नाना पाटेकर नहीं रहे: 35 रुपये की नौकरी से अभिनेता बनने तक का सफर

नाना पाटेकर का 75 साल की उम्र में निधन: 

35 रुपये की नौकरी, थिएटर और फिर बॉलीवुड में बना अलग मुकाम


NB7 विशेष रिपोर्ट | मुंबई/गोवा

भारतीय सिनेमा के उन कलाकारों में शामिल नाना पाटेकर अब हमारे बीच नहीं रहे। 75 वर्ष की उम्र में 8 अक्टूबर 2026 की सुबह गोवा में उनका निधन हो गया। रिपोर्टों के अनुसार उन्हें उनके गोवा स्थित घर में बेहोशी की हालत में पाया गया। इसके बाद उन्हें मणिपाल अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने करीब 45 मिनट तक CPR देकर उन्हें बचाने की कोशिश की, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका। सुबह करीब 5:20 बजे उन्हें मृत घोषित किया गया। अस्पताल की ओर से मृत्यु का कारण cardiac arrest बताया गया है।

नाना पाटेकर का जाना सिर्फ बॉलीवुड के एक अभिनेता का चले जाना नहीं है। वे उन कलाकारों में थे जिन्होंने पर्दे पर अभिनेता की एक अलग पहचान बनाई—जहां संवाद सिर्फ बोले नहीं जाते थे, बल्कि चेहरे, आवाज और आंखों से भी कहानी कही जाती थी।

उनकी खासियत यह थी कि वे किसी पारंपरिक 'हीरो' की छवि पर निर्भर नहीं रहे। कभी पुलिस अधिकारी, कभी सैनिक, कभी गुस्सैल आम आदमी, कभी खलनायक और कभी हास्य भूमिका—उन्होंने लगभग हर तरह के किरदार को अपनी शैली में यादगार बनाया।

35 रुपये महीने की नौकरी से शुरू हुआ संघर्ष

आज करोड़ों दर्शकों के बीच पहचान बनाने वाले नाना पाटेकर का शुरुआती जीवन आसान नहीं था।

परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होने के बाद उन्होंने किशोरावस्था में ही काम करना शुरू कर दिया था। करीब 13 साल की उम्र में वे मुंबई में फिल्म पोस्टर पेंट करने का काम करते थे। इसके लिए उन्हें लगभग 35 रुपये महीने मिलते थे। एक रिपोर्ट के अनुसार काम पर जाने के लिए उन्हें रोज लगभग 8 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था और इस काम से उन्हें दिन में एक समय का भोजन भी मिलता था।

यही वह दौर था जिसने नाना पाटेकर को जिंदगी को बहुत करीब से देखने का मौका दिया।

बाद में यही अनुभव उनके अभिनय में भी दिखाई दिया। उनके किरदार अक्सर बहुत चमकदार दुनिया के आदमी नहीं होते थे। उनमें संघर्ष, गुस्सा, दर्द, असुरक्षा और आम जिंदगी की सच्चाई दिखाई देती थी।

पढ़ाई कहां से की?

नाना पाटेकर का जन्म 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के मुरुड-जंजीरा क्षेत्र में हुआ था। उन्होंने मुंबई के Samarth Vidyalaya से पढ़ाई की और इसके बाद कला की पढ़ाई की।

उन्होंने Sir J.J. School of Art और Sir J.J. Institute of Applied Art में अध्ययन किया तथा Applied Art में डिप्लोमा किया। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कुछ समय commercial artist के रूप में भी काम किया।

यानी अभिनय में आने से पहले उनकी दुनिया में कला, पोस्टर, डिजाइन और चित्रकारी भी शामिल थी।

लेकिन उनकी असली अभिनय पाठशाला बनी—रंगमंच।

स्कूल के दिनों से थिएटर से जुड़ाव

नाना पाटेकर को बचपन से ही नाटक और अभिनय में रुचि थी। उनके पिता भी उन्हें नाटक और तमाशा देखने के लिए ले जाते थे। धीरे-धीरे वे मराठी रंगमंच से जुड़ते गए।

