चीनी या एथेनॉल, जनता पर और बोझ ?

गन्ना और चीनी की पहले से कमी, ऊपर से एथेनॉल !

सरकार बताए—पहले चीनी या एथेनॉल?




NB7 -Govt Policy विश्लेषण डेस्क :-

चीनी महंगी हुई तो सरकार ने विदेश से चीनी मंगाने का रास्ता खोला। पेट्रोल में एथेनॉल बढ़ाने 

की नीति जारी है। सवाल यह है कि जब गन्ने की उपलब्धता और चीनी उत्पादन पहले ही दबाव 

में थे, तब क्या सरकार ने खाद्य जरूरत, एथेनॉल और करोड़ों पुराने पेट्रोल वाहनों—तीनों का 

हिसाब एक साथ लगाया था?

भारत में चीनी की कीमत बढ़ने की कहानी को केवल मौसम, कम गन्ना उत्पादन या त्योहारों की मांग 

से समझना अधूरा है। एथेनॉल नीति भी इस कहानी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

लेकिन यहां एक बात साफ कर देना जरूरी है।

एथेनॉल नीति का उद्देश्य अपने आप में गलत नहीं है।

पेट्रोलियम आयात कम करना, विदेशी मुद्रा बचाना, किसानों और चीनी मिलों को अतिरिक्त बाजार 

देना तथा प्रदूषण कम करने की कोशिश—ये सभी अपने आप में उचित लक्ष्य हैं।

सवाल लक्ष्य पर नहीं, नीति की तैयारी और उसके समय पर है।


"एक अनार" दो बीमार ? (गन्ना एक = दो सामान- चीनी, एथेनॉल)

इस बार समस्या की शुरुआत ही गन्ने और चीनी के उत्पादन पर दबाव से हुई।

मौसम ने कई प्रमुख गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में फसल को प्रभावित किया। उत्पादन अनुमान नीचे आए 

और नए सीजन में शुरुआती चीनी स्टॉक भी पहले की तुलना में कम रहा।

ऐसे समय में गन्ने की एक मात्रा एथेनॉल बनाने की तरफ जाती रही।

2025-26 में उद्योग अनुमानों के अनुसार लगभग 30 लाख टन चीनी-equivalent मात्रा एथेनॉल की 

ओर divert हुई। 


"एक तो करेला, ऊपर से नीम चढ़ा"

पहले ही देश में चीनी की कमी से महँगी चीनी, ऊपर से सरकार की एथेनॉल पॉलिसी ! 

 मामला कुछ ऐसा है—

-पहले गन्ना कम हुआ,

-फिर चीनी कम बनी,

-पहले से स्टॉक कम था,

-ऊपर से गन्ने का एक हिस्सा एथेनॉल में चला गया,

-फिर त्योहार आ गए,

-मांग बढ़ी,

-चीनी महंगी हुई,

-और अब सरकार विदेश से चीनी मंगा रही है।

यानी जिस देश में पेट्रोल में एथेनॉल मिलाकर आयातित तेल पर निर्भरता घटाने की नीति बनाई गई थी, 

उसी देश में अब घरेलू चीनी की कमी संभालने के लिए 10 लाख टन कच्ची चीनी का शुल्क-मुक्त 

आयात करना पड़ रहा है।

यहीं से सवाल उठता है—

क्या एथेनॉल नीति बनाते समय सरकार ने भविष्य में गन्ने की उपलब्धता और चीनी की घरेलू जरूरत 

का पर्याप्त सुरक्षा-कुशन रखा था?

सरकार की नाकाम एथेनॉल नीति: 

नाकामी सरकार की, फिर कीमत जनता क्यों चुका रही है?

घटते चीनी उत्पादन और कम स्टॉक के बावजूद गन्ने का एक हिस्सा एथेनॉल के लिए मोड़ा गया। 

नतीजा—चीनी की उपलब्धता पर दबाव बढ़ा और अब पेट्रोल के आयात को घटाने की नीति के साथ 

चीनी के साथ एथेनॉल भी आयात करना  पड़ रहा  है।

उधर E20 पेट्रोल से पुराने वाहनों में कम माइलेज और बढ़ते रखरखाव का खर्च भी वाहन मालिकों की 

जेब पर पड़ रहा है।

यानी नीति का फैसला सरकार का, लेकिन उसका खर्च जनता का—तो फिर नाकामी की 

कीमत भी जनता ही क्यों चुकाए?


कहानी सिर्फ चीनी तक सीमित नहीं !

