Gen Z और CJP आंदोलन में डॉ. आंबेडकर की
तस्वीर क्यों बनी सबसे बड़ा प्रतीक?
राजनीति या संविधान, शिक्षा और न्याय का संदेश?
NB7-नई दिल्ली:हाल के Gen Z और CJP से जुड़े छात्र आंदोलनों की तस्वीरों में एक बात सबसे
अधिक चर्चा में रही—प्रदर्शनकारियों के हाथों में भारतीय संविधान, डॉ. भीमराव आंबेडकर, महात्मा
गांधी, भगत सिंह और कई स्थानों पर महात्मा ज्योतिराव फूले के चित्र दिखाई दिए।
इनमें सबसे अधिक ध्यान आकर्षित किया डॉ. भीमराव आंबेडकर की तस्वीरों ने।
सवाल यह है कि आखिर क्यों? क्या यह केवल किसी एक वर्ग या जाति का प्रतीक था, या इसके पीछे
कोई व्यापक संवैधानिक और सामाजिक संदेश भी था?
क्या आंबेडकर केवल एक समुदाय के नेता हैं?
भारत की सार्वजनिक स्मृति में डॉ. आंबेडकर की पहचान आज केवल एक सामाजिक सुधारक या
दलित नेता तक सीमित नहीं है। उन्हें व्यापक रूप से भारतीय संविधान, समान अधिकार, सामाजिक
न्याय और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रमुख प्रतीकों में गिना जाता है।
यही कारण है कि अलग-अलग विचारों वाले अनेक सामाजिक और छात्र आंदोलनों में उनकी तस्वीर
संविधान की प्रति के साथ दिखाई देती है।
हालाँकि, यह ध्यान रखना भी आवश्यक है कि किसी विशेष आंदोलन के आयोजकों ने उन्हें किस
उद्देश्य से चुना, इसका अंतिम उत्तर उनके अपने आधिकारिक बयानों से ही मिल सकता है। इसलिए
किसी एक कारण को निश्चित रूप से आंदोलन की मंशा बताना उचित नहीं होगा।
संविधान से आंबेडकर का संबंध इतना गहरा क्यों?
डॉ. आंबेडकर भारतीय संविधान की प्रारूप समिति (Drafting Committee) के अध्यक्ष थे। संविधान
का निर्माण पूरी संविधान सभा की सामूहिक प्रक्रिया थी, लेकिन अंतिम मसौदे को तैयार करने और
उसकी संवैधानिक व्याख्या प्रस्तुत करने में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही।
उन्होंने बार-बार कहा कि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि समान अधिकार, कानून का
शासन और संवैधानिक संस्थाओं के सम्मान से मजबूत होता है।
शिक्षा: सबसे बड़ा सामाजिक हथियार
डॉ. आंबेडकर का प्रसिद्ध संदेश था—
"शिक्षित बनो, संगठित हो, संघर्ष करो।"
उनका मानना था कि शिक्षा ही वह शक्ति है जो गरीब, वंचित और कमजोर वर्गों को आत्मनिर्भर बना
सकती है।
यही कारण है कि जब छात्र अपने भविष्य, शिक्षा व्यवस्था या अधिकारों की बात करते हैं, तब
आंबेडकर का यह संदेश विशेष रूप से प्रासंगिक माना जाता है।
महिलाओं के अधिकारों के लिए उनका योगदान
डॉ. आंबेडकर ने महिलाओं को केवल शिक्षा तक सीमित नहीं रखा बल्कि उन्हें कानूनी अधिकार
दिलाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण प्रयास किए।
उनके प्रयासों से जुड़े प्रमुख बिंदु—
-महिलाओं की शिक्षा पर विशेष बल।-संपत्ति और उत्तराधिकार के अधिकारों का समर्थन।
-विवाह और तलाक संबंधी कानूनों में सुधार के पक्षधर।
-समान नागरिक अधिकारों की वकालत।
-श्रमिक महिलाओं के अधिकारों पर जोर।
स्वतंत्र भारत के शुरुआती वर्षों में उन्होंने हिंदू कोड बिल के माध्यम से महिलाओं को अधिक समान
अधिकार देने का प्रयास किया। यद्यपि उस समय यह बिल पूर्ण रूप से पारित नहीं हो सका, लेकिन
बाद के वर्षों में बने कई कानूनों की बुनियाद उसी सोच पर आधारित मानी जाती है।
गरीब, मजदूर और पिछड़े वर्ग
डॉ. आंबेडकर ने केवल जातीय भेदभाव के विरुद्ध ही नहीं, बल्कि मजदूरों, किसानों और आर्थिक रूप
से कमजोर लोगों के अधिकारों पर भी लगातार काम किया।
उनकी सोच थी कि लोकतंत्र तभी सफल होगा जब राजनीतिक समानता के साथ सामाजिक और
आर्थिक समानता भी बढ़े।
Gen Z आंदोलन में इसका क्या संदेश हो सकता है?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि किसी आंदोलन में विभिन्न जातियों, राज्यों और
सामाजिक वर्गों के छात्र एक साथ आंबेडकर की तस्वीर लेकर चलते हैं, तो उसका एक संभावित
संदेश यह हो सकता है कि आंदोलन स्वयं को संविधान, शिक्षा, समान अवसर और न्याय जैसे मूल्यों से
जोड़कर प्रस्तुत करना चाहता है।
गांधी, भगत सिंह और फूले के साथ आंबेडकर क्यों?
यदि इन चारों व्यक्तित्वों को एक साथ देखा जाए तो वे अलग-अलग मूल्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं—
-महात्मा फूले — शिक्षा और सामाजिक सुधार।-डॉ. आंबेडकर — संविधान, समानता और सामाजिक न्याय।
-महात्मा गांधी — अहिंसक संघर्ष और सत्याग्रह।
-भगत सिंह — अन्याय के विरुद्ध साहस और युवाओं की भागीदारी।
इस दृष्टि से देखा जाए तो यह संयोजन भारतीय लोकतंत्र की चार महत्वपूर्ण धाराओं को एक मंच पर
प्रस्तुत करता हुआ दिखाई देता है।
निष्कर्ष
डॉ. आंबेडकर की तस्वीर किसी भी आंदोलन में दिखाई देने का अर्थ हर बार एक जैसा नहीं होता।
अलग-अलग समूह उन्हें अलग-अलग कारणों से प्रेरणा स्रोत मान सकते हैं।
लेकिन इतना स्पष्ट है कि आज वे भारतीय सार्वजनिक जीवन में केवल एक सामाजिक नेता नहीं, बल्कि
संविधान, शिक्षा, समान अवसर, महिलाओं के अधिकार, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक
मूल्यों के सबसे प्रभावशाली प्रतीकों में से एक हैं।
इसी कारण जब युवा अपने अधिकारों, शिक्षा और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की बात करते हैं, तो
आंबेडकर की तस्वीर उनके बीच एक सशक्त प्रतीक के रूप में दिखाई देना स्वाभाविक माना जाता है।
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