सरकार के विरोध पर केस दर्ज ? क्या नागरिकों को
गुलाम बनाया जा रहा है?" - बॉम्बे हाई कोर्ट
NB7 | मुंबई | 3 जुलाई 2026
लोकतंत्र में सरकार के फैसलों का विरोध करना कोई अपराध नहीं है। इसी सिद्धांत को दोहराते हुए
बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा कि केवल सरकार की नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन या नारे
लगाने के आधार पर किसी नागरिक के खिलाफ कठोर कार्रवाई नहीं की जा सकती।
जस्टिस माधव जे. जमदार की एकल पीठ ने मुंबई पुलिस द्वारा एक राजनीतिक कार्यकर्ता के खिलाफ
जारी एक साल के तड़ीपार (Externment) आदेश को रद्द करते हुए कहा कि शांतिपूर्ण विरोध करना
हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है
"क्या नागरिकों को सरकार का गुलाम बनाया जा रहा है?"
सुनवाई के दौरान अदालत ने मुंबई पुलिस से तीखे सवाल पूछे।
जस्टिस जमदार ने कहा,
"यह क्या हो रहा है? क्या सरकार के खिलाफ आवाज उठाने पर केस दर्ज कर सभी नागरिकों कोअदालत ने यह भी पूछा कि यदि कोई व्यक्ति सरकार के खिलाफ नारे लगाता है तो केवल इसी आधार
पर उसे शहर से बाहर करने जैसा कठोर आदेश कैसे दिया जा सकता है।
मामला क्या था?
यह मामला सईद अहमद अब्दुल वहीद चौधरी का था, जो सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया
(SDPI) के महासचिव बताए गए हैं।
मुंबई पुलिस ने दिसंबर 2025 में उन्हें एक वर्ष के लिए मुंबई से तड़ीपार कर दिया था। पुलिस ने 2019
से 2024 के बीच दर्ज कई एफआईआर का हवाला दिया था, जो नागरिकता संशोधन कानून (CAA),
NRC, ज्ञानवापी मस्जिद सहित विभिन्न मुद्दों पर आयोजित प्रदर्शनों और धरनों से जुड़ी थीं।
"पुलिस जनता की सेवक है, किसी सरकार की नहीं"
सुनवाई के दौरान अदालत ने पुलिस को भी याद दिलाया कि उसका दायित्व संविधान और जनता के
प्रति है।
जस्टिस जमदार ने कहा कि पुलिस किसी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की नहीं, बल्कि जनता की सेवक है।
लोकतंत्र में पुलिस की जिम्मेदारी कानून लागू करना है, न कि असहमति की आवाज को दबाना।
हाई कोर्ट ने क्यों रद्द किया तड़ीपार आदेश?
अपने लिखित आदेश में हाई कोर्ट ने कहा कि केवल सरकार के कुछ फैसलों का विरोध करने, धरना
देने या मोर्चा निकालने के आधार पर किसी व्यक्ति को महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम के तहत तड़ीपार
नहीं किया जा सकता।
अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो कि याचिकाकर्ता
की गतिविधियों से किसी व्यक्ति या संपत्ति को खतरा था।
कोर्ट ने माना कि पुलिस की कार्रवाई दुर्भावनापूर्ण (Mala Fide) थी और इससे संविधान के
अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) तथा अनुच्छेद 21 (गरिमा के साथ जीवन का अधिकार) का
उल्लंघन हुआ।
लोकतंत्र के लिए क्यों अहम है यह फैसला?
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला एक बार फिर स्पष्ट करता है कि लोकतंत्र में सरकार की
आलोचना करना या शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करना नागरिकों का मौलिक अधिकार है।
यदि कोई व्यक्ति केवल सरकारी नीतियों का विरोध करता है, तो उसके खिलाफ असाधारण पुलिस
कार्रवाई करना संविधान की भावना के विपरीत माना जाएगा।
यह फैसला आने वाले समय में विरोध-प्रदर्शनों, धरनों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में
एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल बन सकता है।
आखिर जस्टिस जमदार ने इतनी तीखी टिप्पणी क्यों की?
सुनवाई के दौरान जस्टिस माधव जे. जमदार की टिप्पणियां केवल एक कानूनी बहस तक सीमित नहीं
थीं, बल्कि उनमें आम नागरिकों से जुड़े मुद्दों को लेकर गहरी चिंता भी दिखाई दी।
अदालत ने हाल ही में एक सड़क हादसे में एक मासूम बच्चे की मौत का जिक्र करते हुए सवाल उठाया
कि जब लोगों की जान, सड़क सुरक्षा और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए, तब
राज्य की राजनीति का बड़ा हिस्सा दल-बदल, विधायकों की खरीद-फरोख्त (जिसे आम बोलचाल में
"हॉर्स ट्रेडिंग" कहा जाता है) और सत्ता के समीकरणों में उलझा दिखाई देता है। अदालत ने इस
प्राथमिकता पर चिंता जताई।
इसी संदर्भ में जस्टिस जमदार ने यह भी पूछा कि यदि कोई नागरिक सरकार की नीतियों के खिलाफ
शांतिपूर्ण विरोध करता है, तो क्या उसके खिलाफ मुकदमे दर्ज कर दिए जाएंगे?
उन्होंने टिप्पणी की कि लोकतंत्र में सरकार का विरोध करना अपराध नहीं, बल्कि संविधान से मिला
अधिकार है।
मुंबई हाईकोर्ट ने पुलिस की कार्रवाई पर भी सवाल उठाए और कहा कि पुलिस किसी सरकार,
मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की नहीं, बल्कि संविधान और जनता की सेवक है। यदि विरोध प्रदर्शन केवल
सरकार की आलोचना तक सीमित है और उससे सार्वजनिक शांति या सुरक्षा को कोई वास्तविक
खतरा नहीं है, तो केवल असहमति की आवाज उठाने के कारण किसी नागरिक को तड़ीपार करना
कानून और संविधान की भावना के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
इस पूरे फैसले का संदेश केवल एक व्यक्ति को राहत देना नहीं है, बल्कि यह याद दिलाना भी है कि
लोकतंत्र की असली ताकत सत्ता की आलोचना करने के अधिकार और जनता की समस्याओं को
राजनीतिक हितों से ऊपर रखने में है।
NB7 Fact Check:
-यह फैसला बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस माधव जे. जमदार की पीठ ने दिया।-अदालत ने मुंबई पुलिस का तड़ीपार आदेश रद्द कर दिया।
-अदालत ने कहा कि सरकार के फैसलों का शांतिपूर्ण विरोध करना संविधान द्वारा संरक्षित अधिकार