यहां एथेनॉल नीति का दूसरा पहलू और भी दिलचस्प है।

सरकार ने पेट्रोल में एथेनॉल blending तेजी से बढ़ाई और अब अप्रैल 2026 से देश में बिकने वाले 

पेट्रोल में 20% एथेनॉल यानी E20 अनिवार्य है। 

सरकार का कहना है कि इस बदलाव से ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी और पेट्रोलियम आयात पर 

निर्भरता कम होगी।

बात सुनने में अच्छी है।

लेकिन एक छोटा सा सवाल है—

जिस जनता की गाड़ियों में यह पेट्रोल डाला जाना है, क्या उनकी गाड़ियां भी इसी गति से 

तैयार हुई थीं?


कमाई और गाड़ी जनता की,  प्रयोगशाला सरकार की ?

यहीं सरकार की नीति पर सबसे गंभीर सवाल उठता है।

भारत में लाखों नहीं, करोड़ों पुराने पेट्रोल वाहन आज भी सड़कों पर चल रहे हैं। इनमें बड़ी संख्या 

उन वाहनों की है जो E20 के अनिवार्य होने से कई साल पहले बाजार में आ चुके थे।

नए वाहनों में E20 compatibility के लिए बदलाव धीरे-धीरे किए गए। उद्योग में 2023 के आसपास से 

E20-compatible materials और 2025 से पूरी तरह E20-compliant models की दिशा में बदलाव 

तेज हुआ। 

लेकिन पुरानी गाड़ी के मालिक से किसी ने यह नहीं पूछा था—

"भाई, आपकी गाड़ी E20 के लिए तैयार है?"

उसने तो गाड़ी तब खरीदी थी जब पेट्रोल वही था जो पेट्रोल पंप पर मिलता था।

अब पेट्रोल पंप पर जवाब है—

"साहब, पेट्रोल तो वही है, बस उसमें 20 प्रतिशत एथेनॉल है।"


सरकार खुद मानती है कि mileage पर असर पड़ सकता है

सरकार ने अपने 2026 के FAQ में E20 के बारे में सफाई दी है और माना है कि वाहन की fuel 

economy में कुछ कमी हो सकती है। उपलब्ध सरकारी स्पष्टीकरणों में लगभग 3–5% mileage 

reduction की संभावना बताई गई है, हालांकि वास्तविक असर वाहन, ड्राइविंग और परिस्थितियों 

पर निर्भर करता है। 

दूसरी ओर, हाल के LocalCircles सर्वे में पुराने पेट्रोल वाहनों के 66% मालिकों ने 10% से अधिक 

mileage गिरने की शिकायत बताई। यह सर्वेक्षण-आधारित आंकड़ा है, सरकारी परीक्षण का 

आंकड़ा नहीं, इसलिए इसे उसी रूप में देखना चाहिए। 

यानी यहां भी तस्वीर सीधी नहीं है।

सरकार कहती है—

"E20 से हर गाड़ी को नुकसान नहीं होता।"

वाहन मालिक कह रहे हैं—

"माइलेज तो कम हो रहा है।"

और वैज्ञानिक चर्चा में एक और चिंता है—पुराने E10-compatible वाहनों के fuel-system में rubber 

hoses, seals, gaskets और O-rings जैसे components पर लंबे समय में असर पड़ सकता है। ARAI 

की एक रिपोर्ट के सारांश को लेकर ऐसी चिंताएं सामने आई हैं। 

इसलिए इस मुद्दे पर और स्वतंत्र, सार्वजनिक और दीर्घकालीन शोध की जरूरत है।


सबसे बड़ा सवाल: सरकार को पहले समय नहीं देना चाहिए था?

यही इस पूरे मामले का असली नीति प्रश्न है।

अगर सरकार को मालूम था कि देश में बहुत बड़ा पुराना पेट्रोल वाहन बेड़ा है, तो संक्रमण का रास्ता कुछ ऐसा हो सकता था:

पहले E10 → फिर धीरे-धीरे E20 → पुराने वाहनों के लिए E10 उपलब्ध → नए वाहनों को E20-compatible बनाना → पर्याप्त परीक्षण → फिर पूर्ण बदलाव।

यानी जनता को भी समय मिलता और वाहन उद्योग को भी।


जनता दो बार कीमत क्यों चुकाए?

यहां व्यंग थोड़ा कड़वा हो जाता है।

एथेनॉल नीति से सरकार का उद्देश्य है—

तेल का आयात कम हो।

ठीक है।

लेकिन अगर इसके कारण—

गन्ने की कमी के समय चीनी की उपलब्धता पर दबाव पड़े,

चीनी महंगी हो,

फिर सरकार को चीनी आयात करनी पड़े,

पुरानी गाड़ियों का mileage घटे,

और वाहन मालिक को maintenance पर अतिरिक्त खर्च करना पड़े,

तो सवाल उठेगा कि इस नीति की वास्तविक लागत कौन उठा रहा है?

