नई दिल्ली | 19 फरवरी 2026 | विशेष रिपोर्ट – Newsbell7.in
भारत एक तरफ चंद्रयान से चांद नाप रहा है, दूसरी तरफ AI समिट में एक रोबोट डॉग ने हमें ज़मीन
पर ला खड़ा किया। मंच था प्रतिष्ठित India AI Impact Summit 2026। स्टॉल था Galgotias
University का। कैमरे के सामने थीं प्रोफेसर Neha Singh। और केंद्र में था ‘Orion’ नाम से प्रस्तुत
एक रोबोट डॉग—जिसे टेक समुदाय ने चीनी कंपनी Unitree Robotics के मॉडल Unitree Go2 से
मिलता-जुलता बताया।
नई दिल्ली में इंडिया AI इंपैक्ट समिट 2026 का माहौल। चारों तरफ AI के जादूगर, रोबोट्स, ड्रोन,
और भविष्य की बातें। गलगोटियास यूनिवर्सिटी का स्टॉल चमक रहा है। वहां प्रोफेसर नेहा सिंह, जो
कम्युनिकेशंस की प्रोफेसर हैं, DD न्यूज को इंटरव्यू दे रही हैं। "आपको ओरियन से मिलना चाहिए।
यह गलगोटियास यूनिवर्सिटी के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस द्वारा डेवलप किया गया है," उन्होंने कहा।
ओरियन – एक चार पैरों वाला रोबोट डॉग, जो चलता-फिरता, देखता-सुनता। नेहा सिंह ने आगे कहा,
"हम पहली प्राइवेट यूनिवर्सिटी हैं जो AI में 350 करोड़ रुपये से ज्यादा इनवेस्ट कर रही है। हमारे पास डेडिकेटेड डेटा साइंस और AI ब्लॉक है।"
वाह! सुनकर तो लगता है भारत का MIT आ गया। लेकिन रुकिए, व्यंग्य यहां से शुरू होता है। जैसे
ही वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, यूजर्स ने कहा – "ये तो चीनी Unitree Go2 है!"
हां, सही पकड़े। Unitree Robotics की चाइनीज प्रोडक्ट, जिसकी कीमत महज 2,800 डॉलर
(करीब 1.3 लाख से 2.3 लाख रुपये) है। दुनिया भर में रिसर्च और एजुकेशन में इस्तेमाल होता है,
लेकिन यहां इसे 'डेवलप्ड बाय यूनिवर्सिटी' बता दिया। नेहा सिंह रोबोट डॉग कंट्रोवर्सी ने तुरंत आग
पकड़ ली। समिट ऑर्गनाइजर्स ने गलगोटियास को स्टॉल हटाने का ऑर्डर दे दिया।
समिट का ‘ड्रामेटिक मोमेंट’: चीनी डॉग चला, हंसी का पात्र बना AI समिट
नई दिल्ली में AI समिट—जहां भविष्य की तकनीकें शोकेस हो रही थीं। उसी बीच रोबोट डॉग ‘Orion’
पर कैमरा गया।
गलगोटिया यूनिवर्सिटी की नेहा सिंह ने इंटरव्यू में कहा गया—यह सेंटर ऑफ एक्सीलेंस का
विकसित प्लेटफॉर्म है; AI विभाग पर 350 करोड़ से अधिक निवेश किया जा रहा है।
बस, यहीं से सोशल मीडिया की प्रयोगशाला के कान खड़े हो गए और सक्रिय हो गई। तुलना हुई,
बस, यहीं से सोशल मीडिया की प्रयोगशाला के कान खड़े हो गए और सक्रिय हो गई। तुलना हुई,
