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भारतीय को मेंहगाई, पेपर लीक और गर्मी , सरकारी खज़ाना विश्व पर्यटन और मेलोडी को भेंट

"अंधा फ़क़ीर" बांटे 'मेलोडी'- अपने-अपनों को दे !



जनता गर्मी, बेरोजगारी, मेंहगाई पेपर लीक, पेट्रोल डीज़ल गैस की 

कीमतों से तृस्त- "साहब" विश्व गुरु बनने में व्यस्त 

NB7-दिल्ली:भारत के “94 शहर आग उगल रहे हैं, नदियाँ नाले बन चुकी हैं… और नेताजी विदेशों में 

टॉफी बाँटकर ‘विश्वगुरु’ बना रहे हैं!”

भारत अब सच में “विश्व में नंबर वन” बनता जा रहा है…

बस दिक्कत इतनी है कि:


-सबसे गर्म शहरों की लिस्ट में भारत छाया हुआ है।

-सबसे प्रदूषित शहरों की लिस्ट में भी भारत चमक रहा है।

-जहरीली हवा में भी नंबर वन।

-धूल, धुआँ और गर्मी में भी नंबर वन।

-और उधर हमारे नेताजी?

-कभी विदेश में टॉफी बाँट रहे हैं…

-कभी कैमरे के सामने ध्यान लगा रहे हैं…

-कभी मंदिर में पूजा से पहले कैमरा एंगल सेट करवा रहे हैं।

-देश मंहगाई - गर्मी में जल रहा है, लेकिन सोशल मीडिया एजेंसी का कैमरा चमक रहा है।


94 भारतीय शहर दुनिया के सबसे गर्म शहरों में!

अब सोचिए…

-जिस देश में कभी पेड़ों की छाँव में लोग दोपहर काटते थे,

-वहीं आज हालत ये है कि सड़क पर निकलते ही ऐसा लगता है जैसे सूरज व्यक्तिगत दुश्मनी निकाल 

रहा हो।

-दुनिया के सबसे गर्म शहरों में 94 भारत के शहर पाए गए।


लेकिन टीवी पर क्या चर्चा है?

“नेताजी ने विदेशी महिला नेता को चॉकलेट खिलाई।”

वाह! "भारत में  इटली की महिला (सोनिया ) से दुश्मनी और इटली की महिला के साथ सेल्फी"

जनता पूछ रही है —


“साहब, हमें AC नहीं चाहिए…पर मेंहगाई डायन खाय जात है !


पहले मॅंहगाई से सांस लेने और जिंदा रहने लायक माहौल तो दे दो!”


सर्दियों में शहर गैस चैंबर, गर्मियों में तंदूर

भारत के कई शहर सर्दियों में दुनिया के सबसे प्रदूषित शहर बन जाते हैं।

दिल्ली-NCR में सर्दियों की सुबह का कोहरा नहीं,

-जहरीला धुआँ तैरता है।

लोग कहते हैं —

“आज AQI कितना है?” IQ नहीं AQI, (

जैसे मौसम नहीं,

जिंदगी बचाने की रिपोर्ट देख रहे हों।


वैसे:(देश के कुछ होनहार मंत्री थोड़ा ज्यादा जानते हैं AQI को IQ कह देते हैं)


गर्मियों में आँधी और बारिश आती है,तो थोड़ी राहत मिलती है।

लेकिन असली बीमारी वहीं की वहीं रहती है।


क्योंकि:

-पेड़ लगातार कट रहे हैं। 

-जंगल गायब हो रहे हैं।

-खेतों पर कंक्रीट उग रहा है।

-शहरों में सीमेंट का जंगल बढ़ रहा है।

-नदियों में प्रदूषण विश्व में सबसे ज्यादा है, फिर भी मेले लगाए जा रहे हैं।  

-प्रदूषण नियंत्रण पर सिर्फ फाइलें बन रही हैं, अरबों रुपया फाइलों में ही खर्च हो रहा है, विकास फोटो 

में दिखाया जा रहा है, चुनाव जीते जा रहे हैं।   


और सरकार?  


