अंग्रेज गए,अंग्रेजों की पुलिस व्यवस्था नहीं गयी ?
1861 के कानून से लेकर बॉम्बे हाई कोर्ट की
जुलाई 2026 टिप्पणी तक
अंग्रेज चले गए, लेकिन क्या अंग्रेजी दमनकारी पुलिस व्यवस्था बदली?
NB7 System Analysis:Delhi
जब भी किसी प्रदर्शन पर लाठीचार्ज होता है, किसी प्रदर्शनकारी पर मुकदमा दर्ज होता है या अदालत
पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाती है, तब एक पुराना सवाल फिर सामने आता है—क्या भारत की
पुलिस व्यवस्था आज भी अंग्रेजों के समय की सोच से पूरी तरह बाहर निकल पाई है?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हाल ही में बॉम्बे हाई कोर्ट ने सरकार के खिलाफ शांतिपूर्ण
विरोध करने के अधिकार पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
जब भारतीय ही भारतीयों पर लाठियां चलाते थे !
ब्रिटिश शासन में भारत की पुलिस का अधिकांश हिस्सा भारतीयों से बना था। अंग्रेज अधिकारियों की
संख्या कम थी, लेकिन सिपाही और निचले स्तर के अधिकांश पुलिसकर्मी भारतीय थे।
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अनेक जगहों पर लाठीचार्ज, गिरफ्तारियां और गोलीबारी हुई। इन
कार्रवाइयों को अंजाम देने वाले कई पुलिसकर्मी भारतीय थे, लेकिन वे ब्रिटिश सरकार के आदेशों का
पालन कर रहे थे।
यही कारण था कि महात्मा गांधी, लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, जवाहरलाल नेहरू और
हजारों स्वतंत्रता सेनानियों को कई बार पुलिस कार्रवाई का सामना करना पड़ा।
1861 का पुलिस कानून क्यों बना?
1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजों ने Police Act, 1861 बनाया।
इस कानून का उद्देश्य केवल अपराध रोकना नहीं था। उसका प्रमुख लक्ष्य ब्रिटिश शासन को सुरक्षित
रखना और प्रशासनिक नियंत्रण मजबूत करना भी था।
इसी वजह से कई विशेषज्ञ मानते हैं कि इस कानून में पुलिस की जवाबदेही जनता की तुलना में
सरकार और प्रशासन के प्रति अधिक दिखाई देती थी।
आजादी के बाद क्या बदला?
1947 में देश आजाद हो गया, लेकिन पुलिस व्यवस्था का मूल ढांचा लंबे समय तक उसी औपनिवेशिक
कानून पर चलता रहा।
इसी कारण पिछले कई दशकों से पुलिस सुधार की मांग लगातार उठती रही है।
2006 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ मामले में राज्यों को पुलिस सुधार लागू करने
के निर्देश दिए। अदालत ने कहा कि पुलिस को पेशेवर, राजनीतिक दबाव से अपेक्षाकृत मुक्त और
जनता के प्रति अधिक जवाबदेह बनाया जाना चाहिए।
हालांकि इन सुधारों को सभी राज्यों में समान रूप से लागू नहीं किया गया।
हिरासत में मौत और पुलिस पर सवाल:
हर वर्ष राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB), राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) तथा
अन्य संस्थाओं के सामने पुलिस हिरासत, बल प्रयोग और मानवाधिकार उल्लंघन से जुड़े मामले आते
हैं।
इन मामलों का अर्थ यह नहीं कि पूरी पुलिस व्यवस्था ऐसी है। भारत में लाखों पुलिसकर्मी कठिन
परिस्थितियों में ईमानदारी से भी काम करते हैं। लेकिन ऐसे मामले यह जरूर बताते हैं कि जवाबदेही
और सुधार की आवश्यकता पर बहस अभी भी जारी है।
किसान आंदोलन को दबाने की अग्रेजों से भी घटिया तरकीबें !