सरकार कह सकती है—

"हमने पेट्रोलियम आयात कम किया।"

उपभोक्ता कह सकता है—

"लेकिन मेरा mileage भी तो कम हुआ।"

चीनी उपभोक्ता कह सकता है—

"मेरी चीनी भी महंगी हुई।"

और पुरानी गाड़ी वाला कह सकता है—

"मेरी गाड़ी का maintenance भी बढ़ गया।"

फिर सवाल यही है—

नीति का लाभ किसे मिला और लागत किसने उठाई?

 

एथेनॉल नीति बंद करने की बात नहीं है

यहां फिर स्पष्ट होना जरूरी है।

एथेनॉल को पूरी तरह गलत कहना समाधान नहीं है।

भारत को तेल आयात कम करना है। वैकल्पिक ईंधन चाहिए। किसानों को नए बाजार चाहिए। 

इसलिए एथेनॉल की भूमिका रहेगी।

लेकिन नीति में लचीलापन होना चाहिए।

जब गन्ना भरपूर हो—

एथेनॉल बढ़ाइए।

जब गन्ना कम हो और चीनी की supply tight हो—

एथेनॉल diversion घटाइए।

जब देश में पुराने वाहन बहुत ज्यादा हों—

E10 जैसे विकल्प कुछ समय तक उपलब्ध रखिए।

जब नए वाहन E20 के लिए तैयार हो जाएं—

धीरे-धीरे E20 की तरफ बढ़िए।

इसे ही नीति में Balance कहते हैं।


और यही सरकार से सबसे बड़ा सवाल है

आज सरकार को एक साथ दो मोर्चों पर सफाई देनी पड़ रही है।

एक तरफ—

चीनी महंगी क्यों हुई और 10 लाख टन चीनी आयात करने की जरूरत क्यों पड़ी?

दूसरी तरफ—

E20 को लेकर पुराने वाहनों के mileage, maintenance और compatibility की चिंता 

क्यों बढ़ रही है?

और दोनों सवालों के बीच एक चीज समान है—

नीति बनाते समय भविष्य का पर्याप्त अनुमान और उपभोक्ता को जानकारी और उसके 

लिए सरकार की तैयारी।

गन्ना आज लगाया और कल चीनी नहीं बन जाती।

गाड़ी आज खरीदी और कल E20-compatible नहीं हो जाती।

इसलिए सरकार को दोनों मामलों में transition time देना चाहिए था।


एथेनॉल नीति अच्छी हो सकती थी, किन्तु जल्दबाजी में नहीं !

एथेनॉल नीति का मकसद देश को तेल आयात पर निर्भरता से निकालना है। यह लक्ष्य जरूरी है।

लेकिन देश को पेट्रोल से आत्मनिर्भर बनाते-बनाते अगर चाय में चीनी की कमी और पुरानी 

गाड़ी में mileage की कमी और दूसरी समस्याएं  सामने आ जाएं, तो नीति की समीक्षा 

जरूरी है। आखिर "भुगतना तो" जनता को ही है।  

सरकार को यह नहीं देखना चाहिए कि—

"हमने 20% blending का लक्ष्य पूरा कर लिया।"

उसे यह भी देखना चाहिए कि—

-गन्ना कितना बचा?

-चीनी कितनी बनी?

-स्टॉक कितना बचा?

-चीनी कितनी महंगी हुई?

-कितने पुराने वाहन E20 के लिए तैयार हैं?

-मालिकों का mileage कितना घटा? 

-एथेनॉल कितना महंगा पड़ा।  

-maintenance पर कितना अतिरिक्त खर्च आया?

और सबसे महत्वपूर्ण—

क्या जनता को इस बदलाव के लिए पर्याप्त समय और विकल्प दिया गया?

क्योंकि नीति की सफलता केवल सरकारी आंकड़े में 20% एथेनॉल पहुंच जाने से नहीं होती।

नीति तब सफल मानी जाएगी जब—

-पेट्रोलियम आयात भी घटे,

-किसान को लाभ भी मिले,

-चीनी की कीमत भी नियंत्रण में रहे,

-और पुरानी गाड़ी वाला अपनी जेब देखकर यह न कहे—

"साहब, देश तो आत्मनिर्भर हो रहा है, या आयात निर्भर ? लेकिन मेरी जेब क्यों हलकी होती जा रही है?"