दुनिया भर में सैर सपाटे 'मेलोडी' खिलाने और फोटोशूट में व्यस्त।

उधर : देश में 

जंगल कट रहे हैं… क्योंकि ‘विकास’ आ रहा है!

आज “विकास” का मतलब क्या रह गया है?

-जहाँ पेड़ दिखे, वहाँ बुलडोजर भेज दो

-अपने दोस्तों को 1/- के भाव सरकारी जमीन बेच दो।  

-जहाँ जंगल दिखे, वहाँ मॉल बना दो।

-जहाँ नदी दिखे, वहाँ पॉश कॉलोनी बना दो।

-दोस्तों के हजारों करोड़ कर्ज माफ़ और गरीब किसान की चवन्नी भी नहीं !


फिर प्रेस कॉन्फ्रेंस करके बोल दो —

“ग्रीन इंडिया क्लीन इंडिया मिशन।”


जनता पूछ रही है —

“साहब, पेड़ लगाने का विज्ञापन ज्यादा महंगा है या सच में पेड़ लगाना ?” और ये सरकारी 

पैसा कहाँ से आया ? मामा के घर से तो नहीं ?


हजारों करोड़ खर्च के भी, धार्मिक नदियाँ अब गंदगी ढो रही हैं !

जिन नदियों को माँ कहा जाता है,

आज उनमें बह रहा है?


-सीवर का गन्दा पानी 

-प्लास्टिक कचरा 

-फैक्ट्री का केमिकल

-शहरों की गंदगी और इंसानी मल मूत्र 


और टीवी पर क्या दिखता है?

-ड्रोन कैमरा।

-स्लो मोशन।

-घाट पर नेताजी।

-पीछे भक्ति संगीत।

बस कैमरे में पानी साफ दिखना चाहिए।

असलियत में नदी साफ़ हुई है या नहीं,

उससे किसी को फर्क नहीं।


जनता मन ही मन पूछ रही है — क्योंकि सीधा पूछ नहीं सकती ? 

(क्योंकि विश्व गुरु और पर्यटन मंत्री देश में कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस करते ही नहीं !)


“माँ गंगा की सफाई ज्यादा हुई है, 
या सिर्फ विज्ञापन ज्यादा चले हैं?”


मंदिर में भगवान बाद में… विश्व पर्यटन मंत्री का कैमरा पहले

आजकल पूजा भी “HD क्वालिटी कंटेंट” बन चुकी है।


-नेताजी मंदिर पहुँचते हैं -भगवान को- दर्शन देने तब ?

तब ऐसा लगता है आज भगवान् को भी चुना लगाने आ गए !

क्योंकि  "भगवान के दर्शन से पहले" अंदर जाता हैकैमरामैन।


-पहले कैमरा सेट होगा।

-फिर एंगल तय होगा।

-फिर स्लो मोशन वीडियो बनेगा।

-फिर सोशल मीडिया टीम रील डालेगी।

और आम आदमी?

उससे कहा जाएगा —

“मोबाइल बाहर रखो।”

मतलब भगवान भी VIP और कैमरा देखकर ही दर्शन देंगे क्या?

जनता पूछ रही है —

“ये भक्ति है या फोटोशूट?”


नेताजी को जनता नहीं, अपनी ब्रांडिंग की चिंता है

देश में:

-बेरोजगारी बढ़ रही है

-महंगाई बढ़ रही है

-अपराध बढ़ रहे हैं

-पेपर लीक हो रहे हैं

-रुपया कमजोर हो रहा है

-गरीब और गरीब हो रहा है


लेकिन नेताजी के लिए सबसे जरूरी क्या है?

“इमेज मैनेजमेंट।”

देश चल रहा है या PR कंपनी?