तस्वीरें ऑनलाइन मिलीं—और पाया गया कि यह मॉडल ऑनलाइन बाजार में उपलब्ध है वह भी मात्र $ 2800 में।
आयोजकों ने स्पष्टीकरण मांगा; विश्वविद्यालय ने कहा—बताने में गलती हुई -संचार में भ्रम
हुआ,350 करोड़ का निवेश संस्थान-स्तरीय है, किसी डिवाइस के डिज़ाइन पर काम नहीं हुआ केवल
सीखने के लिए है।
व्यंग्य यही है: AI का मंच था, पर सबसे ज्यादा ‘इंटेलिजेंस’ सोशल मीडिया ने दिखा दी।
350 करोड़: रोबोट नहीं, संस्थान का इकोसिस्टम
350 करोड़ रुपये किसी एक रोबोट डॉग पर खर्च का दावा नहीं था।
संस्थान की ओर से कहा गया कि निवेश का दायरा व्यापक है:
सबसे पहले स्पष्टता—
350 करोड़ रुपये किसी एक रोबोट डॉग पर खर्च का दावा नहीं था।
संस्थान की ओर से कहा गया कि निवेश का दायरा व्यापक है:
-
AI/डेटा साइंस ब्लॉक
-
हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग
-
रिसर्च लैब्स
-
इंडस्ट्री MoU
-
स्किल/अपस्किल कार्यक्रम
स्वाभाविक रूप से उसे मंच पर दिख रही चीज से जोड़ लेते हैं। यदि यह कनेक्शन स्पष्ट नहीं किया
गया, तो भ्रम पैदा होना तय है।
अगर खुद नहीं बनाया, तो दिखाया क्यों?
यही केंद्रीय सवाल है। संभावित उत्तर तीन हैं:1) डेमो प्लेटफॉर्म मॉडल
विश्वभर के विश्वविद्यालय व्यावसायिक रोबोट प्लेटफॉर्म खरीदकर उन पर AI एल्गोरिद्म, कंप्यूटरविज़न, नेविगेशन, SLAM आदि विकसित करते हैं। हार्डवेयर OEM का, सॉफ्टवेयर/इंटीग्रेशन
संस्थान का।
शर्त: मंच पर यह स्पष्ट बताया जाए।
2) इकोसिस्टम का प्रतीक
कभी-कभी डिवाइस “कौशल और सुविधा” का प्रतीक बनकर दिखाया जाता है—कि हमारे पास ऐसेप्लेटफॉर्म पर काम करने की क्षमता है।
AI कोर्स प्रतिस्पर्धी हैं। समिट में हाई-इम्पैक्ट डेमो ब्रांडिंग मजबूत करते हैं। पर ब्रांडिंग और तकनीकी सटीकता का संतुलन बिगड़ा, तो भरोसा डगमगाता है।
यदि रोबोट में संस्थान का विशिष्ट, मापनीय अपडेट/मॉड्यूल था—तो उसका तकनीकी ब्योरा, TRL
3) मार्केटिंग बनाम तकनीकी सटीकता
AI कोर्स प्रतिस्पर्धी हैं। समिट में हाई-इम्पैक्ट डेमो ब्रांडिंग मजबूत करते हैं। पर ब्रांडिंग और तकनीकी सटीकता का संतुलन बिगड़ा, तो भरोसा डगमगाता है।
यदि रोबोट में संस्थान का विशिष्ट, मापनीय अपडेट/मॉड्यूल था—तो उसका तकनीकी ब्योरा, TRL
(Technology Readiness Level) और योगदान स्पष्ट होना चाहिए था।
यदि नहीं था—तो “डेवलप्ड बाय” जैसी भाषा जोखिम भरी है।
ड्रोन विवाद: प्रोटोटाइप या प्रोडक्ट?