रंगमंच ने उन्हें वह अभिनय सिखाया जो बाद में उनकी सबसे बड़ी पहचान बना—आवाज पर नियंत्रण, संवाद बोलने का अलग अंदाज, चेहरे के भाव, शरीर की भाषा और बिना किसी कट के दर्शकों को बांधे रखना।

वे मराठी थिएटर के महत्वपूर्ण कलाकारों और निर्देशकों के साथ काम करने लगे। रंगमंच पर काम करते हुए उन्हें अभिनय की मजबूत नींव मिली।

नाना पाटेकर के लिए थिएटर सिर्फ फिल्मों में जाने का रास्ता नहीं था। वह खुद एक पूरी दुनिया थी।

फिल्मों में कैसे आए?

रंगमंच से फिल्मों तक पहुंचने की कहानी भी दिलचस्प है।

नाना पाटेकर ने 1978 की फिल्म 'गमन' से बड़े पर्दे पर शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने मराठी और हिंदी फिल्मों में काम करना जारी रखा।

उनके फिल्मी सफर में एक महत्वपूर्ण नाम अभिनेत्री स्मिता पाटिल का भी रहा। थिएटर के दौर में दोनों एक-दूसरे को जानते थे। स्मिता पाटिल ने उन्हें फिल्मों की तरफ बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। Filmfare के अनुसार उन्होंने नाना को फिल्मी दुनिया में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया और शुरुआती दौर में उनका फिल्मी सफर मजबूत हुआ।

यहीं से थिएटर का यह कलाकार धीरे-धीरे बड़े पर्दे पर अपनी अलग पहचान बनाने लगा।

'परिंदा' ने बदल दी पहचान



नाना पाटेकर के करियर में 'परिंदा' (1989) बेहद महत्वपूर्ण फिल्म साबित हुई।

इस फिल्म में उनके अभिनय को व्यापक सराहना मिली और उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार तथा फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। इसके बाद वे सिर्फ एक अच्छे अभिनेता नहीं रहे, बल्कि गंभीर और दमदार अभिनय के लिए पहचाने जाने लगे।

उनकी संवाद अदायगी और चेहरे के भाव ने उन्हें दूसरे कलाकारों से अलग कर दिया।

'क्रांतिवीर' में मिला राष्ट्रीय पुरस्कार

1994 की फिल्म 'क्रांतिवीर' नाना पाटेकर के करियर की सबसे यादगार फिल्मों में रही।

इस फिल्म में उनके अभिनय के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का सम्मान मिला। उनके अभिनय में गुस्सा, दर्द, व्यवस्था से नाराजगी और आम आदमी की बेचैनी एक साथ दिखाई दी।

इसके बाद नाना पाटेकर की पहचान एक ऐसे अभिनेता की बन गई जिसे किसी भी कठिन और भावनात्मक भूमिका में रखा जा सकता था।

कभी विलेन, कभी पुलिस अफसर, कभी आम आदमी

नाना पाटेकर की खासियत यह थी कि उन्होंने अपने करियर को एक ही तरह की भूमिका में सीमित नहीं किया।

'अंगार', 'तिरंगा', 'अग्निसाक्षी', 'अब तक छप्पन', 'अपहरण', 'राजनीति', 'भूत', 'वेलकम' और 'नटसम्राट' जैसी फिल्मों में उनके अलग-अलग रंग देखने को मिले।

एक तरफ वे गंभीर और हिंसक किरदारों में बेहद प्रभावशाली दिखाई दिए तो दूसरी तरफ 'वेलकम' जैसी फिल्म में हास्य भूमिका से भी दर्शकों को खूब हंसाया।

यही विविधता उन्हें लंबे समय तक प्रासंगिक बनाए रखने वाली बड़ी वजहों में से एक थी।

नाना पाटेकर की अभिनय शैली क्यों अलग थी?