हर समस्या का समाधान : “एक नया इवेंट कर दो।”


पेपर लीक पर मंत्रीजी  खामोश :

पेपर लीक: पढ़ाई करे गरीब, नौकरी खाए सिस्टम में बैठे लोग 

-गरीब का बच्चा रात भर पढ़ता है।

-माँ गहने बेचकर कोचिंग करवाती है।

-बाप कर्ज लेकर फॉर्म भरवाता है।

-फिर जैसे तैसे बच्चे दूर शहरों में परीक्षा केंद्र पहुँचते हैं, लाइनों में लगते हैं !


फिर खबर आती है —


“पेपर लीक।”

-कुछ दिन हंगामा।

-फिर सब शांत।

-फिर अगला एग्जाम।

-फिर अगला लीक।


जनता पूछ रही है —“देश में परीक्षा पहले होती है या सौदा पहले होता है?”


कौन ज्यादा गिर रहा है ?

रुपया या नेताजी ?

रुपया गिरता जा रहा है… लेकिन भाषण उड़ रहे हैं

-रुपये की हालत लगातार खराब होती जा रही है।

-डॉलर के सामने रुपया कमजोर होता जा रहा है।  

लेकिन टीवी पर ऐसा माहौल बनाया जाता है 

-जैसे भारत कल ही अमेरिका खरीदने वाला हो।


जनता मन ही मन पूछ रही है —


“अगर अर्थव्यवस्था की सेहत इतनी मजबूत है,

तो रुपया बार-बार ICU में क्यों है?”


पेट्रोल इतना महंगा कि बाइक स्टार्ट करने से पहले आदमी EMI 

सोचता है

सरकार जनता को सलाह देती है —

“कम तेल खर्च करो।”

जनता कहती है —

“पहले दाम तो कम करो!”

-जब दुनिया में कच्चा तेल सस्ता था,

-तब मंहगा तेल जनता को बेच कर खूब माल कमाया, जनता को एक धैला नहीं ।

-अब थोड़ा अंतरराष्ट्रीय तनाव क्या बढ़ा,

-पूरा बोझ जनता पर डाल दिया गया।

-मतलब मुनाफा सरकार का, नुक्सान जनता के सर।  


गरीब की चिंता नहीं… कुर्सी की चिंता सबसे पहले

आज गरीब आदमी की हालत क्या है?

-महंगी दवा, मंहगा इलाज GST के साथ 

-महंगी पढ़ाई -
GST के साथ 

-सभी परीक्षाओ की फीस आसमान पर  -GST के साथ 

-महंगा घर-
GST के साथ 

-महंगा राशन -
GST के साथ 

-महंगा पेट्रोल दुनिया भर के टैक्स के साथ लगभग 40 - 45 % 


NTA (नॅशनल टेस्टिंग एजेंसी ) अब विद्यार्थियों के लिए नेशनल टेंशन एजेंसी बन गयी है 

इस साल 2026 में NTA ने विद्यार्थियों से परीक्षा फीस के रूप में कितना पैसा बनाया ?

NEET UG 2026

करीब 22.79 लाख छात्रों ने NEET UG 2026 के लिए रजिस्ट्रेशन किया।

NEET की फीस लगभग:

General: ₹1700

OBC/EWS: ₹1600

SC/ST/PwD: ₹1000

औसत फीस लगभग ₹1500–1600 मानें तो:

अनुमानित कुल कमाई:


22.79 \text{ लाख} \times ₹1500 \approx ₹341 करोड़

यानि सिर्फ NEET से लगभग ₹340–360 करोड़ फीस वसूली गयी।


JEE Main 2026

JEE Main 2026 में लगभग 14–15 लाख यूनिक कैंडिडेट्स के रजिस्ट्रेशन का अनुमान बताया 

गया।

फीस लगभग:

-General Male: ₹1000

-Female: ₹800

-SC/ST/PwD: ₹500

औसत फीस लगभग ₹800–900 मानें तो:

अनुमानित कुल कमाई:


15 \text{ लाख} \times ₹850 \approx ₹127 करोड़

यानि JEE Main से लगभग ₹120–140 करोड़ फीस आई होगी।

कुल अनुमानित कमाई या वसूली :

परीक्षा      अनुमानित छात्र          अनुमानित फीस कलेक्शन
NEET UG 2026       22.79 लाख         ₹340–360 करोड़
JEE Main 2026       14–15 लाख         ₹120–140 करोड़
कुल       37 लाख+         ₹460–500 करोड़


यानि सिर्फ दो बड़ी परीक्षाओं से ही NTA ने इस साल लगभग आधा हजार करोड़ रुपये के आसपास 

फीस वसूल की गयी।

इसी वजह से सोशल मीडिया और छात्रों के बीच सवाल उठते रहते हैं कि:

-इतनी भारी फीस के बावजूद पेपर लीक क्यों?

-सर्वर क्रैश क्यों?

-परीक्षा केंद्रों पर अव्यवस्था क्यों?

-घटिया हार्डवेयर क्यों ?

-सस्ते घटिया परीक्षा केंद्र क्यों ? जहाँ छात्रों और पेरेंट्स के गर्मी - धुप में बैठने, इन्तजार करने, पानी 

की व्यवस्था तक का इंतजाम नहीं !

-परिणामों में पारदर्शिता पर सवाल क्यों?

लेकिन यह ध्यान रखना जरूरी है कि NTA और सरकार इन परीक्षाओं को “राष्ट्रीय स्तर की विशाल 

परीक्षा प्रक्रिया” बताकर खर्च, सुरक्षा और संचालन लागत का तर्क भी देती हैं। फिर भी बार बार पेपर 

लीक क्यों ?


लेकिन नेताओं की चिंता क्या है?

-अगला चुनाव

-अगली रैली

-अगला फोटोशूट

-अगला ट्रेंडिंग हैशटैग


जनता लाइन में खड़ी है,

-और नेता रील बना रहे हैं।


देश में असली विकास क्या है?

अगर विकास सच में हुआ होता,

तो:

-शहर गैस चैंबर नहीं बनते,

-नदियाँ नाले नहीं बनतीं,

-युवा बेरोजगार नहीं घूमते,

-किसान आत्महत्या नहीं करते,

-बच्चे पेपर लीक से बर्बाद नहीं होते,

-देश पर लाखों करोड़ का कर्ज नहीं चढ़ता,

-चुनाव ईमानदारी से होते,

आम आदमी नेताओं से आँख मिला कर सवाल पूछ सकते,

- देश से विदेशी निवेशक अपना पैसा निकाल कर नहीं भागते,

-देश की अर्थव्यवस्था चीन अमेरिका को टक्कर देती,

-देश को रूस से तेल खरीदने से अमेरिका नहीं रोक पाता।  
 

लेकिन यहाँ तो हालत ये है कि-

-हर समस्या पर नया इवेंट लॉन्च कर दिया जाता है।


और आखिर में जनता का सवाल…

जनता पूछ रही है —

“साहब,

देश चल रहा है या सिर्फ कैमरा एंगल ?”

-“हवा जहरीली है…

-नदियाँ गंदी हैं…

-जंगल कट रहे हैं…

-युवा बेरोजगार हैं…

-गरीब परेशान है…

-पेट्रोल डीज़ल गैस के दाम आसमान पर क्यों ?


-जनता को कहा जा रहा है विदेश मत जाओ, जैसे देश के लोग रोज शॉपिंग करने इटली यूरोप जाते हों !

-सोना मत ख़रीदा !अरे साहब पहले वे पेट्रोल तो खरीद लें !


लेकिन आपकी रील 4K में क्यों आ रही है?”

और शायद यही आज के भारत का सबसे बड़ा व्यंग है।

जहाँ असली विकास कम,

और उसका ट्रेलर ज्यादा दिखाया जा रहा है।


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