रोबोट डॉग के साथ ड्रोन मॉडल पर भी सवाल उठे। चर्चा हुई कि एक ड्रोन सॉकर एरिना भी विदेशी
था और दूसरा 10th क्लास स्टूडेंट-लेवल प्रोटोटाइप जैसा दिखा जो थर्माकोल से बनाया हुवा था ।
यहां फिर वही बात—
-यदि स्टूडेंट प्रोजेक्ट है, तो गर्व से कहें: “यह हमारा प्रोटोटाइप है, TRL 3/4।”
-यदि रेडी-टू-डिप्लॉयमेंट नहीं, तो वैसा दावा न करें।
व्यंग्य की एक पंक्ति काफी है:
“स्कूल साइंस फेयर की ज्वालामुखी मॉडल को NASA मिशन मत बताइए—वरना लावा सोशल
मीडिया से निकलेगा।”
सोशल मीडिया: मीम से मेटाडेटा तक
इस प्रकरण में सोशल मीडिया ने तुलना, कीमत और मॉडल पहचान कर दी। अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने भी इसे कवर किया।नतीजा—एक प्रस्तुति राष्ट्रीय बहस बन गई।
यह डिजिटल युग का सबक है:यहाँ झूठ एक मिनट में पकड़ा जाता है
यह डिजिटल युग का सबक है:यहाँ झूठ एक मिनट में पकड़ा जाता है
आज हर दावा 30 सेकंड में फैक्ट-चेक होता है।
क्या यह व्यक्तिगत गलती थी?
संस्थान ने कहा—बयान अधिकृत नहीं था; संचार में भ्रम हुआ। लेकिन बड़े मंचों पर:
-
टेक-शीट,
-
डिस्क्लेमर,
-
स्वीकृत वक्तव्य,
-
मीडिया ब्रीफ
मानक प्रक्रिया मानी जाती है। इसलिए यह केवल व्यक्ति का नहीं, संस्थागत संचार-प्रबंधन का प्रश्न भी है।
देशहित का आयाम: AI में भरोसा सबसे बड़ी पूंजी
भारत AI मिशन पर बड़े निवेश की दिशा में आगे बढ़ रहा है। स्टार्टअप, रक्षा, स्वास्थ्य, कृषि—हर क्षेत्र में AI की भूमिका बढ़ रही है।ऐसे में:
-
स्रोत-पारदर्शिता (provenance)
-
IP क्लैरिटी
-
हार्डवेयर-सॉफ्टवेयर श्रेय का स्पष्ट विभाजन अनिवार्य हैं।
हमारा है, उसे सटीक और ईमानदारी से बताया जाए।
सुधार का रास्ता: विवाद से अवसर तक
-
350 करोड़ निवेश का कारण वास्तविक अनुसन्धान और विकास या बस और अधिक स्टूडेंट्स को आकर्षित करने का झूठा दवा
-
प्रोजेक्ट-वार आउटपुट, पेटेंट/पब्लिकेशन सूची
-
TRL-आधारित प्रस्तुति मानक
-
समिट के लिए टेक्निकल वैलिडेशन प्रोटोकॉल
-
प्लेसमेंट/रिसर्च डेटा की पारदर्शिता
यदि यह कदम उठते हैं, तो विवाद एक सकारात्मक मोड़ बन सकता है।
व्यंग्यात्मक परंतु सच्चा निष्कर्ष
रोबोट डॉग चार पैरों पर चलता है—पर शिक्षा व्यवस्था का भरोसा चार स्तंभों पर टिका है:
सत्य, पारदर्शिता, तकनीकी सटीकता और नैतिकता।
350 करोड़ का निवेश यदि सचमुच संस्थान के AI इकोसिस्टम में है, तो देश को उसका स्वागत करना
350 करोड़ का निवेश यदि सचमुच संस्थान के AI इकोसिस्टम में है, तो देश को उसका स्वागत करना
चाहिए।
पर मंच पर हर शब्द मापकर बोलना होगा—क्योंकि AI के युग में “Artificial Intelligence” से
पहले “Authentic Information” जरूरी है।
चीन AI और रोबोट्स पर चुपचाप काम कर रहा है और काफी आगे भी निकल गया है जबकि भारत के टेक्नोलॉजी संस्थान सिर्फ झूठी खबरें फैला रहे हैं और पहले से मौजूद रोबोट्स को सिर्फ अभी तक समझ ही रहे हैं।
भारत को रोबोट्स चाहिए—
पर उससे भी ज्यादा चाहिए विश्वसनीय संस्थान।
और यही इस पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा सबक है।
.webp)