किसान आंदोलन (2020–21): किसान आंदोलन: लोकतंत्र, विरोध और पुलिस कार्रवाई पर
उठे सवाल
2020 में केंद्र सरकार द्वारा लाए गए तीन कृषि कानूनों के खिलाफ शुरू हुआ किसान आंदोलन स्वतंत्र
भारत के सबसे लंबे और सबसे बड़े जन आंदोलनों में से एक था। मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा,
पश्चिमी उत्तर प्रदेश और देश के अन्य हिस्सों के किसान संगठनों ने इन कानूनों को वापस लेने की मांग
की।
जब हजारों किसान दिल्ली की ओर मार्च कर रहे थे, तब उन्हें राजधानी की सीमाओं—सिंघु, टिकरी
और गाजीपुर—पर ही रोक दिया गया। सड़कों पर बड़े-बड़े कंक्रीट बैरियर लगाए गए, लोहे की कीलें
(स्पाइक), सीमेंट ब्लॉक, कंटेनर और कई परतों वाली बैरिकेडिंग की गई। सरकार ने इन उपायों को
कानून-व्यवस्था बनाए रखने और संभावित हिंसा रोकने के लिए आवश्यक बताया।
आंदोलन के दौरान कई स्थानों पर इंटरनेट सेवाएं अस्थायी रूप से बंद की गईं। अनेक प्रदर्शनकारियों
को हिरासत में लिया गया और कुछ मौकों पर पुलिस तथा प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें भी हुईं। इन
कार्रवाइयों पर व्यापक सार्वजनिक बहस हुई।
सरकार और उसके समर्थकों की ओर से समय-समय पर आंदोलन के कुछ हिस्सों में बाहरी तत्वों या
विदेशी प्रभाव की आशंका जताई गई। कुछ सार्वजनिक बयानों और राजनीतिक विमर्श में आंदोलन से
जुड़े कुछ लोगों पर "विदेशी फंडिंग", "राष्ट्र-विरोधी तत्वों की घुसपैठ" या "खालिस्तानी प्रभाव" जैसे
आरोप भी लगाए गए। दूसरी ओर, किसान संगठनों ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि
आंदोलन किसानों के अधिकारों और कृषि कानूनों के विरोध तक सीमित है तथा अधिकांश प्रदर्शन
पूरी तरह शांतिपूर्ण रहे।
मानवाधिकार संगठनों, नागरिक समाज के कई समूहों और विपक्षी दलों ने पुलिस की कार्रवाई,
बैरिकेडिंग, इंटरनेट प्रतिबंध और प्रदर्शनकारियों के साथ किए गए व्यवहार की आलोचना की। उनका
तर्क था कि शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र का मूल अधिकार है और राज्य को उसका संरक्षण करना चाहिए
वहीं सरकार का कहना था कि सार्वजनिक सुरक्षा, राजधानी की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए
रखना उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है।
लगभग एक वर्ष तक चले आंदोलन और कई दौर की वार्ताओं के बाद नवंबर 2021 में प्रधानमंत्री ने
तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की। इसके बाद संसद ने कृषि कानून निरसन विधेयक,
2021 पारित कर इन कानूनों को औपचारिक रूप से निरस्त कर दिया। और इस दौरान सैकड़ों
किसानों की मृत्यु भी हुई।
क्या टकराव टाला जा सकता था?
किसान आंदोलन का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी था कि कई कृषि विशेषज्ञों, किसान संगठनों और
पूर्व नौकरशाहों ने शुरुआत से ही कहा था कि यदि तीनों कृषि कानून लागू करने से पहले केंद्र सरकार
व्यापक स्तर पर किसानों, राज्य सरकारों, कृषि वैज्ञानिकों और संबंधित पक्षों से विस्तृत संवाद करती,
तो शायद इतना बड़ा टकराव पैदा नहीं होता।
संभव है कि बातचीत के दौरान कानूनों में आवश्यक संशोधन किए जाते, कुछ विवादित प्रावधान बदले
जाते और ऐसी व्यवस्था बनाई जाती, जिसे किसानों का एक बड़ा वर्ग स्वीकार कर लेता। लोकतांत्रिक
व्यवस्था में कानून बनाना केवल संसद में बहुमत का प्रश्न नहीं होता, बल्कि उन लोगों का विश्वास
जीतना भी होता है, जिन पर वह कानून सीधे लागू होने वाला है।
छात्र आंदोलन: अलग-अलग वर्षों में विभिन्न विश्वविद्यालयों में पुलिस की हिंसक कार्रवाई विवाद
का विषय बनी।
हर मामले की परिस्थितियां अलग थीं और उन पर अलग-अलग न्यायिक व सार्वजनिक प्रतिक्रियाएं
आईं।
CJP का जंतर-मंतर आंदोलन: क्या भारत की पुलिस व्यवस्था अभी तक अंग्रेजी
पुलिसिया विरासत से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाई है?