नाना पाटेकर का अभिनय अक्सर बहुत 'फिल्मी' नहीं लगता था।

उनकी आवाज में एक खास तरह की खुरदुराहट थी। वे संवाद को सिर्फ शब्दों की तरह नहीं बोलते थे। कई बार एक छोटा-सा विराम, चेहरे का भाव या आंखों की दिशा ही पूरा संवाद बन जाती थी।

थिएटर से मिली ट्रेनिंग ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई।

इसीलिए उनके कई संवाद और दृश्य आज भी दर्शकों को याद हैं।

वे उन कलाकारों में थे जिन्हें देखकर दर्शक कई बार किरदार और अभिनेता के बीच फर्क भूल जाता था।

अभिनेता के अलावा निर्देशक और लेखक भी थे

नाना पाटेकर सिर्फ अभिनेता नहीं थे।

उन्होंने निर्देशन और लेखन में भी काम किया। उनकी निर्देशित फिल्म 'प्रहार: द फाइनल अटैक' (1991) उनके फिल्मी करियर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रही।

यानी उनका सिनेमा से संबंध सिर्फ कैमरे के सामने खड़े होने तक सीमित नहीं था।

राष्ट्रीय पुरस्कार और पद्मश्री

नाना पाटेकर को अपने अभिनय के लिए कई बड़े पुरस्कार मिले।

उन्हें तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, कई फिल्मफेयर पुरस्कार और महाराष्ट्र से जुड़े पुरस्कार मिले। 2013 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया।

मराठी सिनेमा में भी उनका योगदान महत्वपूर्ण रहा। 'नटसम्राट' जैसी फिल्म में उनके अभिनय को विशेष रूप से सराहा गया।

निजी जीवन में भी रहे सादगी के लिए चर्चित

नाना पाटेकर की सार्वजनिक छवि दूसरे कई बॉलीवुड सितारों से अलग रही।

वे अक्सर ग्लैमर और स्टारडम से दूरी बनाए रखने वाले कलाकार के रूप में देखे गए। उनका शुरुआती संघर्ष और गरीबी का अनुभव उनके व्यक्तित्व पर भी गहरा असर छोड़ता रहा।

उनकी पत्नी नीलकांति पाटेकर और बेटे मल्हार पाटेकर परिवार का हिस्सा हैं। नीलकांति स्वयं भी रंगमंच और अभिनय से जुड़ी रही हैं।

आखिरी दौर तक सक्रिय रहे

नाना पाटेकर उम्र बढ़ने के बावजूद पूरी तरह पर्दे से दूर नहीं हुए थे। उनके अभिनय और व्यक्तित्व को लेकर दर्शकों की दिलचस्पी बनी रही।

निधन से कुछ समय पहले भी वे सोशल मीडिया पर चर्चा में आए थे। उनके व्यायाम करते हुए वीडियो ने लोगों का ध्यान खींचा था।

यह उनके व्यक्तित्व का एक और पक्ष था—75 की उम्र में भी सक्रिय रहने की कोशिश।

एक अभिनेता गया, लेकिन किरदार रह गए

नाना पाटेकर की मृत्यु के साथ हिंदी और मराठी सिनेमा ने एक ऐसे अभिनेता को खो दिया जिसकी जगह आसानी से नहीं भरी जा सकती।

उन्होंने फिल्मों में सिर्फ किरदार नहीं निभाए। उन्होंने ऐसे पात्र बनाए जिन्हें दर्शक लंबे समय तक याद रखते हैं।

'परिंदा' का तीखा अभिनय, 'क्रांतिवीर' का गुस्सा, 'अब तक छप्पन' का पुलिस अधिकारी, 'नटसम्राट' का दर्द और 'वेलकम' की कॉमेडी—इन सभी के पीछे एक ही चेहरा था।

नाना पाटेकर।

एक ऐसा कलाकार जिसकी शुरुआत 35 रुपये महीने की नौकरी और संघर्ष से हुई और जिसने आगे चलकर भारतीय सिनेमा के सबसे पहचानने योग्य चेहरों में अपनी जगह बनाई।

आज पर्दा गिर गया है।

लेकिन उनके निभाए किरदार और उनकी आवाज लंबे समय तक दर्शकों के बीच सुनाई देती रहेगी।