह फैसला सबूतों और कानून के आधार पर अदालत करती है। आगे चलकर यदि किसी संबंधित पक्ष का नया बयान, कोई नई जानकारी या अदालत का नया आदेश सामने आता है, तो खबर में जरूरत के अनुसार बदलाव या नई जानकारी जोड़ी जा सकती है।