यदि जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नाम से एकत्र हुए छात्रों और युवाओं का
शांतिपूर्ण आंदोलन केवल इसलिए दबाने, डराने या हटाने की कोशिश की जाती है क्योंकि वे बार-बार
हो रहे पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं की पारदर्शिता और शिक्षा मंत्री की राजनीतिक जवाबदेही की मांग
कर रहे हैं, तो यह एक बड़ा संवैधानिक और लोकतांत्रिक प्रश्न खड़ा करेगा।
यहां मुद्दा किसी एक संगठन का नहीं है। CJP कोई पंजीकृत राजनीतिक दल नहीं, बल्कि सोशल
मीडिया के माध्यम से जुड़े कुछ छात्रों और युवाओं का एक अनौपचारिक समूह है। यदि ऐसे नागरिक
शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखना चाहते हैं, तो लोकतंत्र में उनकी अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण विरोध
के अधिकार का सम्मान होना चाहिए।
यही प्रश्न हाल ही में बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस माधव जे. जमदार ने भी उठाया था। अदालत ने पूछा
कि यदि नागरिक सरकार की नीतियों के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध करें, तो क्या उनके खिलाफ
मुकदमे दर्ज कर दिए जाएंगे? अदालत ने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना और
शांतिपूर्ण विरोध करना संविधान द्वारा संरक्षित अधिकार है।
इतिहास हमें भी इसी दिशा में सोचने के लिए मजबूर करता है।
1919 के जलियांवाला बाग नरसंहार में गोली चलाने का आदेश ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड
डायर ने दिया था। लेकिन गोली चलाने वाले सैनिक (ब्रिटिश) भारतीय सेना के थे, जिनमें
भारतीय उपमहाद्वीप से भर्ती किए गए सैनिक भी शामिल थे। यह घटना याद दिलाती है कि जब राज्य
की शक्ति जनता की सुरक्षा के बजाय उसे दबाने के लिए प्रयोग होती है, तो उसके दूरगामी प्रभाव होते
हैं।
यदि जालियां वाला बाग़ हत्याकांड में यदि ब्रिटिश सेवा में नियुक्त भारतीय सैनिक निहत्ते भारतियों पर
गोली चलाने से मुकर जाते तो इतिहास में कुछ और दर्ज होता जो मिसाल बनता।
स्वतंत्र भारत और औपनिवेशिक भारत की तुलना करते समय यह भी याद रखना चाहिए कि आज
भारत एक संवैधानिक लोकतंत्र है, जहां नागरिकों को अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार
प्राप्त है। इसलिए किसी भी आंदोलन पर पुलिस की कार्रवाई का मूल्यांकन संविधान, न्यायालयों के
निर्देश और कानून के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल औपनिवेशिक दौर की मानसिकता से।
इसीलिए यदि कोई प्रदर्शन वास्तव में शांतिपूर्ण है, कानून-व्यवस्था के लिए वास्तविक खतरा उत्पन्न
नहीं करता और केवल जवाबदेही की मांग कर रहा है.
पुलिस की भूमिका क्या होनी चाहिए ?
—संवाद को सुरक्षित बनाना या विरोध को जहाँ तक हो सके शांतिपूर्ण तरीके से समाप्त
करना?
--पुलिस संविधान की शपथ ले कर काम करती है, इसलिए उसकी जवाबदेही संविधान से
होती है, नेताओं से नहीं।
--लोकतंत्र की मजबूती इस बात से तय होती है कि सरकार कठिन सवालों का कैसे सामना
करती है.
--पुलिस नागरिकों के अधिकारों (जो संविधानिक हैं) की रक्षा कैसे करती है ?
- न्यायपालिका संविधान की सीमाओं को कैसे बनाए रखती है?
-किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण असहमति को स्थान देना उसकी
कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी शक्ति माना जाता है।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने क्या कहा?
हाल ही में बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस माधव जे. जमदार ने एक राजनीतिक कार्यकर्ता के खिलाफ
जारी तड़ीपार आदेश रद्द करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
सुनवाई के दौरान उन्होंने पूछा—
"क्या नागरिक सरकार के खिलाफ विरोध भी नहीं कर सकते? क्या मुकदमे दर्ज कर सभीउन्होंने यह भी कहा कि पुलिस किसी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की नहीं, बल्कि जनता और संविधान की
सेवक है।
बाद में अदालत ने अपने फैसले में कहा कि केवल सरकार के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध या नारे लगाने
के आधार पर किसी व्यक्ति को तड़ीपार नहीं किया जा सकता। ऐसा करना संविधान के अनुच्छेद 19
के तहत मिले अधिकारों के विपरीत है।
क्या सरकार से सवाल पूछना लोकतंत्र विरोधी है?
भारतीय संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार देता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि कोई व्यक्ति हिंसा करे, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाए या कानून
अपने हाथ में ले।
लेकिन लोकतंत्र में सरकार की नीतियों पर सवाल पूछना, उनकी आलोचना करना और शांतिपूर्ण
विरोध करना संविधान द्वारा संरक्षित अधिकारों का हिस्सा माना जाता है।
सरकारें जनता द्वारा चुनी जाती हैं। इसलिए जनता द्वारा उनसे जवाब मांगना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का
स्वाभाविक हिस्सा है।
न्यायपालिका की भूमिका:
भारतीय लोकतंत्र में न्यायपालिका की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में से एक है कि वह संविधान और
नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करे।
समय-समय पर विभिन्न उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे फैसले दिए हैं जिनमें नागरिक
स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी और पुलिस की जवाबदेही पर जोर दिया गया है।
हाल का बॉम्बे हाई कोर्ट का फैसला भी इसी व्यापक संवैधानिक बहस का हिस्सा माना जा रहा है।
अंत में :
भारत की पुलिस व्यवस्था का इतिहास औपनिवेशिक दौर से जुड़ा रहा है, लेकिन स्वतंत्र भारत का
संविधान पुलिस से अलग भूमिका की अपेक्षा करता है। पुलिस का दायित्व कानून का निष्पक्ष पालन
करना है, जबकि नागरिकों का अधिकार है कि वे कानून के दायरे में रहकर सरकार से सवाल पूछें,
उसकी आलोचना करें और शांतिपूर्ण विरोध करें।
लोकतंत्र केवल चुनाव से नहीं चलता। लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब सरकार जवाब देती है, पुलिस
कानून के अनुसार निष्पक्ष काम करती है और अदालतें संविधान की रक्षा करती हैं।
यही लोकतांत्रिक संतुलन भारत के संविधान की मूल भावना भी है।
